भारतकोश
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हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

महापापों के स्वयं अपराधी थे । उन्होंने पंजाब, बढ़ान तथा अन्य स्थानों में रण-भूमि में हारे हुये मरहटों की नाकें काट ली थीं और उनके सिरों को काट कर शाही खैमे के सामने ढेर लगा दिये थे और उसी भयंकर चिता को उन्होंने जय-स्तम्भ समझा था । मरहठे भी इन पाशविक कार्यों का अनुकरण कर सकते थे, पर उन्होंने कभी ऐसा नहीं किया । और न ही उन लोगों ने मसजिदों को ढाकर, कुरान को जला कर और पवित्र स्थानों पर लूट मचा कर अपने को प्रसिद्ध किया । अब्दाली, औरंगजेब, नादिर और मुसलमानों ने सिद्धान्ततः ऐसे दुराचार किये थे ! कुंजपुर में हारने के कारण अब्दाली की प्रतिष्ठा और भी कम होने लगी । मरहठे उसकी सेना को, जो दस हज़ार के लगभग थी, बुरी तरह से पराजित करके उसकी आंखों के सामने ही विजयदशमी या विजय का दिन बड़ी धूमधाम से मना रहे थे । चूंकि वह एक योग्य सेनापति था, उसने फौरन सोच लिया कि यदि कोई बड़ा खतरा उठा कर मैं कोई साहसिक कार्य करके न दिखा दूंगा तो मेरा काम बिगड़ जायगा । उसी समय उसने किसी प्रकार भी यमुना पार करके बागपट के स्थान पर पहुँच कर कुंजपुर स्थित मरहठी फ़ौज को उनके आधारभूत दिल्ली से काटने का दृढ़ निश्चय कर लिया । अपने इस कार्य में वह सफल हुआ और एक लाख मनुष्यों की सेना, मरहटों और उनकी देहली लाइन के बीच खड़ी कर दी । इसी समय उसे एक और मौक़ा हाथ आ गया, जो पीछे चल कर उसके लिये अपनी सैनिक शक्तियों से अधिक लाभदायक सिद्ध हुआ । वह यह था कि यद्यपि मरहटों का सम्बन्ध अपनी आधार फ़ौज से कट गया था तो भी अब्दाली का सम्बन्ध शुजा और रुहेलों के देश से नहीं छूटा था । पर इसके कारण उसे इतना लाभ नहीं पहुँचा जितना कि गोविन्दपन्त के भाऊ की, रसद बन्द करने वाली, आज्ञा न पालन कर सकने के कारण पहुँचा । अब्दाली ने मरहटों को सामना करने के लिये भलीभांति सुस- ज्जित पाया । बागपट पर ज्यों ही उसने यमुना पार की, उसी समय

[ ११५ ] भाऊ युद्ध करने के लिये विख्यात कुरुक्षेत्र की ओर बढ़ा और उसने पानीपत में खेमा लगा दिया। मरहठों को पूर्ण विश्वास था कि यदि गोविन्दपन्त और गोपाल गणेश ने अपना कार्य्य अच्छी प्रकार से किया और शत्रुओं की रसद बन्द करके उसके पिछले भाग पर आक्रमण किया तो वे अब्दाली को पीस डालेंगे। पर गोविन्दपन्त उस काम के करने में बुरी तरह असफल रहा। आवश्यक आज्ञा, धमकियां—भाऊ ने सभी का आश्रय लिया, पर गोविन्दपन्त ने इतना भी उद्योग नहीं किया जितना वह कर सकता था। जाटों ने पहले ही मरहठों का साथ छोड़ दिया था और वे एक सुरक्षित दूरस्थ स्थान भरतपुर की राजधानी से युद्ध का तमाशा देख रहे थे। तो भी उनकी यह प्रशंसनीय बात उल्लेखनीय है कि उन्हों ने कभी कभी मरहठों की रसद आदि द्वारा सहा- यता की थी। लेकिन राजपूतों ने तो उतना भी नहीं किया। उनमें कोई भी मरहठों का मुक़ाबिला करने का साहस नहीं रखता था, और बहुतेरे चाहते थे कि वे नष्ट हो जांय। इन हिन्दू-राजाओं की आत्मघातिनी आशा कहां तक सफल हुई, यह भविष्य का इतिहास बतलायेगा। इस लिए यद्यपि दोनों दलशत्रु के यातायात का रास्ता काटकर उसे भूखोँ मारने का विकट प्रयत्न करके उस पर आक्रमण करना चाहते थे, तोभी ज्यों ज्यों दिन बीतते गये, अब्दाली की अपेक्षा मरहठे कहीं अधिक क्षुधापीड़ित होने लगे। आखिरकार २२ नवम्बर को जनकोजी सिंधिया ने अपने पड़ाव से चल कर मुस्लिम-फौज पर आक्रमण कर दिया। सारे मुहाज पर बड़ा भयंकर युद्ध छिड़ गया। नवयुवक महाराष्ट्र-सेनापति तथा उसके पुराने तजुर्बेकार योद्धाओं की अनुपम वीरता के सामने डटे रहने में असमर्थ मुस्लिम-सेना शाम को पीछे भागी और मरहठों ने सरगर्मी के साथ उसे भगाकर उसका पड़ाव तक पीछा किया। यदि अन्धेरा न हो गया होता तो उसी दिन मुसलमानों की पूर्ण पराजय हो जाती।

[ ११६ ] मरहटों ने अपने शूरवीरों का विजय की सलामी के साथ स्वागत किया। अपने सिपाहियों के मस्तिष्क से पराजय के उत्साहहीन करने वाले प्र- असर को निकालने के लिये अब्दाली ने १४ दिन बाद चुनी हुई से- को आज्ञा दी कि वह अंधेरा होते ही रवाना हो जाये और मराठी से- के मध्य भाग पर रात के समय अन्धेरे में आक्रमण करे। लेकिन आगे बढ़ने पर जब इन लोगों ने बलवन्तराव मेहेन्डले को ५० हज़ार फ़ौ- के साथ युद्ध के लिये प्रस्तुत आते देखा, तो इन के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। पठानों ने फ़ौरन अपनी तोपें मरहटों पर चलानी आरम्भ कर दीं। पर चूंकि मरहठे तोपें नहीं लाये थे; इसलिये उनकी अधिक हानि हुई। शीघ्र ही ऐसा आभास होने लगा कि मरहटे डगमगा जायेंगे। लेकिन उनका सेनापति बिजली की तरह घोड़ा आगे दौड़ा लाया और अपनी सेना को ललकारते हुये उसने कहा कि झण्डे को अपमानित न होने देना। उन्हें चारों ओर से बटोर कर व्यूहबद्ध किया और अपनी तलवार को भयङ्कर रूप से ऊँची उठा कर एक दम आक्रमण करने की आज्ञा दी। मरहठे दौड़ कर शत्रुओं पर टूट पड़े, उनकी तोप को शांत कर दिया और मौत के मुंह में आ गये। सबसे आगे उनका वीर सेनापति बलवन्तराव मेहेन्डले था। घमासान का रण छिड़ पड़ा। एक गोली आकर सेनापति को लगी और वह वहीं गिर कर ढेर हो गया। यह देख कर मुसलमान उसका सिर विजय के चिन्ह के रूप में काट कर ले जाने के लिए उस पर टूट पड़े, परन्तु निम्बालकर ने उनकी तलवारों और सेनापति की लाश के बीच में अपने को डाल दिया और गहरी चोट खाने पर भी उसके मृत शरीर को उस समय तक ढाँपे रक्खा, जब कि मरहटों- ने आकर उसे शत्रुओं से छुड़ा न लिया। इस समय तक हज़ारों पठान काम आ चुके थे और मुसलमानों ने और डटा रहना कठिन समझा। इसलिये पहले तो वे लोग भागने से झिझके, फिर बुरी तरह पराजित होकर पीठ दिखा कर हज़ारों साथियों को मरहटों के सामने रणभूमि में छोड़ कर अपने पड़ाव की ओर भाग गये। मरहटों ने एक घड़ी

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विजय प्राप्त की, परन्तु एक योग्य और महान् सेनापति से हाथ धो बैठे । उसकी लाश बड़ी प्रतिष्ठा के साथ छावनी में लायी गई और उसके स्मारक में एक विजयी को सैनिक मान से सम्मानित किया गया । भाऊ को औरों की अपेक्षा उसकी मृत्यु पर अधिक शोक हुआ और स्वयं उसकी अन्त्येष्टि-क्रिया में सम्मिलित हुआ । उस वीर की धर्मपत्नी ने, जो अपने पति से कम बहादुर न थी, भाऊ के अत्यन्त आग्रह करने पर भी उसके साथ चिता में सती होकर अपने को बलिदान कर देने का दृढ़ निश्चय किया । समस्त सेना अपने वीर शहीद के प्रति अन्तिम अत्यन्त प्रेम भरा सम्मान प्रदर्शित करने को आई । हजारों मनुष्य भक्तिपूर्वक चिता को घेर कर प्रसिद्ध शहीद तथा वीर मरहठा कन्या की, जो अग्नि की शिखाओं में अपने प्रिय मृतक के सिर को हिफ़ाज़त से गोद में रक्खे बैठी थी, भक्तिपूर्ण अभ्यर्थना करते हुये खड़े रहे । इस प्रकार अब्दाली दो लड़ाइयां लड़ा और दोनों में ही उसको मुँह की खानी पड़ी । लेकिन इसमें भी मरहठा के भूखों मरने का प्रश्न हल न हो सका । इसमें कोई सन्देह नहीं कि यद्यपि गोविन्दपन्त की निद्रा अब भंग हुई और उसने अब्दाली की रसद पहुँचानी बन्द कर दी थी; तथापि अब बहुत देर हो चुकी थी । और साथ ही वह अधिक दिनों तक इस काम को जारी भी न रख सका क्योंकि अताई खाँ ने दस हजार फौज के साथ बनावटी झंडे के नीचे गोविन्दपन्त पर आक्रमण कर दिया । मरहठों ने होल्कर का झंडा देख कर आगे बढ़ते हुए पठानों को तब तक मित्र ही समझा जब तक कि उन्होंने सच- मुँच उनको काटकर गिराना शुरू न कर दिया । आखिरकार गोविन्द- पन्त भी काट डाला गया, और उसने वह जीवन खो दिया, जिसे अगर वह भाऊ के आज्ञानुसार चार महीने पहले खतरे में डालता तो बहुत संभव था कि वह अपनी जाति और अपने आप को भी एक बड़ी विपत्ति से बचा लेता । पठानों ने गोविन्दपन्त का शिर काट लिया और

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अब्दाली ने बड़ी ही कृपा करके उसे बहुत सी डींगों से भरे हुए पत्र के साथ भाऊ के पास भेज दिया। सैनिक दृष्टि से अब भी अब्दाली को परास्त करने की बहुत सम्भावना थी, क्योंकि इतना चौकस पहरा होते हुये भी मरहठों की विपत्ति का समाचार दक्षिण में जा पहुँचा और बालाजी अनुमानतः ५०,००० मनुष्यों की शक्तिशाली सेना के साथ, अपने आदमियों की सहायता के लिये रवाना हो पड़ा। अगर मरहठे एक महीना और डटे रह सकते तो दोनों सेनाओं के बीच अब्दाली पिस जाता। परन्तु फ़ाके का क्या उपाय हो सकता था? सैंकड़ों बोझ ढोने वाले पशु तथा घोड़े प्रतिदिन भूख से मरने लगे। उनके सड़ने की दुर्गन्धि सैनिकों के स्वास्थ्य के लिये फ़ाकों के समान ही भयावह होने लगी। अब केवल एक ही उपाय उस समय युद्ध प्रारम्भ करने का था। उमंग भरी सेना प्रतिदिन भाऊ के खेमे पर इकट्ठी हो करुणामय प्रार्थना करने लगी कि हमें भूख और दुर्गन्धि से प्राण त्याग करने की अपेक्षा रणभूमि में जाकर मरने की आज्ञा दीजिये। लेकिन क्या भूखों मरने से बचने के लिये अब भी एक और मार्ग न था अर्थात् “बिना- शर्त हिन्दू-महान्-कार्य से त्याग-पत्र दे देना”, जिसके लिये कि उनके पूर्वजों की कई पीढ़ियां जीवित रहीं तथा उसी कार्य को करते हुए मरीं थीं? तो क्या वे ऐसा करके तथा अब्दाली को शाहंशाह मान कर स्वतन्त्रता से त्याग-पत्र दे दें? नहीं, किसी प्रकार भी नहीं। कोई मरहठा इसके लिये राय देने को तय्यार न था। आपत्तिग्रसित और क्षुधातुर होते हुए भी उन्होंने भयंकर विषमता का ध्यान न करते हुये इस बुद्धिमानी से शत्रु का सामना करने का निश्चय किया कि चाहे युद्ध में उनके मनोरथ सफल न हों तो भी विपक्ष की सफलता धूल में मिल जाय। इस श्रेणी के मनुष्यों के बीच भाऊ अजेय साहस और बल से कभी भी विचलित न होते हुए खड़ा था। उसने निर्भय होकर प्रतिज्ञा कर ली कि मैं हार कभी न मानूंगा और न कोई ऐसा कार्य्य ही करूंगा जिस से जातीय प्रतिष्ठा पर धब्बा लगे, और विजय प्राप्त करने के लिये

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चाहे कैसा भी दुःख क्यों न उठाना पड़े—और विजय भी चाहे प्राप्त न हो—तो भी कम-से-कम हार ऐसा हो जो हमारी आने वाली सन्तति को सर्वदा उत्साह और स्वाभिमान से भरती रहे। यह हार बहुत-सी सफलताओं की अपेक्षा श्रेष्ठ है। एक आवश्यक सैनिक सभा निमंत्रित की गई जिस में यह निश्चय हुआ कि पूर्ण रूप से युद्ध के लिये सन्नद्ध हो दिल्ली की तरफ प्रस्थान किया जाय और यदि अब्दाली सामना करे तो उस पर आक्रमण किया जाय और उसको पीठ को काट कर उससे युद्ध किया जाय। 'अगर' की शर्त अनावश्यक थी क्योंकि अब्दाली उन्हें बच जाने देने वाला आदमी था। हजारों वीर "हरिभक्तों" की सेना उसी 'जरीपताका' या सुनहले गेरुवा झंडे के आगे ओर एकत्रित हो गई। शीघ्र ही उनका सेना-नायक, नेताओं द्वारा निर्धारित भविष्य कार्य क्रम की घोषणा करने को उठ खड़ा हुआ। ज्यों ही उन लोगों को शत्रु से युद्ध करने का फ़ैसला बतलाया गया, उस बृहत् शस्त्रधारी जमघट ने उच्च ध्वनि से इसका समर्थन किया। सब कार्य-क्रम समझाया गया इस महान् नेता ने प्रतिष्ठित जातीय झंडे की ओर संकेत करते हुए, जिसके नीचे सब लोग खड़े थे, अपने मनुष्यों के सामने एक सारगर्भित वक्तृता दी; जिसमें उसने बतलाया कि किस प्रकार मौन वाणी द्वारा यह भगवा अपना सुविख्यात इतिहास बतला रहा है कि किस प्रकार रामदास ने इसे शिवाजी को हिन्दू-पद-पादशाही के 'स्वधर्म-राज्य' के वृहत् कार्य के लिये चेतावनी-स्वरूप दिया था; किस तरह हमारे पूर्वज और अमर शहीदों ने विजय-पर-विजय प्राप्त कर के समस्त हिन्दुस्तान को अटक से श्वणकोट और समुद्र पर्यन्त इसके अधीन सम्मिलित किया; और किस प्रकार हिन्दुत्व के विरोधियों ने जब कभी सर उठा, तो या तो उन्होंने इस के सामने सिर झुकाया या नष्ट हो गये। क्या अब हम इसे शत्रुओं को सौंप दें ? झुका दें ? या जिस संदेश का यह परिचायक है, उस महान् कार्य के लिये लड़ते २ जान दे दें ?

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एक लाख शूरवीरों ने 'हर-हर महादेव' का जय घोष किया और अपनी- अपनी तलवार निकाल कर जातीय झण्डे, उनके बतलाये हुये कार्य्य तथा अपने सेनापति के प्रति, जिसने विजय-पर-विजय प्राप्त करने में उनका पथ प्रदर्शन किया था, भक्ति रखने की प्रतिज्ञा की। १५ जनवरी की सुबह को सारी मरहठा फ़ौज व्यूहबद्ध होकर निकल पड़ी। भाऊ और विश्वासराव सेना के मध्य भाग के संचालक बने। जनकोजी उनके दाहिनी ओर खड़े हुए। तथा मल्हरराव होल्कर सेना के आगे हुए। दामाजी गायकवाड़, यशवन्तराव पवार, अंताजी मानकेश्वर, विट्ठल शिवदेव, और शमशेर बहादुर - ये सब बाईं ओर से सेना की रक्षा के लिए नियुक्त किये गये। अपने उत्तम तोपखाने को वीर इब्राहीम गार्दी की अध्यक्षता में, जो मुसुलमान होते हुये भी अपने मालिकों का मरते दम तक नमकहलाल रहा, सबसे आगे रखा। इस प्रकार भयङ्कर रीति से व्यूहबद्ध महाराष्ट्र- सेना ने अपना शिविर छोड़ा और सहस्रों नरसिंगों, नक्कारों, नफ़रियों और युद्ध-वाद्यों को बजाते हुये उन्होंने कूच का डंका बजा दिया। ज्यों ही अब्दाली को मरहठों के आने की सूचना मिली वह भी मुक़ाबिला करने के लिये निकल खड़ा हुआ। उसकी सेना के मध्य भाग का संचालन उसका वज़ीर शाहनवाज़खाँ कर रहा था। उसकी दाईं ओर रुहेले तथा बायें भाग में नजीबखां और शुजा थे। उसने भी अपनी तोपें सेना के आगे रक्खीं। शीघ्र ही दोनों सेनाओं में युद्ध आरंभ हो गया। बन्दूकों और तोपों ने अपना भीषण कार्य्य आरम्भ कर दिया। उन बड़ी सेनाओं के चलने से उठी हुई धूल और तोपों के धुएं के कारण आकाश में अन्धकार छा गया। दिन निकलने के बहुत देर बाद तक सूर्य दिखाई न दिया। जब शत्रुओं ने भलीभांति एक-दूसरे को देखा तो यशवंतराव पवार और विट्ठल शिवदेव ने पहले पहल आक्रमण किया। घमसान का युद्ध होने लगा। मरहठों ने एक ही झपट में रुहेलों को पीछे हटने पर विवश कर

३. पेशवा बाजीराव प्रथम व उत्तर भारत में हिन्दू पताका

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दिया और उनके ८००० आदमियों को मार डाला। भारी प्रहार को न सह कर यवन-सेना का दाहिना भाग लड़खड़ाने लगा और पीछे हटा। मुसलमानों की सेना के मध्य भाग पर भाऊ और नवयुवक वीर विश्वास- राव ने इस ज़ोर से आक्रमण किया कि सेनायें मौत के मुख में आ पड़ीं। पठान भी घटये दर्जे के शत्रु न थे। दूसरी ओर भाऊ तथा नवयुवक राज- कुमार विश्वासराव जैसे असाधारण पुरुषों द्वारा संचालित महाराष्ट्र-सेना भी सम्भवतः पीछे हटना नहीं जानती थी। एक घण्टे के भयंकर युद्ध के बाद भाऊ और विश्वासराव ने स्वयं वज़ीर द्वारा संचालित और लोहे की तरह मजबूत पठानों के अग्रभाग की पंक्ति को तोड़ दिया। सहस्रों मुसलमान रणमें मरकर धराशायी हुए। वज़ीर का लड़का मारा गया और वह स्वयं घोड़े से वंचित हो गया। मुसलमानों का मध्य भाग टूटने और छिन्न-भिन्न होने लगा। शत्रुओं के मोर्चे पर मोर्चे को तोड़ते हुये भाऊ और विश्वासराव आगे बढ़े। यह देखकर वज़ीर को बचाने के लिये नजीबखां शीघ्रता से आगे बढ़ा। पर उसके पीछे भाऊ की सहा- यता और उसकी स्थिति मजबूत करने के लिये वीर जनकोजी भी अपने अनुभवी योद्धाओं के साथ तेज़ी से आ पहुँचा। इतनी भयंकर लड़ाई होने लगी जितनी पहले कभी नहीं हुई थी। समस्त सेना में द्वन्द- युद्ध होना आरम्भ हो गया। अब्दाली को स्पष्ट प्रतीत हो गया कि उसकी सेना का दाहिना, बायां और मध्य—अर्थात् सारी सेना पीछे हट गई है, और शीघ्र ही तितर-बितर होना चाहती है। जल्द ही उसके सिपाही भागने लगे। पर वह अटल खड़ा रहा। उसने अपनी ही फ़ौज को आज्ञा दी कि जो लोग अपना स्थान छोड़ कर भागते हैं, उन्हें मार दो। प्रातः ८ बजे युद्ध प्रारम्भ हुआ था और अब दो बज चुके थे। पर उस समय से लेकर अब तक यह भयंकर युद्ध एक क्षण के लिये भी न रुका। रणक्षेत्र में लहू की नदी बह निकली। मरते हुओं और घायलों की भयानक चिल्लाहट और कराहने की आवाज़, मारू बाजों तथा

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बन्दूकों और वीरों के जयकारों के घोष के साथ मिलकर चारों ओर व्याप्त हो गई। दो बज चुके थे। मरहठों की वीरता तथा अटल बाधा का मुसल- मान शत्रुओं पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा। अब्दाली भी, जो एक अनुभवी योद्धा तथा सेनापति था, मैदान छोड़ कर यमुना के दूसरी पार जाने की सोचने लगा। लेकिन उसने बड़ी चतुराई से १०००० मनुष्यों की एक सहायक सेना अलग रख छोड़ी थी। यह सोच कर कि इससे अच्छा अवसर फिर न मिलेगा उसने उन्हें स्वयं भाऊ पर आक्रमण करने की आज्ञा दी। यह ताज़ादम सेना बिजली की गति से मरहठों पर जा टूटी। सुबह से थके भाऊ और उनके सिपाही इससे भी नहीं डगमगाये। मरहठों ने उनकी इस ताज़ादम फ़ौज की इस टक्कर का बड़ी निर्भीकता से सामना किया। एक बार फिर स्पष्ट प्रतीत होने लगा कि मरहठों ने युद्ध को क़रीब क़रीब जीत लिया है। अब्दाली अपनी अन्तिम चालाकी चल चुका था। ठीक उसी समय एक सनसनाती हुई गोली यमदूत की तरह आई और वीर राजकुमार विश्वासराव को लगी जिससे घायल होकर वह हौदे पर गिर पड़ा। ऐसा सुन्दर और साहसी नवयुवक वीर, जिस पर समस्त जाति आँखें लगाये बैठी थी, प्राणघातक चोट लगने के कारण बेहोश हौदे पर लेटा पड़ा था। यह समाचार भाऊ के पास पहुँचा, जो अपनी सेना का अध्यक्ष था और उन्हें प्रोत्साहित करता हुआ तथा पथ- प्रदर्शित करता हुआ ऐसा अद्वितीय युद्ध कर रहा था जिसे संसार ने अभी तक अनुभव नहीं किया था। आकाश से वज्र की भाँति वह ख़बर भाऊ पर पड़ी। सेनापति अपने प्रिय भतीजे के पास जल्दी से गया और देखा कि उसे प्राणघातक घाव लगा है और वह अपने शाही हौदे में खून से लथपथ पड़ा है। उद्गिर-विजेता का पत्थर-सा कलेजा भी थोड़ी

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देर के लिये टूट गया और उसकी गालों पर आंसू ढुलकने लगे ! दुःख से उसका गला रुंध गया और वह सिसकते २ पुकारने लगा "विश्वास ! विश्वास !!" मरते हुए नवयुवक ने आँखें खोलीं और धीरोचित शब्दों में उत्तर दिया—"प्यारे चाचा, मेरे पास क्यों रुके हुये हो ? अपने सेनापति के दूर रहने के कारण शायद हमारी पराजय हो सकती है।" मृत्यु का कष्ट भी उस वीर मरहठा-राजकुमार से उसके कर्त्तव्य को भुला न सका । अब भी उसके मन में युद्ध का विचार ही था और वह चाहता था कि मैं मर भी जाऊँ, पर युद्ध में हमें विजय प्राप्त हो । उसकी उत्तेजना से भाऊ फिर उत्साहित हो गया और होश सम्भालकर बोल उठा—"इसकी क्या परवाह है, मैं स्वयं ही शत्रु को पराजित करूँगा।" ऐसा कह कर वह फिर अपनी शक्तिशाली सेना को व्यूहबद्ध करने दौड़ पड़ा । सत्य- वादी और शूरवीर अब भी अपने स्थान पर डटे थे और विजयश्री अब भी मरहठों के हाथ थी । पर विश्वासराव की मृत्यु का समाचार जंगल की आग की भाँति समस्त महाराष्ट्र-सेना में फैल गया, जिससे उन पर बड़ा बुरा प्रभाव पड़ा । उसी समय दूसरी आपत्ति आई । दो हज़ार मुसलमानों ने एक या दो महीने पहले मन्दाजी की नौकरी छोड़ दी थी और भाऊ ने उन्हें अपनी सेना में भर्ती कर लिया था । युद्ध में उन्हें शत्रुओं से भिन्न पहचानने के लिये उनके सिर पर मरहठा गेरुआ झण्डा की पट्टी बंधवा दी गई थी । शायद पहले ही से तै कर लेने के कारण, उन्होंने एकाएक मरहठा-निशान उतार फेंका और विश्वासराव की मृत्यु की अफ़वाह और झूठा भय फैलाते हुये पीछे की ओर मुड़े, जहाँ कैम्पों के रक्षक खड़े थे, और आक्रमण करके वहां लूट-मार शुरू करदी। सेना के पिछले भाग में पठानों को देखकर मराठे किंकर्त्तव्य विमूढ़ हो गये, और जो लोग आगे की ओर लड़ रहे थे यह सोच कर कि शत्रुओं ने पीछे की ओर विजय प्राप्त कर ली है, पंक्ति तोड़ कर भाग निकले ।

[ १२४ ] शत्रुओं को इस घटना पर विश्वास नहीं होता था। उन लोगों को पहले ही यह ज्ञात हो गया था कि अब वह प्रायः नाश के निकट हैं। मरहठे दाहिने, बायें और मध्य में भी विजय प्राप्त कर चुके थे। अब्दाली, जबकि अत्यन्त सख्ती के साथ अपने भागते हुये सिपाहियों का वध करता हुआ, अकेला ही अपनी सेना को तितर-बितर होने से रोक कर पूर्ण पराजय से बचने का उद्योग कर रहा था, एकाएक यह देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ कि किसी कारण मरहटों के पिछले भाग की सेना भयभीत होकर भागने की फ़िक्र में है। इसका कारण जानने से पहले ही अब्दाली की फ़ौज ने उस भयभीत पंक्ति पर आक्रमण कर दिया। इस अन्तिम आक्रमण का मरहठा-सेना का पिछला भाग मुक़ा- बिला न कर सका। दाहिने भाग पर युद्ध रुक गया और उसमें भगदड़ मच गई। परन्तु अब भी जिस स्थान पर भाऊ अपने कुछ चुने हुए आदमियों के साथ प्राण रहते जातीय झण्डे की रक्षा के लिये लड़ रहा था, घम- सान की लड़ाई हो रही थी। अपने योद्धाओं को 'लड़ो, मारो, काटो' इत्यादि शब्दों द्वारा उभारते २ भाऊ का गला बैठ गया। जब वह और न बोल सका तो इशारे से उत्साहित करते और उत्तेजना देते हुये अपने घोड़े को दौड़ाता हुआ बिल्कुल मौत के मुँह में ही चला गया। मुकुन्द शिएडे ने जब उसे इस प्रकार निराश देखा तो उसके घोड़े की लगाम पकड़ ली और अत्यन्त विनीत शब्दों में प्रार्थना की- "सेनापति ! आपने जो वीरता दिखाई है वह अमानुषिक है। हमारे शूरवीर योद्धाओं ने भी उतनी वीरता दिखला दी है जितनी मनुष्य के अन्दर हो सकती है। पर अब पीछे हट चलने में ही बुद्धिमानी है।" सेनापति भाऊ ये शब्द सुन कर चिल्ला उठा और कहने लगा- "क्या कहा ? हट चलो ?" क्या आप नहीं देखते कि हमारी जाति का शृङ्गार विश्वास मर गया और खेत में पड़ा है ? मैंने एक एक करके सेनापतियों को युद्ध करने की आज्ञा दी और शत्रुओं से लड़ते

[ १२५ ] हुये उन्होंने रण-यज्ञ में अपनी आहुतियां डाल दीं । अब मैं किस प्रकार रणक्षेत्र छोड़ कर अपनी जाति और नाना साहेब को मुँह दिखलाने के लिये जीवित रह सकता हूँ ? मारो, मारो और मृत्यु पर्य्यन्त शत्रुओं का संहार करो । यही मेरी अन्तिम आज्ञा है ।” मुकुन्द शिन्डे ने सेनापति को प्रणाम किया और उसकी इस अंतिम आज्ञानुसार घोड़े से कूद कर 'हर-हर महादेव' का जयघोष करता हुआ अन्धाधुन्ध शत्रुओं के मध्य में टूट पड़ा । नवयुवक जनकोजी, यशवन्त- राव पवार आदि सभी वीरों ने उसी का अनुसरण किया । और भाऊ ? उस पर तो मानो युद्ध का भूत सवार था, वह भी अन्धाधुन्ध शत्रु-सेना पर जा टूटा और सेना के बीच ऐसे स्थान पर जा घुसा जहाँ भयंकरतम युद्ध हो रहा था । अपने शब्दों को सत्य में परिणत करता हुआ, आखिरी दम तक शत्रुओं का वध करता हुआ तथा जातीय झण्डे की रक्षा करता हुआ वह वीर गति को प्राप्त हो गया । अन्तिम समाचार जो संसार के लोगों के पास उस वीर हिन्दू- सेनापति के सम्बन्ध में पहुँचा, वह यह था कि पानीपत की लड़ाई में जो हिन्दू-जाति की मुख्य हानि हुई, उसकी उसने वीरता और कर्त्तव्यपरा- यणता की आध्यात्मिक महिमा से क्षति-पूर्ति कर दी । १५ पराजय जिसने विजेता को भी नष्ट कर दिया ! ❀ “दन्तच्छेदोहि नागानाम् श्लाघ्यो गिरिविदारणे” पानीपत की लड़ाई से मरहठों की भयंकर हानि हुई, क्योंकि जिस समय भाऊ और उसके शूरवीर साथी अपने राष्ट्रीय झण्डे के चारों ओर अपूर्व युद्ध लड़ रहे थे, उस समय मरहठे सब मोर्चों से खदेड़े जा रहे थे और शत्रु बड़े उत्साह से उनका पीछा कर रहे थे । सहस्रों ❀ पर्वतों को उखाड़ने के लिये हाथियों के दांत ही समर्थ होते हैं ।

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वीर धराशायी हो गये और सहस्रों को विजयी मुसलमान कैदी बनाकर अपने खैमों में ले गये और प्रातःकाल उन्हें कतार में खड़ा कराकर बड़ी निर्दयतापूर्वक कत्ल कर डाला । इस लड़ाई में पठानों के हाथ लूट का माल भी बहुत आया । किन्तु मर्हठों ने अपने दुश्मनों से इसकी जो कीमत वसूल की वह इससे कहीं अधिक थी । पठानों ने विजय लाभ की पर इसके लिए उन्हें बहुत कीमत देनी पड़ी। अन्तिम दिवस पर ही यवनों के चालीस हजार सिपाही काम आये थे । गोविन्दपन्त का सिर काटने वाले सेनापति अताईखां, उस्मान तथा अन्यान्य मुस्लिम-नेताओं का वध किया गया । नज़ीबखां भी बुरी तरह ज़ख्मी हुआ । इसके अति- रिक्त मुसलमान भी यह अनुभव करने लगे कि उनकी जीत शक्ति और सेनापतित्व के कारण इतनी अधिक नहीं हुई जितना कि संयोगवश । मरहठे युद्ध में हार गये, परन्तु शत्रु पर इतनी कड़ी चोट लगाई कि वह सदा के लिये युद्ध में विजय प्राप्त करने के अयोग्य बन गया । यदि पानीपत में हार हो हुई तो क्या हुआ ? पानीपत में मर्हठे नष्ट हो गये थे, पर महाराष्ट्र में अब भी ज़िन्दा थे । प्रत्येक घर को अपने किसी-न-किसी सम्बन्धी के लिये, जो कि पानीपत की लड़ाई में शहीद हुआ था, शोक करना पड़ा था । इस पर भी उस समय महाराष्ट्र में ऐसा विरला ही कोई घर बचा होगा जिस ने अपनी राष्ट्रीय मर्यादा को पुनः स्थापित करने और अपने सिपाहियों के बलिदान को सार्थक बनाने तथा उस उद्योग को, जिसे के लिये उन्होंने अपने प्राण गंवाये थे, फलीभूत करने की प्रतिज्ञा न की हो । अब्दाली की कार्य्य-क्रमावली को रोकने के लिये पेशवा ५०,००० सेना के साथ पहले ही नर्मदा पार कर चुका था । अपनी जनता और मुख्यतः अपने परिवार पर आये हुए विपत्ति-समाचार को सुन कर, नाना ने पानीपत की दुर्घटना पर विचार किये बिना, आगे बढ़ कर अब्दाली की शक्ति को नष्ट-भ्रष्ट

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करने का दृढ निश्चय कर लिया ताकि वह उत्तर भारत स्थित मरहठा सेना की पराजय और उससे उत्पन्न बुराइयों का लाभ न उठा सके। यद्यपि उसका व्यक्तिगत शोक सचमुच असहनीय था और उसका स्वास्थ्य पहले ही से खराब था, तो भी अपनी जाति और सम्बन्धियों के बदला लेने और अब्दाली को हराने के भाव ने उसे चैन न लेने दिया। उसने समस्त उत्तर-भारत के हिन्दू-राजाओं को बड़े जोरदार शब्दों में पत्र लिखे जिनमें उसने लिखा कि आप लोगों ने युद्ध से अलग रह कर तमाशा देखने की जो आत्मघातिनी नीति ग्रहण की है उस पर धिक्कार है। और शत्रुओं की ओर उनका ध्यान दिलाते हुए लिखा कि आप के धर्म के शत्रु तथा हिन्दुत्व के विरोधी सब मिलकर हिन्दुओं की स्वतन्त्रता के नाश करने के लिये सुसंगठित उद्योग कर रहे हैं, अतः आप लोगों का युद्ध से अलग हाथ पर हाथ धरे रहना ठीक नहीं है। उस ने लोगों को हिन्दू धर्म की स्वतन्त्रता के युद्ध में अपनी सहायता करने के लिये निमन्त्रित किया और उन्हें विश्वास दिलाया कि यद्यपि हमें पानीपत के युद्ध में हार हुई तो भी मैं मुग़लों के नष्ट राज्य के स्थान पर अब्दाली का दूसरे मुसलिम-राज्य के स्थापित करने की महत्वाकांक्षा को निष्फल कर दूंगा। उस ने लिखा, "यह सत्य है कि मेरा नवयुवक राजकुमार विश्वासराव अभिमन्यु की तरह युद्ध करता हुआ स्वर्गगामी हुआ। मेरे भाई भाऊ और वीर जानकोजी के विषय में किसी को मालूम नहीं कि उनके साथ क्या बनी। इसके साथ कई अन्य सेना पति और सरदार भी मारे गये। लेकिन इन बातों की कोई चिंता नहीं करनी चाहिये। आख़िर यह युद्ध है। हार और जीत का प्रश्न बहुधा संयोग और ईश्वरेच्छा पर निर्भर रहता है। अतः इस का विशेष नहीं। इन सब के होते हुए भी हम इस के लिये प्रयत्न करेंगे।" इस अक्षय दृढ़ता तथा डटे रहने के गुण ने, जिसे मरहठों ने इस विकट जातीय नाश के समय भी प्रकट किया, उन्हें हिन्दुस्तान का

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स्वामी बना दिया। अब्दाली अपने शत्रुओं के स्वभाव से भली-भांति परिचित था और उनकी योग्यता का भी उसे पूर्ण ज्ञान था। ज्यों ही पानीपत में विजय प्राप्त हुई, अब्दाली ने सोचा कि यदि मैं शीघ्र अपने देश को न लौटा तो जो थोड़ा सा लाभ प्राप्त हुआ है, वह भी मुझे विवश होकर खो देना पड़ेगा। नाना साहब ने पानीपत के युद्ध में बचे हुए सरदारों और आदमियों को इकट्ठे कर लिया था। मल्हारराव होल्कर, विट्ठल शिवदेव, नरोशङ्कर, जानोजी भोंसले तथा अन्यान्य मरहठे- सरदार अपनी-अपनी सेनाओं के साथ ग्वालियर में एकत्र होने लगे और उनके साथ नानासाहब दिल्ली पर आक्रमण करने के लिये आगे बढ़ा। मरहठों के इस विचार को जान कर शुजा और नजीबखां भी कांप उठे, उन्हें निश्चय हो गया कि पानीपत के युद्ध में विजय प्राप्त करने का यह अर्थ नहीं है कि मरहठों पर विजय प्राप्त कर ली है। अतएव उन्होंने स्वतन्त्र रूप से सुलह की बात-चीत करनी प्रारम्भ की और नाना साहब के पास, जो ग्वालियर तक आ पहुँचा था, चापलूसी-भरे पत्र भेजने लगे। शुजा इस तथ्य को भली-भांति जानता था कि अब्दाली न ही अकेले, और न ही औरों की सहायता से हिन्दुओं को कुचल सकता है और न ही मुगल राज्य के लड़खड़ाते भवन को गिरने से बचा ही सकता है। अतः मुसलमानों की सेनाओं में भगदड़ मच गई। प्रत्येक सेना अपने बचाओ का उपाय सोचने लगी। इसलिये शुजा ने भी अब्दाली का साथ छोड़ दिया। अब्दाली दिल्ली लौट आया और वहां एक-दो सप्ताह ठहरा। नाना साहब ५०,००० सेना लेकर दिल्ली की ओर बड़ी तेज़ी के साथ आ रहा था। जब यह समा- चार पहुँचा कि अब्दाली के देश पर फारस वालों ने आक्रमण किया है तो अब्दाली का ध्यान उसी ओर गया और चिन्तित हो दिल्ली और दिल्ली के राज्य को छोड़ कर सन् १७६१ ई० में मार्च के महीने में सिन्ध को पार कर के जल्दी से वह अपने देश को लौट गया। इस प्रकार जिन इच्छाओं से प्रेरित होकर उसने सिन्ध पर आक्रमण किया

[ १२६ ] था, वे सारी मिट्टी में मिल गईं और वह जैसे खाली हाथ आया था उसी प्रकार वापिस चला गया । विदेशी स्वधर्मियों की सहायता द्वारा दिल्ली-राज्य को, हिन्दुओं के आक्रमण से बचाने के लिये भारतीय मुसलमानों का यह अन्तिम प्रयत्न था। उन्होंने पानीपत की लड़ाई को जीता; किन्तु इस जीत के परिणाम स्वरूप उनकी महाराष्ट्र मंडल की हिन्दू शक्ति को नष्ट करने या मरहठों की प्राणविनाशक पकड़ से मुसलमानी राज्य के गले को छुड़ा कर उसकी रक्षा करने के अन्तिम अवसर का भी अन्त हो गया । इसके बाद कभी विदेशीय पठान दिल्ली न पहुँच सके। उन्होंने शीघ्र ही सिंध नदी पार करना बंद कर दिया । पानीपत के नाश के पश्चात् हिन्दुओं की एक दूसरी प्रबल शक्ति का भी पंजाब में बड़ी शीघ्रता से विकास हुआ। यह शक्ति सिक्ख-मंडल की थी। इन शूरवीरों ने अपनी धार्मिक संस्था को धीरे २ स्थापित किया, जिसे उन्होंने शहीदों के रक्त से सींच कर शीघ्र ही एक शक्तिशाली राज्य में परिणत कर दिया। दसवें गुरु गोविन्द सिंह जी तथा वीर योद्धा और अपने धर्म पर बलि देने वाले बन्दा बहादुर की अध्यक्षता में सिख लोग हिन्दुओं की स्वतन्त्रता के लिये पंजाब में लड़े इन दोनों महा- पुरुषों की पूजा हिन्दुस्तान के जातीय हिन्दू-शूरवीरों की श्रेणी में सदैव होती रहेगी । बन्दा की अध्यक्षता में कुछ समय तक वे अपने देश के कुछ भाग को स्वतन्त्र करने में सफल हुए किन्तु पंचनद के अन्तर्गत देश को हिन्दू राज्य के भीतर लाने का काम अब भी मरहठों के लिये ही सुरक्षित पड़ा था । इस कठिन काम को उन्होंने सम्पूर्ण किया और यद्यपि मरहठा वीर अपने घरों से सुदूर लड़ रहे थे और शेर को उसकी नींद में ही ललकार रहे थे तो भी उन्होंने हिन्दू-ध्वजा को सीधे अटक तक पहुँचा ही दिया । पृथ्वीराज के पश्चात् यह पहला ही मौका था जब हिन्दुओं की ध्वजा वहां तक पहुँची । जिस समय वे मुसलमानों तथा उनके सहायक नादिरशाह और अब्दाली के मुग़ल राज्य के

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पुनरुत्थान के प्रयत्न को अपनी वीरता और साहस द्वारा असफल बना रहे थे, उन्हीं दिनों सिक्खों को अपने तईं एक शक्तिशाली मंडल में संगठित करने का अवकाश मिल गया। पानीपत के युद्ध में इतनी बड़ी हानि उठा कर अब्दाली ने पंजाब के राज्य को अपने राज्य में मिलाने का जो थोड़ा बहुत सुख स्वप्न देखा था इस नई शक्ति ने उसमें भी से वंचित कर दिया। अब पंजाब महाराष्ट्रीय हिन्दुओं के हाथ से निकल जाने पर भी मुसलमानों के हाथ में न रह सका। अब्दाली के प्रस्थान करते ही पंजाब के हिन्दुओं ने उनके मोर्चों पर आक्रमण कर दिया और यद्यपि वह दोबारा सिंध पार करके आया तो भी उन्होंने अपनी मातृ-भूमि को स्वतन्त्र करा ही लिया। शीघ्र ही मरहठों ने भी दिल्ली में प्रवेश किया और एक बार फिर वे सम्पूर्ण भारतवर्ष की सर्वश्रेष्ठ राज्य-शक्ति बन गये। सिक्खों ने भी सोचा कि वे कभी भी अपना शासन अपने प्रांत की सीमाओं के पार, पूर्व की ओर दिल्ली तक न बढ़ा सकेंगे तो भी वे इतने शक्तिशाली हो गये थे कि अपनी रक्षा बाहर से आने वाले शत्रुओं से भलीभांति कर सकते थे। अतः फिर कभी भयानक हठधर्मी तथा लोभी पठानों या तुर्कों की इच्छा सिन्धु पार करने की न हुई। उलटे सिक्खों ने ही सिन्धु नदी पार कर के अपनी जातीय ध्वजा को बड़ी धूमधाम से काबुल नदी के किनारे तक पहुंचा कर शत्रुओं को नतमस्तक होने पर विवश किया। उनके आतंक से मुसलमान इतने भयभीत हो गये थे कि पठानों के घरों में सिक्खों का नाम लेकर छोटे २ बच्चों को डराया जाता था। पान-हिन्दू-दृष्टि से देखा जाये तो मुसलमान सर्वथा अपना स्वार्थ सिद्ध करने में असमर्थ रहे। उन्होंने पानीपत की लड़ाई में विजय तो अवश्य प्राप्त की पर इस विजय में वे उस युद्ध में हार गये जिसे उन्होंने हिन्दू-पद-पादशाही स्थापित करने वालों के विरुद्ध उठाया था, और पानीपत के साथ साथ उन्हें सारे हिन्दुस्तान अर्थात् अटक से लेकर समुद्र तक के सारे प्रदेश को हिन्दुओं के अधीन छोड़ना पड़ा।

[ १३१ ] पर उन्हीं दिनों जब कि हिन्दू इस बड़ी लड़ाई को उत्तर भारत में अपने यवन विरोधियों के साथ लड़ रहे थे, एक तीसरा लड़ाका इस भीषण तमाशे को देखता रहा और धूर्तता से धीरे २ लड़ने वालों की श्रेणी में आने का प्रबन्ध करने लगा । पानीपत की लड़ाई से इन्हें ही सब से अधिक प्रसन्नता हुई क्योंकि पानीपत की लड़ाई से हिन्दू और मुसलमान दोनों शक्तिहीन हो रहे थे । अतः मरहठों को बंगाल पर आक्रमण करने के निश्चय को किसी अन्य समय के लिये उठाना पड़ा । पानीपत की लड़ाई के वास्तविक विजेता न हिन्दू थे और न मुसलमान- वरन ये धूर्त षड्यन्त्रकारी अँग्रेज थे जो कि उस युद्ध को ध्यानपूर्वक देखते रहे और उन दोनों की दुर्बलताओं का लाभ उठाते रहे । यद्यपि यह बात सत्य है कि पानीपत की लड़ाई ने ईस्ट इण्डिया- कम्पनी को कुछ दिनों के लिये और जीवन-प्रदान कर दिया और मरहठों को विवश किया कि वे अँग्रेज़ों के साथ अपना अंतिम हिसाब- किताब करने के विचार को स्थगित कर दें, तथापि यह सोचना भूल है कि केवल इस लड़ाई से ही अंग्रेज़ों को कोई बड़ा स्थायी लाभ हुआ हो क्योंकि हम आगे देखेंगे कि मरहठों ने शीघ्र ही पानीपत की क्षति को पूरा कर लिया था । यदि मरहठों में घरेलू झगड़े न उत्पन्न हुए होते तथा उनके सुयोग्य नेताओं की असामयिक मृत्युएं न हुई होती तो पानीपत में हार होने पर भी उन्होंने अंग्रेज़ों को भी जीत लिया होता । अंग्रेज़ों की सफलता मरहठों के पानीपत में हारने के कारण उतनी अधिक न हुई जितनी कि अन्त समय उनमें आपस में लड़ाई हो जाने के कारण हुई । इस विषय में मेजर इवानमब्राल लिखता है—"पानीपत की लड़ाई भी मरहठों के लिये गौरव और विजय ही सिद्ध हुई । मरहठे हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तानियों के लिये लड़े, पर उनके हार जाने पर भी विजयी

[ १३२ ] अफ़गानों को अपने देश को लौट जाना पड़ा और इसके पीछे उन्होंने कभी हिन्दुस्तान के कामों में हाथ न डाला।" जब अब्दाली के शीघ्र लौट जाने का समाचार और शुजा तथा नजीबखां के प्रार्थना-पत्र मरहठों के पास पहुँचे तो उनकी प्रसन्नता का पारावार न रहा। नारोशंकर ने पानीपत की लड़ाई के दो महीने पश्चात् लिखा था—"ईश्वर का धन्यवाद है कि धर्म के स्तम्भ मरहठे हरिभक्तों की सेना अब भी हिन्द की स्वामिनी है।" सेनापति का यह वीरता-पूर्ण अंतिम वाक्य क्रमशः एक के पश्चात् दूसरे मरहठे की ज़बान से सुनाई देने लगा और सभी कहने लगे 'इसकी कोई चिन्ता नहीं, आखिर यह युद्ध है, हम इसके लिये पुनः प्रयत्न करेंगे।" इसी बीच में नानासाहब का स्वास्थ्य क्रमशः शोचनीय होता गया क्योंकि अन्तिम दो वर्षों से उनका शरीर शिथिल होता जा रहा था और इसी समय पानीपत का दुःखद समाचार उनको मिला। उन्होंने शूरवीरों की भांति इसे सहन करने का प्रयत्न किया, अपनी व्यक्तिगत दुःख-वेदना को छिपाकर अपनी जाति को इतना उत्साहित और इस योग्य बनाया कि वह अपनी पराजय का बदला ले सकें और बढ़कर एक शक्तिशाली और विजयी जाति बन जायें। किन्तु उसके हृदय में विश्वास, भाऊ तथा बहादुर सैनिकों और सिपाहियों की मृत्यु का दुःख ऐसा बैठ गया था कि कोई भी वस्तु उन्हें सांत्वना प्रदान न कर सकी। इनका स्वास्थ्य पहले ही से बिगड़ता जाता था, इस चिन्ता ने दशा और भी शोचनीय बना दी और अन्त में वे २३ जून सन् १७६१ ईस्वी को इस असार संसार से चल बसे। उस समय उनकी अवस्था केवल ४१ वर्ष की थी। इस प्रकार मरहठों के एक वीर नेता की असामयिक मृत्यु ने सारी प्रजा को दुःख सागर में डुबो दिया। उनकी योग्यता और उनके चरित्र के सम्बन्ध में यहां कुछ लिखना व्यर्थ है। उन्हें उनके कार्य, शब्दों की अपेक्षा अधिक बतला सकते हैं।

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उनका राज्य-प्रबन्ध भी न्यायपूर्ण और सर्वप्रिय था । उनके शासन-काल को मरहठे अब भी धन्यवादपूर्वक स्मरण करते हैं । महाराज शिवाजी के हिन्दू-पद-पादशाही स्थापित करने के उद्देश्य को कार्य-रूप में परिणत करने का कार्य उन्हीं के करने के लिये सुरक्षित पड़ा था । वास्तव में उन्होंने ही सारे भारतवर्ष को यवनों के पंजे से मुक्त कराया । उनके राज्य काल में, पृथ्वीराज की पराजय के बुरे दिन के छः सौ वर्ष पश्चात, आज हिन्दू-गौरव सबसे ऊँची चोटी पर पहुँच पाया था । निस्सन्देह यदि वे संसार मे अपने समय के सबसे बड़े आदमी नहीं, तो भी महान् व्यक्तियों में से अवश्य थे । बालाजी-उपनाम नानासाहब-की असामयिक मृत्यु से जो राष्ट्र को हानि हुई वह पानीपत की लड़ाई की हानि से यदि अधिक न थी तो उस से किसी अंश में कम भी न थी । ये दो बड़े भयानक आघात इस जाति पर एक साथ पड़े । इन घटनाओं से जो राष्ट्र को धक्का लगा उसकी क्षति-पूर्ति के लिए कुछ समय लगा ।

१६ धर्मवीर माधोराव ॐध्रुवमधिपतिर्बालावद्गोप्यत्वं परिचितुम् । न खलु वयसा नात्येवायं स्वकार्य सहोद्भरः ॥ नानासाहब की मृत्यु के पश्चात् मरहठों को नेताविहीन देखकर और यह विचार करके कि पानीपत की लड़ाई में हार होने के कारण महाराष्ट्र-मण्डल नष्ट हो जाएग, शत्रु लोगों ने सिर उठाया और चारों ओर से उसे घेर लिया । हैदरअली को अवसर मिल गया और उसने मैसूर के राज्य को हिन्दू-राजा के हाथ से छीन लिया तथा मरहठों के दक्खिन राज्य पर आक्रमण किया । निजाम

ॐयह व्यक्ति बालक होता हुआ भी स्वामी बनकर राज्य को संभाल सकता है । यद्यपि इसकी आयु छोटी है तो भी यह स्वभाव से ही अपने राज्य का कार्य भार उठा सकता है ।