हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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चाहे कैसा भी दुःख क्यों न उठाना पड़े—और विजय भी चाहे प्राप्त न हो—तो भी कम-से-कम हार ऐसा हो जो हमारी आने वाली सन्तति को सर्वदा उत्साह और स्वाभिमान से भरती रहे। यह हार बहुत-सी सफलताओं की अपेक्षा श्रेष्ठ है। एक आवश्यक सैनिक सभा निमंत्रित की गई जिस में यह निश्चय हुआ कि पूर्ण रूप से युद्ध के लिये सन्नद्ध हो दिल्ली की तरफ प्रस्थान किया जाय और यदि अब्दाली सामना करे तो उस पर आक्रमण किया जाय और उसको पीठ को काट कर उससे युद्ध किया जाय। 'अगर' की शर्त अनावश्यक थी क्योंकि अब्दाली उन्हें बच जाने देने वाला आदमी था। हजारों वीर "हरिभक्तों" की सेना उसी 'जरीपताका' या सुनहले गेरुवा झंडे के आगे ओर एकत्रित हो गई। शीघ्र ही उनका सेना-नायक, नेताओं द्वारा निर्धारित भविष्य कार्य क्रम की घोषणा करने को उठ खड़ा हुआ। ज्यों ही उन लोगों को शत्रु से युद्ध करने का फ़ैसला बतलाया गया, उस बृहत् शस्त्रधारी जमघट ने उच्च ध्वनि से इसका समर्थन किया। सब कार्य-क्रम समझाया गया इस महान् नेता ने प्रतिष्ठित जातीय झंडे की ओर संकेत करते हुए, जिसके नीचे सब लोग खड़े थे, अपने मनुष्यों के सामने एक सारगर्भित वक्तृता दी; जिसमें उसने बतलाया कि किस प्रकार मौन वाणी द्वारा यह भगवा अपना सुविख्यात इतिहास बतला रहा है कि किस प्रकार रामदास ने इसे शिवाजी को हिन्दू-पद-पादशाही के 'स्वधर्म-राज्य' के वृहत् कार्य के लिये चेतावनी-स्वरूप दिया था; किस तरह हमारे पूर्वज और अमर शहीदों ने विजय-पर-विजय प्राप्त कर के समस्त हिन्दुस्तान को अटक से श्वणकोट और समुद्र पर्यन्त इसके अधीन सम्मिलित किया; और किस प्रकार हिन्दुत्व के विरोधियों ने जब कभी सर उठा, तो या तो उन्होंने इस के सामने सिर झुकाया या नष्ट हो गये। क्या अब हम इसे शत्रुओं को सौंप दें ? झुका दें ? या जिस संदेश का यह परिचायक है, उस महान् कार्य के लिये लड़ते २ जान दे दें ?