हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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एक लाख शूरवीरों ने 'हर-हर महादेव' का जय घोष किया और अपनी- अपनी तलवार निकाल कर जातीय झण्डे, उनके बतलाये हुये कार्य्य तथा अपने सेनापति के प्रति, जिसने विजय-पर-विजय प्राप्त करने में उनका पथ प्रदर्शन किया था, भक्ति रखने की प्रतिज्ञा की। १५ जनवरी की सुबह को सारी मरहठा फ़ौज व्यूहबद्ध होकर निकल पड़ी। भाऊ और विश्वासराव सेना के मध्य भाग के संचालक बने। जनकोजी उनके दाहिनी ओर खड़े हुए। तथा मल्हरराव होल्कर सेना के आगे हुए। दामाजी गायकवाड़, यशवन्तराव पवार, अंताजी मानकेश्वर, विट्ठल शिवदेव, और शमशेर बहादुर - ये सब बाईं ओर से सेना की रक्षा के लिए नियुक्त किये गये। अपने उत्तम तोपखाने को वीर इब्राहीम गार्दी की अध्यक्षता में, जो मुसुलमान होते हुये भी अपने मालिकों का मरते दम तक नमकहलाल रहा, सबसे आगे रखा। इस प्रकार भयङ्कर रीति से व्यूहबद्ध महाराष्ट्र- सेना ने अपना शिविर छोड़ा और सहस्रों नरसिंगों, नक्कारों, नफ़रियों और युद्ध-वाद्यों को बजाते हुये उन्होंने कूच का डंका बजा दिया। ज्यों ही अब्दाली को मरहठों के आने की सूचना मिली वह भी मुक़ाबिला करने के लिये निकल खड़ा हुआ। उसकी सेना के मध्य भाग का संचालन उसका वज़ीर शाहनवाज़खाँ कर रहा था। उसकी दाईं ओर रुहेले तथा बायें भाग में नजीबखां और शुजा थे। उसने भी अपनी तोपें सेना के आगे रक्खीं। शीघ्र ही दोनों सेनाओं में युद्ध आरंभ हो गया। बन्दूकों और तोपों ने अपना भीषण कार्य्य आरम्भ कर दिया। उन बड़ी सेनाओं के चलने से उठी हुई धूल और तोपों के धुएं के कारण आकाश में अन्धकार छा गया। दिन निकलने के बहुत देर बाद तक सूर्य दिखाई न दिया। जब शत्रुओं ने भलीभांति एक-दूसरे को देखा तो यशवंतराव पवार और विट्ठल शिवदेव ने पहले पहल आक्रमण किया। घमसान का युद्ध होने लगा। मरहठों ने एक ही झपट में रुहेलों को पीछे हटने पर विवश कर