भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 118, कुल 254 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 118

[ २१५ ]

अब्दाली ने बड़ी ही कृपा करके उसे बहुत सी डींगों से भरे हुए पत्र के साथ भाऊ के पास भेज दिया। सैनिक दृष्टि से अब भी अब्दाली को परास्त करने की बहुत सम्भावना थी, क्योंकि इतना चौकस पहरा होते हुये भी मरहठों की विपत्ति का समाचार दक्षिण में जा पहुँचा और बालाजी अनुमानतः ५०,००० मनुष्यों की शक्तिशाली सेना के साथ, अपने आदमियों की सहायता के लिये रवाना हो पड़ा। अगर मरहठे एक महीना और डटे रह सकते तो दोनों सेनाओं के बीच अब्दाली पिस जाता। परन्तु फ़ाके का क्या उपाय हो सकता था? सैंकड़ों बोझ ढोने वाले पशु तथा घोड़े प्रतिदिन भूख से मरने लगे। उनके सड़ने की दुर्गन्धि सैनिकों के स्वास्थ्य के लिये फ़ाकों के समान ही भयावह होने लगी। अब केवल एक ही उपाय उस समय युद्ध प्रारम्भ करने का था। उमंग भरी सेना प्रतिदिन भाऊ के खेमे पर इकट्ठी हो करुणामय प्रार्थना करने लगी कि हमें भूख और दुर्गन्धि से प्राण त्याग करने की अपेक्षा रणभूमि में जाकर मरने की आज्ञा दीजिये। लेकिन क्या भूखों मरने से बचने के लिये अब भी एक और मार्ग न था अर्थात् “बिना- शर्त हिन्दू-महान्-कार्य से त्याग-पत्र दे देना”, जिसके लिये कि उनके पूर्वजों की कई पीढ़ियां जीवित रहीं तथा उसी कार्य को करते हुए मरीं थीं? तो क्या वे ऐसा करके तथा अब्दाली को शाहंशाह मान कर स्वतन्त्रता से त्याग-पत्र दे दें? नहीं, किसी प्रकार भी नहीं। कोई मरहठा इसके लिये राय देने को तय्यार न था। आपत्तिग्रसित और क्षुधातुर होते हुए भी उन्होंने भयंकर विषमता का ध्यान न करते हुये इस बुद्धिमानी से शत्रु का सामना करने का निश्चय किया कि चाहे युद्ध में उनके मनोरथ सफल न हों तो भी विपक्ष की सफलता धूल में मिल जाय। इस श्रेणी के मनुष्यों के बीच भाऊ अजेय साहस और बल से कभी भी विचलित न होते हुए खड़ा था। उसने निर्भय होकर प्रतिज्ञा कर ली कि मैं हार कभी न मानूंगा और न कोई ऐसा कार्य्य ही करूंगा जिस से जातीय प्रतिष्ठा पर धब्बा लगे, और विजय प्राप्त करने के लिये