भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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पृष्ठ 117

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विजय प्राप्त की, परन्तु एक योग्य और महान् सेनापति से हाथ धो बैठे । उसकी लाश बड़ी प्रतिष्ठा के साथ छावनी में लायी गई और उसके स्मारक में एक विजयी को सैनिक मान से सम्मानित किया गया । भाऊ को औरों की अपेक्षा उसकी मृत्यु पर अधिक शोक हुआ और स्वयं उसकी अन्त्येष्टि-क्रिया में सम्मिलित हुआ । उस वीर की धर्मपत्नी ने, जो अपने पति से कम बहादुर न थी, भाऊ के अत्यन्त आग्रह करने पर भी उसके साथ चिता में सती होकर अपने को बलिदान कर देने का दृढ़ निश्चय किया । समस्त सेना अपने वीर शहीद के प्रति अन्तिम अत्यन्त प्रेम भरा सम्मान प्रदर्शित करने को आई । हजारों मनुष्य भक्तिपूर्वक चिता को घेर कर प्रसिद्ध शहीद तथा वीर मरहठा कन्या की, जो अग्नि की शिखाओं में अपने प्रिय मृतक के सिर को हिफ़ाज़त से गोद में रक्खे बैठी थी, भक्तिपूर्ण अभ्यर्थना करते हुये खड़े रहे । इस प्रकार अब्दाली दो लड़ाइयां लड़ा और दोनों में ही उसको मुँह की खानी पड़ी । लेकिन इसमें भी मरहठा के भूखों मरने का प्रश्न हल न हो सका । इसमें कोई सन्देह नहीं कि यद्यपि गोविन्दपन्त की निद्रा अब भंग हुई और उसने अब्दाली की रसद पहुँचानी बन्द कर दी थी; तथापि अब बहुत देर हो चुकी थी । और साथ ही वह अधिक दिनों तक इस काम को जारी भी न रख सका क्योंकि अताई खाँ ने दस हजार फौज के साथ बनावटी झंडे के नीचे गोविन्दपन्त पर आक्रमण कर दिया । मरहठों ने होल्कर का झंडा देख कर आगे बढ़ते हुए पठानों को तब तक मित्र ही समझा जब तक कि उन्होंने सच- मुँच उनको काटकर गिराना शुरू न कर दिया । आखिरकार गोविन्द- पन्त भी काट डाला गया, और उसने वह जीवन खो दिया, जिसे अगर वह भाऊ के आज्ञानुसार चार महीने पहले खतरे में डालता तो बहुत संभव था कि वह अपनी जाति और अपने आप को भी एक बड़ी विपत्ति से बचा लेता । पठानों ने गोविन्दपन्त का शिर काट लिया और