भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 254 में से

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पृष्ठ 116

[ ११६ ] मरहटों ने अपने शूरवीरों का विजय की सलामी के साथ स्वागत किया। अपने सिपाहियों के मस्तिष्क से पराजय के उत्साहहीन करने वाले प्र- असर को निकालने के लिये अब्दाली ने १४ दिन बाद चुनी हुई से- को आज्ञा दी कि वह अंधेरा होते ही रवाना हो जाये और मराठी से- के मध्य भाग पर रात के समय अन्धेरे में आक्रमण करे। लेकिन आगे बढ़ने पर जब इन लोगों ने बलवन्तराव मेहेन्डले को ५० हज़ार फ़ौ- के साथ युद्ध के लिये प्रस्तुत आते देखा, तो इन के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। पठानों ने फ़ौरन अपनी तोपें मरहटों पर चलानी आरम्भ कर दीं। पर चूंकि मरहठे तोपें नहीं लाये थे; इसलिये उनकी अधिक हानि हुई। शीघ्र ही ऐसा आभास होने लगा कि मरहटे डगमगा जायेंगे। लेकिन उनका सेनापति बिजली की तरह घोड़ा आगे दौड़ा लाया और अपनी सेना को ललकारते हुये उसने कहा कि झण्डे को अपमानित न होने देना। उन्हें चारों ओर से बटोर कर व्यूहबद्ध किया और अपनी तलवार को भयङ्कर रूप से ऊँची उठा कर एक दम आक्रमण करने की आज्ञा दी। मरहठे दौड़ कर शत्रुओं पर टूट पड़े, उनकी तोप को शांत कर दिया और मौत के मुंह में आ गये। सबसे आगे उनका वीर सेनापति बलवन्तराव मेहेन्डले था। घमासान का रण छिड़ पड़ा। एक गोली आकर सेनापति को लगी और वह वहीं गिर कर ढेर हो गया। यह देख कर मुसलमान उसका सिर विजय के चिन्ह के रूप में काट कर ले जाने के लिए उस पर टूट पड़े, परन्तु निम्बालकर ने उनकी तलवारों और सेनापति की लाश के बीच में अपने को डाल दिया और गहरी चोट खाने पर भी उसके मृत शरीर को उस समय तक ढाँपे रक्खा, जब कि मरहटों- ने आकर उसे शत्रुओं से छुड़ा न लिया। इस समय तक हज़ारों पठान काम आ चुके थे और मुसलमानों ने और डटा रहना कठिन समझा। इसलिये पहले तो वे लोग भागने से झिझके, फिर बुरी तरह पराजित होकर पीठ दिखा कर हज़ारों साथियों को मरहटों के सामने रणभूमि में छोड़ कर अपने पड़ाव की ओर भाग गये। मरहटों ने एक घड़ी