भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 115, कुल 254 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 115

[ ११५ ] भाऊ युद्ध करने के लिये विख्यात कुरुक्षेत्र की ओर बढ़ा और उसने पानीपत में खेमा लगा दिया। मरहठों को पूर्ण विश्वास था कि यदि गोविन्दपन्त और गोपाल गणेश ने अपना कार्य्य अच्छी प्रकार से किया और शत्रुओं की रसद बन्द करके उसके पिछले भाग पर आक्रमण किया तो वे अब्दाली को पीस डालेंगे। पर गोविन्दपन्त उस काम के करने में बुरी तरह असफल रहा। आवश्यक आज्ञा, धमकियां—भाऊ ने सभी का आश्रय लिया, पर गोविन्दपन्त ने इतना भी उद्योग नहीं किया जितना वह कर सकता था। जाटों ने पहले ही मरहठों का साथ छोड़ दिया था और वे एक सुरक्षित दूरस्थ स्थान भरतपुर की राजधानी से युद्ध का तमाशा देख रहे थे। तो भी उनकी यह प्रशंसनीय बात उल्लेखनीय है कि उन्हों ने कभी कभी मरहठों की रसद आदि द्वारा सहा- यता की थी। लेकिन राजपूतों ने तो उतना भी नहीं किया। उनमें कोई भी मरहठों का मुक़ाबिला करने का साहस नहीं रखता था, और बहुतेरे चाहते थे कि वे नष्ट हो जांय। इन हिन्दू-राजाओं की आत्मघातिनी आशा कहां तक सफल हुई, यह भविष्य का इतिहास बतलायेगा। इस लिए यद्यपि दोनों दलशत्रु के यातायात का रास्ता काटकर उसे भूखोँ मारने का विकट प्रयत्न करके उस पर आक्रमण करना चाहते थे, तोभी ज्यों ज्यों दिन बीतते गये, अब्दाली की अपेक्षा मरहठे कहीं अधिक क्षुधापीड़ित होने लगे। आखिरकार २२ नवम्बर को जनकोजी सिंधिया ने अपने पड़ाव से चल कर मुस्लिम-फौज पर आक्रमण कर दिया। सारे मुहाज पर बड़ा भयंकर युद्ध छिड़ गया। नवयुवक महाराष्ट्र-सेनापति तथा उसके पुराने तजुर्बेकार योद्धाओं की अनुपम वीरता के सामने डटे रहने में असमर्थ मुस्लिम-सेना शाम को पीछे भागी और मरहठों ने सरगर्मी के साथ उसे भगाकर उसका पड़ाव तक पीछा किया। यदि अन्धेरा न हो गया होता तो उसी दिन मुसलमानों की पूर्ण पराजय हो जाती।