भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 122, कुल 254 में से

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बन्दूकों और वीरों के जयकारों के घोष के साथ मिलकर चारों ओर व्याप्त हो गई। दो बज चुके थे। मरहठों की वीरता तथा अटल बाधा का मुसल- मान शत्रुओं पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा। अब्दाली भी, जो एक अनुभवी योद्धा तथा सेनापति था, मैदान छोड़ कर यमुना के दूसरी पार जाने की सोचने लगा। लेकिन उसने बड़ी चतुराई से १०००० मनुष्यों की एक सहायक सेना अलग रख छोड़ी थी। यह सोच कर कि इससे अच्छा अवसर फिर न मिलेगा उसने उन्हें स्वयं भाऊ पर आक्रमण करने की आज्ञा दी। यह ताज़ादम सेना बिजली की गति से मरहठों पर जा टूटी। सुबह से थके भाऊ और उनके सिपाही इससे भी नहीं डगमगाये। मरहठों ने उनकी इस ताज़ादम फ़ौज की इस टक्कर का बड़ी निर्भीकता से सामना किया। एक बार फिर स्पष्ट प्रतीत होने लगा कि मरहठों ने युद्ध को क़रीब क़रीब जीत लिया है। अब्दाली अपनी अन्तिम चालाकी चल चुका था। ठीक उसी समय एक सनसनाती हुई गोली यमदूत की तरह आई और वीर राजकुमार विश्वासराव को लगी जिससे घायल होकर वह हौदे पर गिर पड़ा। ऐसा सुन्दर और साहसी नवयुवक वीर, जिस पर समस्त जाति आँखें लगाये बैठी थी, प्राणघातक चोट लगने के कारण बेहोश हौदे पर लेटा पड़ा था। यह समाचार भाऊ के पास पहुँचा, जो अपनी सेना का अध्यक्ष था और उन्हें प्रोत्साहित करता हुआ तथा पथ- प्रदर्शित करता हुआ ऐसा अद्वितीय युद्ध कर रहा था जिसे संसार ने अभी तक अनुभव नहीं किया था। आकाश से वज्र की भाँति वह ख़बर भाऊ पर पड़ी। सेनापति अपने प्रिय भतीजे के पास जल्दी से गया और देखा कि उसे प्राणघातक घाव लगा है और वह अपने शाही हौदे में खून से लथपथ पड़ा है। उद्गिर-विजेता का पत्थर-सा कलेजा भी थोड़ी