हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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देर के लिये टूट गया और उसकी गालों पर आंसू ढुलकने लगे ! दुःख से उसका गला रुंध गया और वह सिसकते २ पुकारने लगा "विश्वास ! विश्वास !!" मरते हुए नवयुवक ने आँखें खोलीं और धीरोचित शब्दों में उत्तर दिया—"प्यारे चाचा, मेरे पास क्यों रुके हुये हो ? अपने सेनापति के दूर रहने के कारण शायद हमारी पराजय हो सकती है।" मृत्यु का कष्ट भी उस वीर मरहठा-राजकुमार से उसके कर्त्तव्य को भुला न सका । अब भी उसके मन में युद्ध का विचार ही था और वह चाहता था कि मैं मर भी जाऊँ, पर युद्ध में हमें विजय प्राप्त हो । उसकी उत्तेजना से भाऊ फिर उत्साहित हो गया और होश सम्भालकर बोल उठा—"इसकी क्या परवाह है, मैं स्वयं ही शत्रु को पराजित करूँगा।" ऐसा कह कर वह फिर अपनी शक्तिशाली सेना को व्यूहबद्ध करने दौड़ पड़ा । सत्य- वादी और शूरवीर अब भी अपने स्थान पर डटे थे और विजयश्री अब भी मरहठों के हाथ थी । पर विश्वासराव की मृत्यु का समाचार जंगल की आग की भाँति समस्त महाराष्ट्र-सेना में फैल गया, जिससे उन पर बड़ा बुरा प्रभाव पड़ा । उसी समय दूसरी आपत्ति आई । दो हज़ार मुसलमानों ने एक या दो महीने पहले मन्दाजी की नौकरी छोड़ दी थी और भाऊ ने उन्हें अपनी सेना में भर्ती कर लिया था । युद्ध में उन्हें शत्रुओं से भिन्न पहचानने के लिये उनके सिर पर मरहठा गेरुआ झण्डा की पट्टी बंधवा दी गई थी । शायद पहले ही से तै कर लेने के कारण, उन्होंने एकाएक मरहठा-निशान उतार फेंका और विश्वासराव की मृत्यु की अफ़वाह और झूठा भय फैलाते हुये पीछे की ओर मुड़े, जहाँ कैम्पों के रक्षक खड़े थे, और आक्रमण करके वहां लूट-मार शुरू करदी। सेना के पिछले भाग में पठानों को देखकर मराठे किंकर्त्तव्य विमूढ़ हो गये, और जो लोग आगे की ओर लड़ रहे थे यह सोच कर कि शत्रुओं ने पीछे की ओर विजय प्राप्त कर ली है, पंक्ति तोड़ कर भाग निकले ।