भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 254 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 134

[ १३४ ]

हैदराबाद अपनी उद्गिर की हार का बदला लेने के लिये बड़े ज़ोर से तय्यारी करने लगा। अंग्रेज़ भी यथाशक्ति नोच-खसोट करने का प्रयत्न करने लगे। उत्तर में मुसलमान ही नहीं, बल्कि राजपूत, जाट और दूसरे राजे भी मरहठों के द्रोही बन गये। हर एक का यही प्रयत्न था कि अपने राज्य को जितना अच्छा हो सके, बना लें। ठीक उसी समय जब कि मरहठों के शत्रु उनको चारों ओर से घेर कर नष्ट करना चाहते थे, तथा उनके हिन्दू-स्वातन्त्र्य के महान् उद्देश्य को मिट्टी में मिलाने का प्रयत्न कर रहे थे, रघुनाथ अपनी नीच इच्छा से प्रेरित होकर महाराष्ट्र-मण्डल को, बलवाइयों का एक दल बनाकर, लड़ाई करके अपने अधिकार में लाना चाहता था। ऐसे समय में राज्य की भारी जिम्मेदारी तथा ऐसे कठिन समय में राज्य का सारा उत्तरदायित्व बालाजी के द्वितीय पुत्र माधोराव के सिर पर पड़ा। उस समय उसकी अवस्था अभी केवल १७ वर्ष की थी। हिन्दू-जाति के सौभाग्य से उसमें अपूर्व गुण और सम्मोहन-शक्ति विद्यमान थी और वह हिन्दू-पद-पादशाही में, जिसके लिये उसके पूर्वज अपना लहू बहा चुके थे, इतने अनुरक्त थे कि उनकी अध्यक्षता में महाराष्ट्र-जाति ने अनेक कठिनाइयों पर विजय पाई और अपने राजनैतिक अस्तित्व को शत्रुओं के विरोधों के होते हुए भी बनाये रखा सब से पहले निज़ाम हैदराबाद ने अपने भाग्य को आज़माया उसने यह अनुमान करके कि मरहठों की शक्ति नष्ट हो गई है, सीधे पूना के लिये यात्रा आरंभ कर दी। मरहठों का, जो हिन्दू धर्म की रक्षा का बीड़ा उठाये हुए थे, परिहास करने के लिये उसने टोंक के हिन्दू-मन्दिर को अपवित्र और नष्ट कर दिया लेकिन जब मरहठे अपनी राजधानी को बचाने के लिये ८० हज़ार वीरों की सेना लेकर उसके मुक़ाबले में आ डटे तो वह निराश हो गया। उसको उगली पर भारी हार हुई और दुम दबाकर वह पीछे भाग गया। लेकिन रघुनाथ राव बड़ा नीच व्यक्ति था। उसने षड्यन्त्र रचकर अपने ही नव-