हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १२५ ] युवक भतीजे माधोराव के विरोध में मरहठों के दो दल कर दिये। ठीक इसी समय निज़ाम मरहठों का नाश करने के लिये एक बड़ी भारी सेना लेकर दूसरी बार आया। भोंसले और दूसरे मरहठे-सरदार वास्तव में उसके पक्षपाती हो गये थे। महाराष्ट्र का इतिहास पढ़ने से ज्ञात होता है कि कई बार लोगों में स्वार्थपरता तथा राष्ट्र विरोध की भावनायें फैलीं; किन्तु जब कभी जातीय गौरव के भंग होने की सम्भावना दिखाई पड़ती, वे जातीय प्रतिष्ठा को बचाने के लिए अपनी शत्रुताओं को भूल जाते जिससे स्वार्थपरता तथा राष्ट्र-विरोधी भावनायें स्वतः मिट जाया करती थीं और लोग शीघ्र ही महाराष्ट्र-मंडल के पक्षपाती बनकर, उसके उद्देश्य की पूर्ति में लग जाते थे। यह गुण मरहठों में बहुत काल तक विद्यमान रहा। इस बार भी ऐसा ही हुआ। मरहठे सरदारों ने, जो गृह-कलह के कारण पेशवा के विरुद्ध निज़ाम के पक्षपाती हो गये थे, उसका साथ छोड़ दिया और मरहठा-दल में सम्मिलित हो गये। निज़ाम बड़ी भयानक परिस्थिति में पड़ गया। सन् १७६३ ई० में राक्षसभुवन में एक बड़ा भयंकर युद्ध हुआ, जिसमे मरहठों की बड़ी शानदार विजय हुई। निज़ाम का दीवान मारा गया। उसके २० सरदार घायल हुए और पकड़े गये। उसकी तोपें और युद्ध की सारी सामग्री मरहठों के हाथ लगी। उद्गीर की हार का बदला लेने के लिये और पूना में करभरी नियत करने के अधिकार को जताने के लिये उसने आक्रमण किया था किन्तु उल्टे उसे मरहठों को अपने राज्य का कुछ भाग देना पड़ा, जिस की वार्षिक आय ८२ लाख रुपये से कम न थी। यह पहली लड़ाई थी, जिस में नवयुवक पेशवा ने वीरता दिखाई और विजय प्राप्त करके यश प्राप्त किया। इस विजय के कारण सब लोगों को विश्वास हो गया कि इस नवयुवक पेशवा में नेता बनने के सारे गुण वर्तमान हैं अतः यह उनकी जाति का भलीभाँति नेतृत्व कर सकता है और आपत्तियों से राष्ट्र को सुरक्षित रख सकता है। निज़ाम हैदराबाद के मन में यह बात बिठा कर कि मरहठे