भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 254 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 136

[ १३६ ]

पानीपत की लड़ाई में पराजित होने पर भी शक्तिहीन नहीं हुए हैं, माधोराव साहसी हैदरअली को दण्ड देनेके लिये आगे बढ़ा। हैदरअली पानीपत की लड़ाई का लाभ उठाकर मैसूर के पुराने हिन्दूराज्य को विध्वंस करके वहां का नवाब बन बैठा था और उसने मरहठों के भी कृष्णा नदी तक के राज्य पर धावा कर दिया था। सन १७६४ ई० में माधोराव ने हैदरअली पर आक्रमण किया। मरहठोंने पुनः धारवाड़ को ले लिया। घोरपडे, विंचूरकर, पटवर्धन और दूसरे मरहठे सेनापतियों ने हैदरअली को चारों ओर से घेर लिया। यद्यपि हैदरअली बड़ा चतुर सेनापति था, तथापि रत्तीहल्ली के मैदान में जी तोड़ कर लड़ने के पश्चात् उसे अनुभव हो गया कि वह शत्रुओं के सामने अब अधिक नहीं टिक सकता। यह विचार दृढ़ होते ही वह बड़ी चालाकी के साथ पीछे हट जाने के विचार से अपनी राजधानी की ओर लौटा किन्तु बिदनूर के पास माधोराव ने उसे आगे से रोक लिया। एक भयङ्कर लड़ाई हुई जिसमें मुसलमानों की बड़ी भारी हानि हुई। इस लड़ाई में कमान माधोराव के हाथ थी। उन्होंने ऐसा भयंकर आक्रमण किया कि यवनों के छक्के छुड़ा दिये। हैदरअली के साथ फ्रांसीसियों द्वारा शिक्षित बड़ी अच्छी सेना भी थी फिर भी वह बुरी प्रकार हार गया और उसके हजारों घोड़े, ऊंट, तोपें विजयी मरहठों के हाथ लगीं। हैदरअली ने सुलह के लिये प्रार्थना की जिसको मरहठों ने स्वीकार कर लिया। इस सुलहनामे के अनुसार जो देश मरहठों ने जीते उन्हीं के पास रहे और २२ लाख रुपया 'कर' और '"चौथ" का बकाया वसूल किया। यदि माधोराव की इच्छानुसार कार्य हुआ होता तो उसने हैदरअली को इस शर्तपर भी न छोड़ा होता लेकिन रघुनाथराव का नीच लालच मरहठों के लिये हैदरअली और नजीबखां की अपेक्षा अधिक हानिकारक सिद्ध हुआ। जब कि पेशवा रणभूमि में हिन्दू शक्ति के विरोधियों का मुकाबला कर रहा था ठीक उसी समय उसने कई बार नवयुवक पेशवा