भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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पृष्ठ 138

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निजी स्वार्थ के लिये महाराष्ट्र साम्राज्य का बलिदान कर दिया हो । किन्तु मरहठों के कुल में रघुनाथ जैसा दूसरा कोई अयोग्य और चंचल प्रकृति का पुरुष पैदा नहीं हुआ था । इसलिये महाराष्ट्रवासी बल- वान, न्यायशील तथा गम्भीर पेशवाके रहते हुए कभी भी रघुनाथराव को अपना नेता न मान पाते भले ही वह इस पद को ग्रहण कर लेता ।

१७ पानीपत की लड़ाई का बदला

“मरहठे अपनी भलाई करने वालों के प्रति सर्वदा कृतज्ञ और अपने शत्रुओं के प्रति निर्दयी होते हैं । यदि उनका कोई अपमान करे तो वे उसका बदला लेने के लिये अपनी जान जोखिम में डाल देते हैं ।”—ह्यूँ सांग जिन लोगों ने पानीपत की लड़ाई में मरहठों के विपक्ष में भाग लिया था, उनको उचित दण्ड देने के परम कर्त्तव्य को मरहठे, घरेलू झगड़ों तथा आपस की फूट तथा हैदरअली और टीपू की नई शक्तियों का सामना करते हुए भी, किसी प्रकार न भुला सके । नानासाहब के मरने के पीछे कुछ समय तक दो मरहठा-सरदार होल्कर और शिन्दे उत्तरी- भारत में मरहठों के अधिकारों की रक्षा अपनी शक्ति अनुसार बड़ी उत्तमता से करते रहे । जब घरेलू लड़ाइयां तथा रघुनाथराव के षड्यन्त्रों का उचित प्रबन्ध हो गया तब माधवराव ने सन् १७६६ ई० में विपक्षियों को दण्ड देने के लिये एक सेना बिनीवाले की अध्यक्षता में उत्तरी भारत- वर्ष की ओर भेजने का निश्चय किया तथा उत्तरमें रहने वाले सारे मरहठे- सेनापतियों को आज्ञा दी कि वे इससे मिल जांय । हिन्दू-राज्य के प्रभुत्व को पुनः स्थापित करने और उसकी आज्ञाओं का पालन कराने के दृढ़ उद्देश्य से, तथा जिन छोटे २ हिन्दू-राज्यों ने सन् १७६१ ई० के पीछे मरहठा-राज्य को नाश करने का उद्योग और उपाय किया था, उन सब को शक्तिहीन बनाने के लिये, मरहठों की शक्तिशाली सेना नर्मदा नदी