भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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पार करके बुन्देलखण्ड में जा पहुँची और छोटे छोटे विद्रोहों को दबाती हुई तथा हठी और धनी राजाओं तथा ताल्लुकेदारों को दण्ड देती हुई यह सेना बिना किसी विशेष विरोध के चम्बल नदी पर पहुँच गई। जाट लड़ने को तैयार हो गये और आगग इत्यादि दुर्गों को, जिनको कि इन लोगों ने पानीपत की लड़ाई के समय से हड़प कर रखा था, वापिस करने को इन्कार कर दिया। भरतपुर के पास एक घमसान की लड़ाई हुई। जाट बड़ी शूरता और वीरता के साथ मरहठों से लड़े, किन्तु अन्त में मरहठों के आक्रमण को रोकने में असमर्थ होकर, लड़ाई में अपने सहस्रों मरे हुये साथियों, अपने खेमों, अपने हाथी घोड़े और लड़ाई के सामान को छोड़ कर भाग गये। यह सारी सामग्री मरहठों के हाथ लगी। इसके पश्चात् शीघ्र ही उनके नेता नवलसिंह ने मरहठों का दबाया हुआ भाग लौटा कर और ६५ लाख रुपया उपहार रूप में देकर उनसे सुलह कर ली। अब मरहठों की सेना दिल्ली के दरवाज़ों की ओर बढ़ी। उन्हें यह आशा थी कि उनके शत्रु उनका वहां सामना करेंगे। लेकिन उस मक्कार और बूढ़े नजीबखां ने जब मरहठों के विजय करते हुये आने का समा- चार सुना तब उसने बड़ी नम्रता और दीनता के साथ मरहठों के शिविर में आकर उनसे प्राण-भिक्षा मांगी। इसके अतिरिक्त वह और भी सब कुछ करने को उद्यत था। जो कुछ द्वाबा में लूटा था, मरहठों के हवाले कर दिया और उनके लिये दिल्ली का मार्ग अबाधित बना दिया। वह चाहता था कि किसी प्रकार जान बच जाय, ताकि वह पुनः उचित समय पर उनके विरुद्ध षड्यन्त्र रच सके। पर इस बार उस पानीपत की लड़ाई के रचने वाले मक्कार को मरहठों की प्रतिहिंसा की अग्नि से कोई सुरक्षित न रख सकता यदि मृत्यु बीच में आकर उन मनुष्यों के क्रोध से—जिनकी पानीपत में हार हुई थी—उसकी रक्षा न करती। मरहठों ने दिल्ली में प्रवेश किया। पर अकबर और औरंगजेब की राजधानी में कोई भी उनका सामना करने वाला न निकला। अहमदशाह