हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पृष्ठ 140, कुल 254 में से
संदर्भ में पढ़ें[ १४० ] अब्दाली ने जिसकी बुद्धि अन्तिम लड़ाई के अन्त में ठीक हो गयी थी और पेशवा से पहिले ही से पत्र-व्यवहार करने लगा था, अपने राजदूत को पुना भेजा । बहुत वाद-विवाद के पश्चात् दोनों पक्ष एक समझौते पर पहुँचे जिसके अनुसार अहमदशाह अब्दाली ने प्रसन्नता-पूर्वक सन्धि के नियमों को स्वीकार किया कि अब वह हिन्दुस्तान के राजनैतिक कार्यों में कभी भाग न लेगा और साथ ही उसने मरहटों को भारतवर्ष का संरक्षक भी मान लिया । इस प्रकार पानीपत के विजयी ने स्वयं अपनी विजय और उन इच्छाओं की तुच्छता स्वीकार कर ली जिनसे प्रेरित होकर उसने लड़ाई ठानी थी, और साथ ही मरहटों की शक्ति को भारत- वर्ष की सबसे महान् शक्ति मान लिया । अफ़ग़ानों की जड़ को इस प्रकार भारतवर्ष के राजनैतिक क्षेत्रसे खोद और दिल्लीपर अधिकार करके मरहटों ने अब पठानों और रुहेलों का भी विच्छेद कर दिया । वास्तव में दोनों ही मुसलमान शक्तियों के केन्द्र थे । भारत के शासन की बागडोर हिन्दुओं के हाथ में जाने से रोकने के लिये ये अब तक भी जान तोड़ कर लड़ने के लिये तैयार थे । लेकिन उनकी परीक्षा का भी दिन आ गया । जो अपमान और अत्याचार रुहेले और पठानों ने पानीपत की लड़ाई में मरहटों के साथ किये थे उनका स्मरण करके ही उन्होंने बदला लेने के लिये तलवारें उठाई थीं । इन अपमानों तथा अत्याचारों के स्मरण से जो प्रतिहिंसा की शक्तियां उभरती थीं वे शायद नष्ट होने पर ही शान्त हो सकती थीं, अन्यथा उनको भुलावे में नहीं डाला जा सकता था । इस बात को रुहेले और पठान भी अच्छी तरह जानते थे । अतः वे अपने पुराने अनुभवी नेता हाफ़िज़ रहमत और अहमदखां बंगश की अध्यक्षता में मिल गये और उन्होंने दृढ़ प्रतिज्ञा की कि वे मरहटों का हर प्रकार से मरते दम तक सामना करेंगे । इन दोनों ही नेताओं को पानीपत के युद्ध का विशेष अनुभव था । कुछ दिन दिल्ली में रह कर मरहटे दोआबे में पहुँचे । उन्हें वहां यह मालूम हुआ कि शत्रुओं की सेना बहुत ही विशाल है । उस समय ७०