भारतकोश
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हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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पार करके बुन्देलखण्ड में जा पहुँची और छोटे छोटे विद्रोहों को दबाती हुई तथा हठी और धनी राजाओं तथा ताल्लुकेदारों को दण्ड देती हुई यह सेना बिना किसी विशेष विरोध के चम्बल नदी पर पहुँच गई। जाट लड़ने को तैयार हो गये और आगग इत्यादि दुर्गों को, जिनको कि इन लोगों ने पानीपत की लड़ाई के समय से हड़प कर रखा था, वापिस करने को इन्कार कर दिया। भरतपुर के पास एक घमसान की लड़ाई हुई। जाट बड़ी शूरता और वीरता के साथ मरहठों से लड़े, किन्तु अन्त में मरहठों के आक्रमण को रोकने में असमर्थ होकर, लड़ाई में अपने सहस्रों मरे हुये साथियों, अपने खेमों, अपने हाथी घोड़े और लड़ाई के सामान को छोड़ कर भाग गये। यह सारी सामग्री मरहठों के हाथ लगी। इसके पश्चात् शीघ्र ही उनके नेता नवलसिंह ने मरहठों का दबाया हुआ भाग लौटा कर और ६५ लाख रुपया उपहार रूप में देकर उनसे सुलह कर ली। अब मरहठों की सेना दिल्ली के दरवाज़ों की ओर बढ़ी। उन्हें यह आशा थी कि उनके शत्रु उनका वहां सामना करेंगे। लेकिन उस मक्कार और बूढ़े नजीबखां ने जब मरहठों के विजय करते हुये आने का समा- चार सुना तब उसने बड़ी नम्रता और दीनता के साथ मरहठों के शिविर में आकर उनसे प्राण-भिक्षा मांगी। इसके अतिरिक्त वह और भी सब कुछ करने को उद्यत था। जो कुछ द्वाबा में लूटा था, मरहठों के हवाले कर दिया और उनके लिये दिल्ली का मार्ग अबाधित बना दिया। वह चाहता था कि किसी प्रकार जान बच जाय, ताकि वह पुनः उचित समय पर उनके विरुद्ध षड्यन्त्र रच सके। पर इस बार उस पानीपत की लड़ाई के रचने वाले मक्कार को मरहठों की प्रतिहिंसा की अग्नि से कोई सुरक्षित न रख सकता यदि मृत्यु बीच में आकर उन मनुष्यों के क्रोध से—जिनकी पानीपत में हार हुई थी—उसकी रक्षा न करती। मरहठों ने दिल्ली में प्रवेश किया। पर अकबर और औरंगजेब की राजधानी में कोई भी उनका सामना करने वाला न निकला। अहमदशाह

[ १४० ] अब्दाली ने जिसकी बुद्धि अन्तिम लड़ाई के अन्त में ठीक हो गयी थी और पेशवा से पहिले ही से पत्र-व्यवहार करने लगा था, अपने राजदूत को पुना भेजा । बहुत वाद-विवाद के पश्चात् दोनों पक्ष एक समझौते पर पहुँचे जिसके अनुसार अहमदशाह अब्दाली ने प्रसन्नता-पूर्वक सन्धि के नियमों को स्वीकार किया कि अब वह हिन्दुस्तान के राजनैतिक कार्यों में कभी भाग न लेगा और साथ ही उसने मरहटों को भारतवर्ष का संरक्षक भी मान लिया । इस प्रकार पानीपत के विजयी ने स्वयं अपनी विजय और उन इच्छाओं की तुच्छता स्वीकार कर ली जिनसे प्रेरित होकर उसने लड़ाई ठानी थी, और साथ ही मरहटों की शक्ति को भारत- वर्ष की सबसे महान् शक्ति मान लिया । अफ़ग़ानों की जड़ को इस प्रकार भारतवर्ष के राजनैतिक क्षेत्रसे खोद और दिल्लीपर अधिकार करके मरहटों ने अब पठानों और रुहेलों का भी विच्छेद कर दिया । वास्तव में दोनों ही मुसलमान शक्तियों के केन्द्र थे । भारत के शासन की बागडोर हिन्दुओं के हाथ में जाने से रोकने के लिये ये अब तक भी जान तोड़ कर लड़ने के लिये तैयार थे । लेकिन उनकी परीक्षा का भी दिन आ गया । जो अपमान और अत्याचार रुहेले और पठानों ने पानीपत की लड़ाई में मरहटों के साथ किये थे उनका स्मरण करके ही उन्होंने बदला लेने के लिये तलवारें उठाई थीं । इन अपमानों तथा अत्याचारों के स्मरण से जो प्रतिहिंसा की शक्तियां उभरती थीं वे शायद नष्ट होने पर ही शान्त हो सकती थीं, अन्यथा उनको भुलावे में नहीं डाला जा सकता था । इस बात को रुहेले और पठान भी अच्छी तरह जानते थे । अतः वे अपने पुराने अनुभवी नेता हाफ़िज़ रहमत और अहमदखां बंगश की अध्यक्षता में मिल गये और उन्होंने दृढ़ प्रतिज्ञा की कि वे मरहटों का हर प्रकार से मरते दम तक सामना करेंगे । इन दोनों ही नेताओं को पानीपत के युद्ध का विशेष अनुभव था । कुछ दिन दिल्ली में रह कर मरहटे दोआबे में पहुँचे । उन्हें वहां यह मालूम हुआ कि शत्रुओं की सेना बहुत ही विशाल है । उस समय ७०

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हजार हथियारबन्द मुसलमान-सेना तैयार थी। परन्तु मरठों ने उनकी संख्या पर कुछ भी ध्यान न दिया, और घमसान की लड़ाइयां छिड़ ग जिनमें बड़ी निर्दयता के साथ पठान और रुहेले काटे गये। तत्पश्चात क़िले-पर-क़िला, शहर-पर-शहर शत्रुओं के हाथ से छीनते गये और द्वाबे को पठानों से साफ कर दिया। और आगे बढ़ कर रुहेलखण्ड आक्रमण कर दिया और रुहेलों का भी—पठानों की तरह बड़ी [..] से नाश कर दिया। मृत्यु ने नजीबखां को मरठों की क्रोधाग्नि से लिया था, लेकिन उसका पुत्र जवेथखां अभी तक अपने पिता के अपने पापों का प्रायश्चित् करने को बचा हुआ था। उसने शुक्रताल के क़िले की अभेद दीवारों के पीछे शरण ली। मरठों ने सीधा क़िले पर आक्रमण किया और उस पर भयंकर गोलाबारी करनी आरम्भ दी। उन्होंने क़िले के भीतर के सैनिक विभाग को ऐसे नष्ट किया कि जवेथखां उसकी रक्षा करने में असमर्थ हुआ। अन्त को एक रात चुपके से भाग निकला और गंगा को पार करके बिजनौर पहुँच गया। यह समाचार पाकर मरठों की बदला लेने वाली सेना भी बिजनौर ओर चल पड़ी और गंगा को पार करती हुई बिजनौर पहुँची। यहाँ जवेथखां के क़िले की रक्षा के लिये तोपखाने नियुक्त थे। ये मरठों पर गोलियां बरसाने लगे परन्तु मरठों ने तोपखाने पर कर लिया और उन दोनों शक्तिशाली सेनाओं को, जो उन्हें रोकने कर रहीं थी, परास्त किया और हज़ारों रुहेलों को मौत के पार उतारत हुये बिजनौर में जा घुसे। सारा ज़िला उनके घोड़ों की टापों से [..] जाने लगा। जवेथखां भाग कर नजीबगढ़ पहुँचा। मरठों ने वहां तक उसका पीछा किया और फतेहगढ़ पर भी अधिकार कर लिया। यहां पर उन्हें अपार प्रसन्नता हुई, क्योंकि मरठों का जो सामान पानीपत की लड़ाई में पठान और रुहेलों के हाथ चला गया था, वह सब अब पुनः विजयी मरठों के हाथ आ गया। अब उनको पूर्णरूप से विजय प्राप्त हो गई थी। जवेथखां की स्त्री और बच्चों को भी मरठों ने पकड़ लिया।

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जैसा पाशविक अत्याचार निर्दयी रुहेलों द्वारा मरहठे स्त्रियों और बच्चों पर पानीपत के मैदान में किया गया था, यदि उसी प्रकार की निर्दयता और अत्याचार मरठे नजीबखां और जबेथखां के परिवार के साथ करते तो अन्याय नहीं कहा जा सकता था; किन्तु शान्ति-प्रिय हिन्दुओं के परम्परागत नियम के अनुसार मरहठे न तो किसी के धर्म को छुड़ाते थे और न उनको अपने खेमे में लाकर क़त्ल ही करते थे। हिन्दू-वीरों ने यद्यपि इस राक्षसी कार्य पर कभी हाथ नहीं उठाया, फिर भी उनका डर सारे रुहेलों और पठानों के दिलमें ऐसा बैठगया था कि मरहठा अश्वारोही को देखते ही सारा गांव-का-गांव ही घर छोड़ कर भागना प्रारम्भ कर देता था। रुहेलों के जो सेनापति जीवित रहे, तराई के घने जंगलों में भाग गये। वर्षाकाल प्रारम्भ हो जाने के कारण ही वे प्रतिहिंसा-ज्वाला से बच रहे अन्यथा उन्हें भी मृत्यु का आस्वादन करा दिया जाता। इस प्रकार मरहठों ने पानीपत की हार का ब्याज-सहित शत्रुओं से बदला लिया। धर्म-ध्वजा को तराई के वनों की सीमा तक पहुँचा कर तथा अपने शत्रुओं को भयभीत करके मरहठे पीछे लौटे। सन् १७७१ ई० में मरहठों की सेना दिल्ली को वापिस लौट पड़ी। वहां पर महाराष्ट्र के राजनैतिक पुरुष अपने अपने सेनापतियों की विजय का लाभ पहिले ही से उठा रहे थे और शाह आलम को, जोकि मुग़ल साम्राज्य का उत्तराधिकारी था-अपने हाथ में लेकर भारत में सर्वश्रेष्ठ शक्ति प्राप्त करने के जो-जो उपाय अंग्रेजों और शुजा ने मिलकर सोचे थे, उन्हें निष्फल कर दिया। उन्होंने शाह आलम को विवश किया कि वह हिन्दुस्थान के राज्य चलाने तथा रक्षा करने के अधिकार तथा उत्तर- दायित्व का सारा भार मरहठों के हवाले कर दे। इसके बदले में उन्होंने उसे हिन्दुस्तान का नाम-मात्र का सम्राट् मानना स्वीकार कर लिया। उसे नाम-मात्रका सम्राट् मानने के लियेभी मरहठे तबतक तैयार न हुये जबतक

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वह पानीपत की लड़ाई के दिन से आज तक की शेष नोचखस करने और नये विजित राज्य को बराबर-बराबर बाँट लेने के लिये सहमत न हुआ। यद्यपि यह कार्य एक बार सन् १७६१ ई० में हो चुका था लेकिन सन् १७७१ ई० में पूर्ण रीति से हो गया। रुहेले और पठानों की इस भयानक हार के पश्चात मुसलमानों का कोई ऐसा राज्य न रह गया जो हिन्दुओं के सारे हिन्दुस्तान के महाराज होने के विरुद्ध आवाज उठाता। मानो उसी साल मुसलमानों की स्वतन्त्रता, शक्ति और सारी इच्छाओं का अन्तिम संहार हो गया। मुग़ल, तुर्क, अफ़गान, पठान, रुहेले, फारसी तथा उत्तरी और दक्षिणी मुसलमानों के सारे सम्प्रदायों ने लड़कर बदला लेने वाले हिन्दुओं के हाथ से मुसलमानी राज्य को छुड़ाने का प्रयत्न किया, लेकिन मरहठों ने उनके सभी प्रयत्नों को निष्फल कर दिया। इस प्रकार उन्होंने भारत साम्राज्य के संरक्षक के शाही अधिकार को ५० वर्ष से अधिक अपने हाथों में रक्खा तथा जो इसके लिये लड़ा, उसे नीचा दिखाया। सन् १७७१ ई० के बाद मुसलमानों की शक्ति भारतवर्ष के राजनैतिक क्षेत्र में न रही। इस प्रकार हिन्दुओं ने उनकी शक्ति का अन्त करके अटक से समुद्र तक फिर अपना स्वतन्त्रता प्राप्त की। अब केवल एक ही दावेदार था, जिसके विरुद्ध उन्हें संघर्ष और लड़ाई करनी थी। यह दावेदार मुसलमान नहीं था, पर वह ऐसा था जिसका कि स्वभाव, ढंग और मानसिक शक्ति मुसलमानों से बिलकुल भिन्न थी, वह था अंग्रेज़।

यदि मरहठों की दो सेनाओं के महाराष्ट्र से उत्तर में चले जाने के पश्चात शूरवीर हैदरअली अपने भाग्य को पुनः आजमाने के लिये न उठा होता और मरहठों के प्रभुत्व को दक्खिन में अस्वीकार न करता तो यह एक बड़ी अद्भुत बात हुई होती। माधोराव तुंगभद्रा नदी को पार करता हुआ एक शक्तिशाली सेना के साथ दुर्ग के पीछे दुर्ग जीतता और शत्रुओं को हर जगह हराता हुआ बढ़ता गया। एक दूसरी सेना हैदरअली को

[Header] [ १४४ ] भयभीत करने के लिये जबकि वह अनावदी के जंगलों में घुस गया स्था- पित की गई । एक रात जब यह सेना मट्टू के पास खेमा डाले पड़ी थी, हैदरअली अपने बीस हज़ार चुने वीरों के साथ जंगल से निकल पड़ा और शेर की भाँति अचानक मरहठा-सेना पर टूट पड़ा। किन्तु सौभाग्य- वश हैदरअली की तोप की पहिले ही गरज पर मरहठा सेनापति गोपालराव जाग उठा । उसने तत्काल ही खतरे को ताड़ लिया । उसने सोचा कि यदि मैं तनिक भी हिचकूंगा तथा दुर्बलता प्रकट करूँगा तो सारी सेना जगनेके पहिले ही मार डाली जायगी । वह अपने घोड़ेपर कूद कर सवार हो गया और अपने झण्डे को लहराते हुए अपनी जगह पर खड़े होकर आज्ञा दी कि खतरे का डंका बजाओ । इस भयानक शब्द को सुनकर सारे सिपाही उठ बैठे और बिछौनों को छोड़ कर रण-क्षेत्र में आ डटे । अब शत्रुओं की भयंकर अग्नि भड़की, घमासान की लड़ाई होने लगी । घुड़सवार सैनिक घायल हो होकर पृथ्वी पर गिरने लगे । हैदर- अली की तोपों की गरज और उसके गोलों की बाढ़ ने मरहटों को पीछे हटा दिया, लेकिन गोपालराव निर्भयता-पूर्वक अपनी जगह पर डटा रहा और ललकारते हुये अपना झण्डा फहराता रहा । लड़ाई के खतरे वाला डंका अब तक बज रहा था । सेनापति का सहायक पास ही खड़ा था । एक तोप का गोला लगा और उसका सिर टुकड़े २ हो गया । लोहू फुहारे की भाँति निकलने लगा जिससे मरहठा सेनापति लोहू से भीग गया । फिर परशुराम भाऊ घोड़े पर सवार हुआ और अपने स्थान पर डट गया । उसके घोड़े के एक गोली लगी और वह मर गया, तब वह दूसरे घोड़े पर चढ़ा । ज्यों ही उस पर गया, त्यों ही वह घोड़ा भी तोप का गोला लगने से मर गया । इस पर सेनापति चंचल हो उठा । वह फिर तीसरे घोड़े पर चढ़ा और मृत्यु के मुँह में खड़ा रहा। यदि वह भय और घबराहट से ज़रा भी पीछे हटता तो शत्रु अचानक आक्रमण कर देते और सारी सेना विजयी शत्रुओं के हाथ में फंस जाती, किन्तु सेना- पति के साहस को देखकर सारी सेना में फिर साहस आ गया । मरहटों

[ १४५ ] की सारी सेना—सेनापति से लेकर सिपाही तक—शत्रुओं की सेना के सामने लोहे की दीवार की तरह खड़ी रही । जब हैदरअली समीप आया तो मरहठों के अजेय साहस को देखकर हक्का-बक्का हो गया और जिधर से आया था उसी ओर शीघ्र लौट गया । युद्ध जारी रहा । पेठे, पटवर्धन, रास्ते और दूसरे मरहठा-सेनापति हैदरअली का पीछा जगह-जगह पर करते रहे और मोती तालाब पर उसे अपने हाथों में करके उसकी सारी सेना काट डाली और उसका खेमा, उसके हथियार तथा अनेकों युद्ध सामग्री अपने हाथों में कर ली । मरहठों की इस बार प्रबल इच्छा थी कि हैदरअली के नाम को राजनैतिक क्षेत्र से मिटा दें, किन्तु ठीक उसी समय उन्हें पूना से एक पत्र मिला, जिसमें लिखा था कि पेशवा बहुत बीमार पड़ा हुआ है, लड़ाई बन्द करके राजधानी में चले आओ । मरहठा सेना- पति ने इस पत्र के कारण विवश हैदरअली से सुलह कर ली, जिसके अनुसार हैदरअली ने मरहठा-स्वराज प्रान्तों को लौटाया और लड़ाई व्यय के अतिरिक्त ५० हजार रुपये उपहार रूप में और दिये । जिसके सुयोग्य नेतृत्व में मरहठों ने शत्रुओं से पानीपत के अत्याचारों का बदला लिया, जिसने अपने राष्ट्र की प्रतिष्ठा को पहले की भाँति उच्चत्तम शिखर पर चढ़ाया, उस नेताकी बीमारी का समाचार ऐसी शानदार घटनाओं के होने के समय दिल्ली से लेकर मैसूर तक की सारी मरहठा छावनियों में पहुँचा और हर एक व्यक्ति ने इसे परमात्मा की कुदृष्टि समझा । माधोराव की केवल सैनिक वीरता के अपूर्व गुणों ने ही उसे इतना सर्वप्रिय नहीं बनाया था, किन्तु उसका नागरिक-शासन भी न्यायपूर्ण और पक्षपातरहित था, वह राजा से लेकर रंक तक अपनी सम्पूर्ण प्रजा की भलाई विशुद्धात्मा से से करता था और वह इतना गंभीर, सत्यवादी और न्यायप्रिय था कि उसकी नीच-से-नीच प्रजा का भी उनके प्रति भक्ति और प्रेम हो

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गया था, शक्तिशाली पुरुषों को उस की सत्यता और न्यायपरायणता का भय बना रहता था। दीन व दुःखी किसानों को उसमें रक्षा का पूर्ण भरोसा था। यद्यपि घरेलू झगड़े और नाशकारी पारिवारिक युद्ध उसके स्वार्थी और मूर्ख चाचा के कारण चल रहा था, तो भी दस वर्ष के भीतर ही भीतर इसने अपनी जाति के ऊपर से पानीपत के कलंक को मिटा दिया और अपने शक्तिशाली भुजबल द्वारा शत्रुओं को, जिन्होंने ने हिन्दू-स्वतंत्रता और हिन्दू-पद-पादशाही के विरोध में हाथ उठाये थे, हराकर कुचल डाला। जब कि वह बिल्कुल जवानी की उमंगों से भरा हुआ था उसी समय वह अपने सौभाग्य और लोकप्रियता के के शिखर पर चढ़ा हुआ था। जाति उस पर यह आशा लगाए बैठी थी कि वह अपने पिता से बढ़कर गौरवशाली कार्य करेगा। केवल २७ वर्ष की अल्पायु में माधवराव क्षय रोग में ग्रस्त हो गए। वह महलों में बीमार पड़ा था, किन्तु फिर भी उसने अपने कुलँगी चाचा को, जो इस समय भी निज़ाम से मिल कर षड्यन्त्र रच रहा था, प्रसन्न करने का बड़ा प्रयत्न किया। उसने रघुनाथ को सब कार्य सौंप दिया और अपने राज्यवैद्य से अनुरोध किया कि मुझे ऐसी दवा दो कि मैं मरते समय भी मूर्च्छित न होऊँ और मुझ में बोलने की शक्ति वर्तमान रहे ताकि मैं प्राण त्यागते समय भी परमात्मा की प्रार्थना कर सकूँ। जब पेशवा की असाध्य बीमारी का समाचार उसके दूर-दूर के राज्यों में पहुँचा तो उसकी प्यारी प्रजा चारों तरफ से पूना में अपने जातीय शूरवीर और जातीय पिता के अन्तिम दर्शन को आने लगी। उसने आज्ञा दी कि राजमहल का फाटक खोल दो और प्रजा में से किसी दीन मनुष्य तक को भी मेरे पास आने से न रोका जाय। सन् १७७० ई० में कार्तिक वदी अष्टमी को उदार राजकुमार ने विद्वान् और सत्पुरुषों को अपने पास बुलाया। उनकी ओर सिर झुका कर, और जो लोग उसे देवत तुल्य समझ कर घेरे हुए पड़े हुए थे, उनकी तरफ मुँह करके उनसे अन्तिम विदा मांगी।

[ १४७ ] उसने कहा—"अब मैं आप लोगों से पृथक् होता हूँ और अपनी अन्तिम महान् तीर्थ-यात्रा के लिये प्रस्थान करता हूँ और आप लोगों को अन्तिम विदा का नमस्कार करता हूँ"। इस प्रकार राजकुमार ने सबके बीच परमात्मा का नाम लेते हुए योगियों की भांति गजानन-गजानन कहते हुए इस असार संसार को छोड़ा। राजमहल के लोगों में हाहाकार मच गया और सब लोग रोने-पीटने लगे। उसकी युवा स्त्री रमाबाई, जिसके अभी तक कोई संतान न हुई थी, अपने सारे आभूषणों तथा जवाहिरात को साधुओं, ब्राह्मण और दीन दुःखियों को दान कर, अपने सम्बन्धियों के दबाव और प्रार्थना की कुछ परवाह न कर के अपने प्यारे प्रियतम की चिता पर बैठ गई। प्रज्वलित ज्वालाओं में अपनी आहुति डालकर उसने अपनी आत्मा की मशाल को जला लिया और उसके प्रकाश से अमर प्रेम और स्वर्गीय सौंदर्य के रहस्यों का उद्घाटन करके यह भी बता दिया कि वे इस समय भी मनुष्य द्वारा प्राप्त किये जा सकते हैं। अब भी लोग महाराष्ट्र में महाराज माधोराव और सती रमाबाई का वर्णन करके आँसुओं द्वारा उनके प्रति अपना प्रेम और श्रद्धा प्रकट करते हैं। वर्त्तमान समय में भी राष्ट्रीय कवि उन की मृत्यु के सम्बन्ध में कवितायें बना बना कर विलाप करते हैं और कहा करते हैं—कि हमारे जीवन की ज्योति निकल गई और हमारे हृदय का रत्न खो गया"। १८ गृह-कलह और सर्व-प्रिय क्रान्ति "इंग्रजानां खडे चारिले नाहीं लागु दिला थारा भले बुद्धिचे सागर नाना ऐसे नाहिं होणार" ❄ सारी जाति के आशास्वरूप माधोराव का युवावस्था में मर ❄ फिरंगियों को उसने पत्थर खिलाये और अपने मन की बातों को उन पर प्रकट नहीं होने दिया। बुद्धि के सागर नाना फड़नवीस के समान व्यक्ति पैदा होने अब बड़े मुश्किल हैं।

[ १४८ ] जाना और राघोबा जैसे कलंकित व्यक्ति का उनके पीछे, एक पीढ़ी तक जीवित रहना ऐसी घटनाओं में से हैं जिन्हें देखकर कभी कभी मनुष्य संशय में पड़ जाता है कि वास्तव में परमात्मा सर्वशक्तिमान् है भी या नहीं । माधोराव की अकाल मृत्यु जाति के लिये एक बड़ा दुर्भाग्य था, पर राघोबा का जीवित रहना तो उससे कहीं आपत्तिप्रद था । ज्योंही निःसन्तान माधोराव की जगह पर, उन की और जाति की इच्छानुसार, उनका छोटा भाई नारायणराव गद्दी पर बैठा त्योंही रघुनाथराव उसके और उसके सहायकों के विरुद्ध एक नवीन हत्याकाण्ड का षड्यन्त्र रचने लगा । उसने महल के पहरेदारों को रिश्वत देकर अपने पक्ष में कर लिया और उन्हें आज्ञा दी कि नये पेशवा को घेर कर पकड़ लो । पर इस उपाय को उसकी पिशाचिनी स्त्री आनन्दीबाई ने पलटकर पहरेदारों को उभारा और कहा कि पकड़ने के बजाय मार डालो । ३० अगस्त सन १७७३ में सिपाही विद्रोही हो गए और नारायणराव से वेतन मांगते हुए असभ्यता- पूर्वक शोर मचाने लग गए । इस समय पेशवा के एक सद्य सेवक ने उन बलवाइयों को उनके इस प्रकार के नीच कार्य्य पर धिक्कारा । इस पर उन्हों ने क्रोधित होकर तलवार खींचली और उस स्वामिभक्त को उसी समय मार डाला । डरा हुआ पेशवा अकेला अपनी जान बचाने के लिए एक कमरे से दूसरे कमरे में भागने लगा और हत्यारे उसका पीछा करते रहे । अन्त में वह अपने चाचा राघोबा के कमरे में पहुंचा और व्याकुल होकर चाचा की कमर से लिपट गया और गिड़गिड़ा कर बड़े आर्तस्वर से कहने लगा, “चाचा ! चाचा !! मैं आपका लड़का हूँ । मुझ अनाथ को प्राण-दान देकर कृतार्थ कीजिये । मैं आप ही को पेशवा स्वीकार करता हूँ और जो रोटी का टुकड़ा आप मुझे देंगे उसके अतिरिक्त किसी वस्तु की मांग न करूंगा, उसी पर अपना जीवन-निर्वाह सुखपूर्वक करूंगा ।” पर हत्यारे बलवाई जो उसका पीछा करते आते थे वहां भी पहुँच गये । राघोबा ने नारायणराव को अपने बदन से छुड़ा कर परे कर दिया और

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हत्यारे उस पर टूट पड़े। चाफाजी तिलेकर, पेशवा और बलवाइयों की तलवार के बीच खड़े होगए और बच्चे को ढोंप लिया और इन पहरेदारों से अपने स्वामी के जीवन-दान के लिये प्रार्थना की; पर सब अरण्य-रोदन के समान निष्फल हुआ। अन्त मे हत्यारों ने पेशवा तथा उसके रक्षक ‘चाफाजी पर अपनी तलवार चलाना प्रारम्भ किया। पेशवा की मृत्यु निश्चित थी; उसकी आयु समाप्त हो चुकी थी। इस पर किसी का क्या वश चल सक्ता था ! यद्यपि चाफाजी ने ढाल बनकर पेशवा की रक्षा के लिये अनेकों प्रयत्न किये, पर सब निष्फल हुए और अन्त में अपना प्राण अपने स्वामी के साथ देकर उसने लोगों को स्वामि-भक्ति का अपूर्व आदर्श बताया। पेशवा को मार डालने के बाद बलवाइयों ने राघोबा को अपना पेशवा मशहूर करके महल को अपने अधिकारमें ले लिया। यह समाचार बिजली की भांति सारी राजधानी में फैल गया। वहां के निवासी क्रोधित होकर दल-के-दल बनाने लगे और सब ने एक- मत होकर शपथ ली कि वे लोग नीच हत्यारे राघोबा को अपना पेशवा स्वीकार न करेंगे। महाराष्ट्र में अभी तक आत्म सम्मान तथा चारित्रिक जीवन का भाव बचा हुआ था, अतः भयानक प्रासाद-षड्यन्त्र से डर कर वे लोग उसका, जिसको कि उन्होंने अपना अधिनायक या स्वामी न चुना हो, आधिपत्य स्वीकार करने के लिये तैयार न थे, इसलिये नेता तथा राज्य के प्रमुख लोगों ने राज्य-परिवर्तन के लिये एक गुप्तसभा स्थापित की और राज्य के प्रधान न्यायाधीश रामशास्त्री के पास पेशवा की हत्या का अभियोग चलाने की प्रार्थना की। रामशास्त्री को शीघ्र ही निश्चय हो गया कि राघोबा और उसकी स्त्री आनन्दीबाई ने मिलकर ही यह नीच कर्म किया है तथा उसे पूर्ण विश्वास हो गया कि इस नवयुवक पेशवा की हत्या का मूल कारण ये ही लोग हैं। वह निर्भीक ब्राह्मण सीधे उस महल में चला गया, जहां राघोबा अपने सपक्षियों द्वारा सुरक्षित बैठा था। उसने उसके मुंह पर साफ २ कह दिया कि अपने भतीजे अर्थात् राष्ट्र के नये पेशवा की हत्या करने वाले आप ही हैं। राघोबा ने अपराध

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स्वीकार करते हुए कहा—मुझे इस अपराध का प्रायश्चित बताइये। राम शास्त्री ने कहा—इस महापाप के लिये आपको अवश्य प्रायश्चित्त करना पड़ेगा और ऐसे नीच कर्म के लिये सिवाय प्राणदण्ड के और कोई प्रायश्चित्त नहीं। इस पर राघोबा के साथियों में से किसीने कहा कि आप ऐसा न कहें। रामशास्त्री ने पुनः गम्भीर स्वर से कहा, "मुझे किसी राघोबा का भय नहीं है, मैं प्रजा का न्यायाधीश हूँ; इसलिये मैंने अपना उचित कर्त्तव्य पालन किया है। यदि राघोबा चाहे तो मुझे भी मारकर अपने पाप में वृद्धि कर ले। मैं ऐसे राज्य में एक क्षण भी न रहूंगा और न अन्न-जल ग्रहण करूंगा, जिस पर ऐसे अन्यायी राजा राज्य करते हैं।" इस प्रकार क्रोधाग्नि से जलता हुआ निशंक ब्राह्मण महल से बाहर निकला, शहर छोड़ दिया, और अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार तब तक अन्न- जल ग्रहण न किया जब तक पवित्र कृष्णानदी के तट पर न पहुंच गया। रघुनाथराव अवाक् सा देखता रह गया, उसके मुख से एक शब्द भी न निकल सका। पर अपने साथियों के सामने इन सारी बातों से उसे पूर्ण अनुभव हो गया कि वास्तव में पाप का फल बुरा होता है।

ठीक उसी समय यह बात सब को विदित हो गई कि मृत पेशवा नारायणराव की विधवा स्त्री गर्भवती है और उसे अवश्य कोई सन्तान- रत्न पैदा होगा। इस समाचार को पाकर राजपरिवर्त्तन करने वाली सभा की शक्ति और भी बढ़ गई तथा भावी सुखकी आशालता लहलहाने लगी।

इसके पश्चात् मोरोबा दादा, कृष्णराव हरिपन्त फडके, त्र्यम्बकराव मामा, काले, तोपखाने के सरदार रास्ते पटवर्धन, धायगुड़े, नैरो अप्पाजी आदि और भी दूसरे राजकर्मचारियों ने नाना फड़नवीस तथा सखाराम बापू जैसे महान् नेताओं की अध्यक्षता में प्रथम यह निश्चित किया कि पहले तो राघोबा को लड़ाई में ले चलें और पीछे राजद्रोह कर दें। इस प्रकार सब ने विचार निश्चित कर रघुनाथराव को शीघ्र ही दक्खिन पर चढ़ाई करने के लिये विवश किया। ज्योंही रघुनाथने दक्खिन के लिये

[ १५१ ] कूच किया, त्यों ही इन लोगों ने अवसर पाकर पूना में विद्रोह कर दिया, और राजधानी को अपने अधिकार में ले लिया और भावी पेशवा की माता गंगाबाई को राजनेत्री ठहराया। यह राज्य-विप्लव शीघ्र ही सारे देश में फैल गया। इस नये राज्यशासन को, जो वास्तव में प्रजातन्त्र- राज्य था और जिसे महाराष्ट्र में "बड़ भाई राज" कहते हैं, सारे दुर्गों और नगरों ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। जब इस आश्चर्यजनक विद्रोह का समाचार राघोबा को मिला तो उसने अपनी सारी सेनाके साथ पूना को लौट चलने का विचार किया; लेकिन जब उसे यह बात विदित हुई कि बलवाइयों की सेना उस से सामना करने के लिये पहिले ही पूना से रवाना हो चुकी है तो भयभीत होकर कुछ स्वार्थी, घूसखोर तथा चाप- लूस साथियों के साथ उत्तर की ओर लौट गया और रास्ते के गांवों और शहरों को विदेशीय लुटेरों की तरह लूटता-पीटता और जलाता हुआ आगे बढ़ता गया। उसे अब भी यह आशा बनी हुई थी कि यदि गङ्गा- बाई को पुत्र न पैदा हुआ तो सभी लोग पुनः उसके पक्षपाती हो जायेंगे। उसने कोरेगांव में विद्रोहियों की सेना का सामना करके उसे परास्त किया और उनके सेनापति त्र्यम्बकराव मामापेठे को मार डाला। पेठे की मृत्यु से विद्रोहियों की बड़ी क्षति हुई, क्योंकि उनका एक वीर एवं कट्टर नेता मारा गया। इतने पर भी प्रसिद्ध नेता नाना फड़नवीस और बापू ने महाराष्ट्र जाति की सहायता पाकर लड़ाई बराबर जारी रक्खी। इस समय सारे महाराष्ट्र, नहीं नहीं सारे भारतवर्ष के सभी लोगों का ध्यान पुरन्धर के क़िले की ओर लगा हुआ था, जहां गर्भवती राज- कुमारी गंगाबाई बड़े पहरे में रक्खी गई थी। ज्यों ज्यों इनका प्रसव- काल निकट आता जाता त्यों त्यों लोगों की उत्सुकता बढ़ती जाती थी। सभी लोग सर्वदा पुरन्धर के नवीन सुखदायक समाचार सुनने के लिये लालायित हो रहे थे। मन्दिरों, देवालयों और तीर्थ स्थानों में धार्मिक जन-समूह ईश्वर से प्रार्थना करने लगे कि महारानी जी को पुत्र रत्न पैदा

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हो और राघोबा की नीच आशा और अभिलाषा पर वज्रपात हो। झों- पड़ियों से लेकर राजभवनों तक के रहने वाले सर्वदा पुरन्धर के शुभ समाचार सुनने के लिये कान खड़े रखते थे और अपनी शुभाशा की चिन्तना में सर्वदा निमग्न रहते थे। इतना ही नहीं, दिल्ली, इन्दौर, ग्वालियर, बड़ौदा, हैदराबाद, मसूर तथा कलकत्ता आदि भारत के प्रधान राजनैतिक केन्द्रों के लोग भी पुरन्धर के समाचार के लिये उत्सुक रहते थे। अन्त में १८ अप्रैल सन् १७७४ ई० को सारे भारतवर्ष में यह समाचार पहुंचा कि गंगाबाई ने एक पुत्र रत्न को जन्म दिया है। सारे महाराष्ट्र ने इस प्रसव पर परमात्मा का धन्यवाद किया और इस शिशु को अपना नेता माना तथा उसे अपने राज्य के लिये ईश्वर द्वारा भेजा हुआ मंत्री समझा। दूसरे देश के राज्यों ने भी, जनता के उत्साह से उत्साहित होकर, उस दूध-मुंहे बच्चे को बधाइयां भेजीं। सारे महाराष्ट्र के क्रांतिकारियों को इस समाचार से सब से अधिक सांत्वना मिली। उस समय के पत्र व्यवहार तथा लिखित प्रमाणों से उनकी देशभक्ति- पूर्ण आशाओं और अभिलाषाओं का भली भांति परिचय मिलता है। साबाजी भोंसला अपनी छावनी से लिखता है- "ज्योंही हमारे यहां राजकुमार के जन्म का समाचार पहुंचा, मानों उसी समय हमारे लिये सुख-संसार की सृष्टि हो गई। सचमुच परमात्मा ने हमारी प्रार्थनाओं को सुना, सारी सेना प्रसन्न है, मारू बाजे बज रहे हैं। तोपों की गरज वादशाह को सलामी दे रही है। परमात्मा हमारे पेशवा को दीर्घायु बनाये।" यह समाचार जहां कहीं क्रांतिकारियों के पास पहुंचा वे बड़ी प्रसन्नता मनाने लगे। एक पत्र में ये शब्द लिखे मिलते हैं- "हरीपंत सेनापति ने शीघ्र आज्ञा दी कि सारी सेना में उत्सव मनाओ। लड़ाई के बाजों, शहनाइयों और तोपों की घड़घड़ाहट के कारण मनुष्यों का एक शब्द भी नहीं सुन पड़ता था। इस शुभोत्सव को मनाने के लिये हाथी के हौदों से लोगों को मिठाई

[ १४३ ] बांटी गई।" एक दूसरे पत्र में यह लिखा मिलता है—"इस में कोई शंका नहीं कि परमात्मा हमारे अनुकूल है, हिन्दू धर्म की रक्षा और वृद्धि के लिये उसने पेशवा को पैदा किया है—शिशु पेशवा दीर्घायु हो ! हमारी जाति की आँखों का तारा चिरञ्जीव हो !" इस लड़के का नाम माधोराव रक्खा गया, क्योंकि लोग इस नाम को बड़ी श्रद्धा और भक्ति से लिया करते थे। किन्तु थोड़े ही दिनों के पश्चात् लोगों ने इसे "सवाई ( महान् ) माधोराव" कहना प्रारम्भ कर दिया। इनके जन्म के कारण पूना स्थित राज्य-क्रांतिकारियों की शक्ति प्रबल हो गई और भारतवर्ष के राजनैतिक कार्यों की काया पलट गई। ये लोग अब विशेष साहस और उत्साहपूर्वक कार्य करने लगे और उन्होंने मरहठे सरदारों को आज्ञा दी कि राघोबा मृत्यु दण्ड का भागी है इसलिये उसका पीछा करो और जहां कहीं मिले, पकड़ लो। ऐसा हो जाने पर वे लोग, जो हिन्दू-पद-पादशाही की परम्परा के अनुसार भाऊ और नानासाहब की अध्यक्षता में शिक्षित हुए थे और जो मरहठों द्वारा प्राप्त गौरवशाली भारत के सब से महान् हिन्दूराज्य के पदको संभालने की योग्यता रखते थे, इस योग्य हो गये कि शासन की बागडोर अपने हाथ में रक्खें और अपनी जाति को इस परम कर्तव्य पर और अधिक आरूढ़ रखें। यदि ऐसा न हुआ होता तो राज्य का प्रबन्ध उस व्यक्ति के हाथ में चला गया होता जो अपनी स्त्री को भी अपने वश में न कर सकता था। किन्तु नारायण के जिस लड़के की पैदायश के समाचार का स्वागत सारे महाराष्ट्र ने बड़ी धूम- धाम से किया था और जिस दुधमुँहे राजकुमार को लोगों ने बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ अपने राज्य का भावी पेशवा स्वीकार किया था, उसी राजकुमार को एक नीच प्रकृति वाले पुरुष ने घृणा की दृष्टि से देखा। जितनी तीव्रता से उसका पीछा क्रांतिकारी और उसका दुर्भाग्य कर रहे थे उतनी ही तीव्रता से राघोबा एक भयभीत सांड की तरह

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पागल होकर बेतहाश दौड़ा जा रहा था। अन्त में राघोबा को उसके साथियों ने भी छोड़ दिया और उसे अपनी जाति द्वारा ही पराजित होना पड़ा। इसके पश्चात् वह निर्लज्ज बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी जाति के सब से कुटिल शत्रु की शरण में चला गया। सारी जातियों और रियासतों में से, जिनकी इच्छा अब भी भारतवर्ष में प्रधान शक्तिशाली बनने की थी, किसी ने भी मरहठों को सर्वश्रेष्ठ शक्ति मानने से इन्कार नहीं किया। जब तक सारा महाराष्ट्र इस महान हिन्दू साम्राज्य के अन्तर्गत संगठित होकर काम करता रहा, तब तक जिस किसी ने मरहठों को ललकारा, वह या तो बिल्कुल नष्ट कर दिया गया या उसको ऐसा नीचा दिखा कर दबाया गया कि वह क्रोध से भरा हुआ जमीन पर पड़ कर धूल चाटने लगा, अर्थात् मरहठों की पराधीनता में भलीभांति जकड़ दिया गया। मुसलमान—चाहे वे पठान, फारसी, मुगल या तुर्क थे अथवा वे सिंध पार के या भारतवर्ष के रहने वाले थे— ऐसे कुचल दिये गये कि उन्होंने पीछे, फिर कभी हिन्दूराज्य के सामने सिर न उठाया। वे अब भारतवर्ष के राजनैतिक क्षेत्र से एक प्रकार से मिटा दिये गये थे। प्रतिद्वंदी शक्तियों में एक पुर्तगेज़ों की शक्ति थी जिसने एक बार अपना प्रभाव अर्द्ध एशिया के ऊपर जमा लिया था। अब वह भी महाराष्ट्र शक्ति द्वारा अधःपतन की दशा को प्राप्त हो गई थी, क्योंकि पुर्तगेज़ कोंकण की स्वतन्त्रता की लड़ाई में इतने निर्बल कर दिये गये थे कि फिर कभी अपनी पूर्व शक्ति न प्राप्त कर सके। फ्रेंचों ने भी कभी मरहठों का खुली तौर पर सामना करने का साहस न किया। यद्यपि उन्हों ने कई बार हैदराबाद और अरकाट द्वारा पूना पर प्रभाव जमाने का प्रयत्न किया, किन्तु हर बार असफल होते रहे। इसके दो कारण थे, प्रथम यह कि यूरोप में उनका दूसरों के साथ युद्ध हो रहा था, जिस के कारण वे भारत में हिन्दू साम्राज्य के मार्ग में कंटक नहीं बनना चाहते थे। दूसरी बात यह थी कि वे भलीभांति जानते थे कि यही एक शक्ति है जो उनके प्रतिद्वंदी अंग्रेजों की नीच इच्छा को पूरी न होने देगी। अंग्रेजों

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को भी भलीभांति ज्ञात था कि यदि हम पश्चिमी समुद्र तट पर शिवाजी के समय से शान्तिपूर्वक आबाद हैं, तो इसलिये नहीं कि मरहठे हमसे प्रसन्न हैं या हमारा यहां पर रहना उन्हें पसन्द है, वरन् हम यहां शांति पूर्वक इसलिये पड़े हुये हैं कि इस समय मरहठे अपने शक्तिशाली शत्रुओं से लड़ने में उत्तरी भारतवर्ष में लगे हुये हैं और हमें एक 'साधारण शत्रु समझ कर इस समय कुछ ध्यान नहीं देते हैं। जिस समय हम सिर उठायेंगे, वे अवश्य हमारा सत्यानाश कर देंगे। इस के साथ ही अंग्रेज़ अपनी सूक्ष्म राजनैतिक अंतर्दृष्टि द्वारा यह भी भलीभांति समझते थे कि उन के अधीन जो बम्बई का प्रदेश है उसका कारण यह नहीं है कि वे मरहठों के गढ़ में उस पर अपना आधिपत्य रख सकते थे पर इसका एकमात्र कारण यह है कि मरहठे दूसरे स्थानों पर लड़ाई में उलझे होने के कारण इस ओर ध्यान नहीं देते। इसलिये वे भी हर समय मरहठों को हानि पहुंचाने की इच्छा करते हुये भी डर के मारे उनसे छेड़छाड़ नहीं करते थे। आंगरे की शक्ति को नष्ट करने के लिये नानासाहब उनकी शक्ति को काम में लाये थे, परन्तु यह भी इस शर्त पर कि इस कार्य द्वारा समस्त मरहठा जाति को किसी प्रकार से भी सैनिक अथवा सामुद्रिक हानि पहुंचने की संभावना न हो। यदि ईश्वर की इच्छा प्रतिकूल न हुई होती, जिस की कि किसी भी मरहठा व्यक्ति को आशा न थी—आंगरे के सत्यानाश के पश्चात् मरहठों की जलसेना भी बड़ी शक्तिशाली हो गई होती। इतना होते हुये भी अंग्रेजों को कम से कम पश्चिमी किनारे पर भी कुछ विशेष लाभ प्राप्त न हुआ। शिवाजी के समय में जो कुछ उनके अधीन था वही उनके अधीन रहा उसमें वे कोई और वृद्धि न कर सके। लेकिन बंगाल में अंग्रेजों ने मैदान खुला पाया। क्लाईव के समय में अंग्रेज़ प्रथम बड़े शान्त थे, किन्तु जब विजय प्राप्त करके जगे, तब यदि मरहठे न होते तो उन्होंने अपनी विजयश्री को दिल्ली तक बढ़ा

[ १५८ ] देती हैं और अपनी जाति तथा समाज के प्रति विश्वासघात करने तथा लोभ के कारण अपनी राष्ट्रीय स्वतंत्रता बेचने को धार्मिक दृष्टि से पाप समझती है इत्यादि । तथापि हमें वर्त्तमान समय को देखकर भूतकाल का बिल्कुल ठीक-ठीक पता चलाने में बहुत कुछ बुद्धिमत्ता से विचार करना चाहिये । बात हो जाने पर प्रत्येक मनुष्य को बुद्धि आती है । पर यदि हम उन कारणों और स्थितियों पर ध्यान दें, जिनका ठीक अनुभव कार्यपूर्ण होने से पहिले हो जाये, तो वे दो सेनायें जो सुसज्जित होकर लड़ने जा रही हो, उनमें से कौन पराजित और कौन विजयी होगा, इस बात को जानने वाले केवल भविष्य-वक्ता ही हो सकते हैं । कोई भी राजनैतिक पुरुष इस विषय में ठीक-ठीक भविष्यवाणी नहीं कर सकता था । जितनी वैज्ञानिक तथा संगठन-शक्ति उस समय अंग्रेजों की थी, वह इतनी बढ़ी-चढ़ी न थी कि मर्हठों को भारतवर्ष के राज- नैतिक क्षेत्र में सदैव के लिये या बिल्कुल अयोग्य ठहरा सकती । इसके अतिरिक्त अंग्रेज़ों को स्वाभाविक बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ उपस्थित थीं। यहां तक कि उनको विदेश में लड़ना पड़ता था, जो कि उनकी मातृभूमि और उनके मुख्य युद्ध केन्द्र से कई हज़ार मील दूर था । जापान ने, जिसने कि अपनी कमर एक शताब्दी से कसनी शुरू की थी, अपनी वैज्ञानिक और राजनैतिक शक्ति की बड़ी भारी त्रुटि को आधी ही शताब्दी के भीतर अपने योरोपीय प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबिले में बहुत अंशों में पूरा कर लिया था । मरहठे भी और बातों में जापानियों के बराबर होने के कारण ऐसे ही सफल हुए होते और विशेषतः जिस समय की बात लिखी जा रही है, उस समय अंग्रेज़ मरहठों से इतने बढ़े-चढ़े न थे कि वे मरहठों को भारत के प्रधान पद से, जिसके द्वारा उन्होंने उस समय के मुग़ल, अफ़गान, फ़ारसी, पुर्तगीज़ों और अंग्रेज़ों का घोर लड़ाइयों में सामना करके परास्त किया था, हटा देते । अंग्रेज़ भी भली-भांति इस बात को जानते थे। इसलिये जब तक मरहठे एकता के सूत्र में बंधे रहे उन्होंने कभी भी खुल्लम-खुल्ला

[ १५६ ] मरहठों के अधिकारों में हस्तक्षेप करने का साहस नहीं किया। जब मरहठों में परस्पर वैर विरोध पैदा हो गया और गृहकलह का आरम्भ हो गया तब भी अंग्रेजों के अतिरिक्त और किसी का साहस न हुआ कि उनकी शत्रुता की क्रोधाग्नि को जगाए, पर अँगरेज अपनी सफलता का अवसर समझ कर उनका सामना करने को उद्यत हो गये। बङ्गाल और मद्रास की भूमि में अधिक भोजन करके वे इतने मोटे हो गए थे कि बम्बई प्रान्त में मरहठों को आपस में लड़ते देखकर वे शीघ्र ही उनसे लड़ने का साहस करने लग गये। यह बात नीच राघोवा को भी अनुभव हुई इसलिये जब वह हार गया और उसके साथियों ने उसका परित्याग कर दिया और उसके देश- वासियों ने उसे निकाल दिया तो उसके सिर पर, प्रजा के उसे न चाहते हुए भी, महाराष्ट्र के ऊपर राज्य करने का भूत सवार हुआ। इसी धुनमे उसने अंग्रेजों की शरण लेने का विचार दृढ़ किया और इस प्रकार वह अपनी जातीय स्वतन्त्रता को, अपने सबसे बड़े शत्रुओं के हाथ बेचने पर तुल गया, और उन्हें अवसर दिया कि वे मरहठों के ही हाथों से, जिन्हें उसने इस समय अपने भाइयों का लहू बहाने को उठाया था, मरहठा-राज्य के दुर्ग की दीवारो को तोड़ दें। अंग्रेजों ने बड़ी उत्सुकता के साथ अपने भाइयों की हत्या करने वाले राघोबा के हाथ को इस शर्त पर पकड़ा कि वह उनको इसके बदले २० से २५ लाख वार्षिक आय वाला प्रदेश देगा। सन्धि हो जाने पर ज्यों ही अंग्रेज सेनापति ने खुले दिल से राघोबा को साथ लेकर मरहठों पर आक्रमण कर दिया सालसिट, वर्सन और भड़ोच निवासियों ने राघोबा को महाराष्ट्र का पेशवा स्वीकार कर लिया। उसी समय जितनेभी छोटे-छोटे राज्य मरहठों के आधीन थे उन्होंने यह समाचार पाकर कि अंग्रेज और मरहठों में युद्ध प्रारम्भ हो गया है, मरहठों के विरुद्ध सारे भारतवर्ष में, बगावत कर दी। लेकिन नाना फड़नवीस, जो इस समय राज्यक्रांतिकारियों की बागडोर अपने हाथ में लिये हुए था, बड़ी दृढ़ता

[ १६० ] के साथ सारी कठिनाइयों का सामना करने के लिये तैयार हुआ। यद्यपि पूना का नवीन राज्य प्रबन्ध बहुत असंगठित दशा में था उस पर भी जो कुछ सेना एकत्रित हो सकी, उसे नाना फड़नवीस ने इकट्ठी करके हरिपन्त पाडके की अध्यक्षता में अंगरेज़ी सेना को, जो कर्नल कीटिङ्ग के सेनापतित्व में बढ़ी आ रही थी, रोकने के लिये भेजा। हरिपंत और उसकी सेना ने इस कार्य को बड़ी योग्यता के साथ पूर्ण किया। नापर और दूसरी जगहों पर उन्होंने शत्रुओं को बड़ी हानि पहुंचाई, यद्यपि कीटिंग ने उन्हें बड़ी बहादुरी के साथ आगे बढ़ने से रोक रक्खा। सन् १७७७ ई० में अंगरेजों के भारत के राज्य-प्रबन्ध में कुछ परिवर्त्तन हुआ जिसके अनुसार बंगाल का गवर्नर सारे भारतवर्ष के अंगरेज़ी राज्य का प्रधान समझा जाने लगा। उसने बम्बई के गवर्नर के इस कार्य को अर्थात् मरहठों के साथ लड़ाई छेड़ने को नापसन्द किया और मरहठा-राज्य के साथ सन्धि करने के लिये अपने राजदूत को पूना भेजा। नाना ने, जो कि उस समय समस्त भारत में अपने विरुद्ध उठी हुई बगावतों को दबाने के लिये अवसर की ताक में अत्यन्त उत्सुक हो रहा था, तुरन्त अंगरेजों के साथ सन्धि करली, जिसके अनुसार अंगरेज़ों को सालसीट और भड़ोच मिल गये और उन्होंने राघोबा को उनके हवाले करने का वचन दिया। ज्योंही अंगरेज़ों से सुलह हुई नाना ने महादाजी शिन्दे को महाराष्ट्र के अन्तर्गत पैदा हुये विप्लव को दबा देने के लिये नियुक्त किया और पाडके और पटवर्धन, हैदरअली को, जिसने कि मरहठों के राज्य पर आक्रमण किया था, दण्ड देने के लिये भेजे गये। परन्तु जब सारे मरहठे-सेनापति भिन्न २ कार्यों पर नियुक्त हो कर, उन्हें पूरा करने के लिये चले गये तब अंगरेज़ों ने सन्धि की अवहेलना कर के राघोबा को मरहठों के हवाले करने से इन्कार कर दिया और फिर इस विचार से युद्ध की घोषणा कर दी कि जब तक बाहर भेजी हुई