हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १५६ ] मरहठों के अधिकारों में हस्तक्षेप करने का साहस नहीं किया। जब मरहठों में परस्पर वैर विरोध पैदा हो गया और गृहकलह का आरम्भ हो गया तब भी अंग्रेजों के अतिरिक्त और किसी का साहस न हुआ कि उनकी शत्रुता की क्रोधाग्नि को जगाए, पर अँगरेज अपनी सफलता का अवसर समझ कर उनका सामना करने को उद्यत हो गये। बङ्गाल और मद्रास की भूमि में अधिक भोजन करके वे इतने मोटे हो गए थे कि बम्बई प्रान्त में मरहठों को आपस में लड़ते देखकर वे शीघ्र ही उनसे लड़ने का साहस करने लग गये। यह बात नीच राघोवा को भी अनुभव हुई इसलिये जब वह हार गया और उसके साथियों ने उसका परित्याग कर दिया और उसके देश- वासियों ने उसे निकाल दिया तो उसके सिर पर, प्रजा के उसे न चाहते हुए भी, महाराष्ट्र के ऊपर राज्य करने का भूत सवार हुआ। इसी धुनमे उसने अंग्रेजों की शरण लेने का विचार दृढ़ किया और इस प्रकार वह अपनी जातीय स्वतन्त्रता को, अपने सबसे बड़े शत्रुओं के हाथ बेचने पर तुल गया, और उन्हें अवसर दिया कि वे मरहठों के ही हाथों से, जिन्हें उसने इस समय अपने भाइयों का लहू बहाने को उठाया था, मरहठा-राज्य के दुर्ग की दीवारो को तोड़ दें। अंग्रेजों ने बड़ी उत्सुकता के साथ अपने भाइयों की हत्या करने वाले राघोबा के हाथ को इस शर्त पर पकड़ा कि वह उनको इसके बदले २० से २५ लाख वार्षिक आय वाला प्रदेश देगा। सन्धि हो जाने पर ज्यों ही अंग्रेज सेनापति ने खुले दिल से राघोबा को साथ लेकर मरहठों पर आक्रमण कर दिया सालसिट, वर्सन और भड़ोच निवासियों ने राघोबा को महाराष्ट्र का पेशवा स्वीकार कर लिया। उसी समय जितनेभी छोटे-छोटे राज्य मरहठों के आधीन थे उन्होंने यह समाचार पाकर कि अंग्रेज और मरहठों में युद्ध प्रारम्भ हो गया है, मरहठों के विरुद्ध सारे भारतवर्ष में, बगावत कर दी। लेकिन नाना फड़नवीस, जो इस समय राज्यक्रांतिकारियों की बागडोर अपने हाथ में लिये हुए था, बड़ी दृढ़ता