भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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[ १५८ ] देती हैं और अपनी जाति तथा समाज के प्रति विश्वासघात करने तथा लोभ के कारण अपनी राष्ट्रीय स्वतंत्रता बेचने को धार्मिक दृष्टि से पाप समझती है इत्यादि । तथापि हमें वर्त्तमान समय को देखकर भूतकाल का बिल्कुल ठीक-ठीक पता चलाने में बहुत कुछ बुद्धिमत्ता से विचार करना चाहिये । बात हो जाने पर प्रत्येक मनुष्य को बुद्धि आती है । पर यदि हम उन कारणों और स्थितियों पर ध्यान दें, जिनका ठीक अनुभव कार्यपूर्ण होने से पहिले हो जाये, तो वे दो सेनायें जो सुसज्जित होकर लड़ने जा रही हो, उनमें से कौन पराजित और कौन विजयी होगा, इस बात को जानने वाले केवल भविष्य-वक्ता ही हो सकते हैं । कोई भी राजनैतिक पुरुष इस विषय में ठीक-ठीक भविष्यवाणी नहीं कर सकता था । जितनी वैज्ञानिक तथा संगठन-शक्ति उस समय अंग्रेजों की थी, वह इतनी बढ़ी-चढ़ी न थी कि मर्हठों को भारतवर्ष के राज- नैतिक क्षेत्र में सदैव के लिये या बिल्कुल अयोग्य ठहरा सकती । इसके अतिरिक्त अंग्रेज़ों को स्वाभाविक बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ उपस्थित थीं। यहां तक कि उनको विदेश में लड़ना पड़ता था, जो कि उनकी मातृभूमि और उनके मुख्य युद्ध केन्द्र से कई हज़ार मील दूर था । जापान ने, जिसने कि अपनी कमर एक शताब्दी से कसनी शुरू की थी, अपनी वैज्ञानिक और राजनैतिक शक्ति की बड़ी भारी त्रुटि को आधी ही शताब्दी के भीतर अपने योरोपीय प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबिले में बहुत अंशों में पूरा कर लिया था । मरहठे भी और बातों में जापानियों के बराबर होने के कारण ऐसे ही सफल हुए होते और विशेषतः जिस समय की बात लिखी जा रही है, उस समय अंग्रेज़ मरहठों से इतने बढ़े-चढ़े न थे कि वे मरहठों को भारत के प्रधान पद से, जिसके द्वारा उन्होंने उस समय के मुग़ल, अफ़गान, फ़ारसी, पुर्तगीज़ों और अंग्रेज़ों का घोर लड़ाइयों में सामना करके परास्त किया था, हटा देते । अंग्रेज़ भी भली-भांति इस बात को जानते थे। इसलिये जब तक मरहठे एकता के सूत्र में बंधे रहे उन्होंने कभी भी खुल्लम-खुल्ला