हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १६० ] के साथ सारी कठिनाइयों का सामना करने के लिये तैयार हुआ। यद्यपि पूना का नवीन राज्य प्रबन्ध बहुत असंगठित दशा में था उस पर भी जो कुछ सेना एकत्रित हो सकी, उसे नाना फड़नवीस ने इकट्ठी करके हरिपन्त पाडके की अध्यक्षता में अंगरेज़ी सेना को, जो कर्नल कीटिङ्ग के सेनापतित्व में बढ़ी आ रही थी, रोकने के लिये भेजा। हरिपंत और उसकी सेना ने इस कार्य को बड़ी योग्यता के साथ पूर्ण किया। नापर और दूसरी जगहों पर उन्होंने शत्रुओं को बड़ी हानि पहुंचाई, यद्यपि कीटिंग ने उन्हें बड़ी बहादुरी के साथ आगे बढ़ने से रोक रक्खा। सन् १७७७ ई० में अंगरेजों के भारत के राज्य-प्रबन्ध में कुछ परिवर्त्तन हुआ जिसके अनुसार बंगाल का गवर्नर सारे भारतवर्ष के अंगरेज़ी राज्य का प्रधान समझा जाने लगा। उसने बम्बई के गवर्नर के इस कार्य को अर्थात् मरहठों के साथ लड़ाई छेड़ने को नापसन्द किया और मरहठा-राज्य के साथ सन्धि करने के लिये अपने राजदूत को पूना भेजा। नाना ने, जो कि उस समय समस्त भारत में अपने विरुद्ध उठी हुई बगावतों को दबाने के लिये अवसर की ताक में अत्यन्त उत्सुक हो रहा था, तुरन्त अंगरेजों के साथ सन्धि करली, जिसके अनुसार अंगरेज़ों को सालसीट और भड़ोच मिल गये और उन्होंने राघोबा को उनके हवाले करने का वचन दिया। ज्योंही अंगरेज़ों से सुलह हुई नाना ने महादाजी शिन्दे को महाराष्ट्र के अन्तर्गत पैदा हुये विप्लव को दबा देने के लिये नियुक्त किया और पाडके और पटवर्धन, हैदरअली को, जिसने कि मरहठों के राज्य पर आक्रमण किया था, दण्ड देने के लिये भेजे गये। परन्तु जब सारे मरहठे-सेनापति भिन्न २ कार्यों पर नियुक्त हो कर, उन्हें पूरा करने के लिये चले गये तब अंगरेज़ों ने सन्धि की अवहेलना कर के राघोबा को मरहठों के हवाले करने से इन्कार कर दिया और फिर इस विचार से युद्ध की घोषणा कर दी कि जब तक बाहर भेजी हुई