भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 159, कुल 254 में से

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पृष्ठ 159

[ १६१ ] मरहठी सेनाएं आकर नाना की सहायता करेंगी, उसके पहले ही हम पूना में चल कर उसे कुचल डालेंगे । मरहठों को भयभीत और व्याकुल करने की इच्छा से सन् १७७६ ई० में कर्नल एजर्टन की अध्यक्षता में कुछ फ़ौजें पूना के लिये रवाना हो गईं। मरहठों ने भी, जो कि पुरंधर के सुलहनामे को पसंद नहीं करते थे, सारी भीतरी बग़ावतों से, जिन्हें महदजी ने दबा दिया था, छुट्टी पाकर अंग्रेज़ों को ललकारा और अपनी परम्परागत गुरेला लड़ाई की नीति का अवलम्बन किया। अंग्रेज़ों को फुसलाते हुये उन्हें इतनी दूर आगे ले गये कि उनका संबन्ध बम्बई से टूट गया । भिमराव पांसे अंग्रेज़ी सेना के किनारे २ लगा हुआ आगे बढ़ता चला गया और लगातार उसे लाचार करता गया और ऐसी चालाकी के साथ उसने अपने आप को बचाये रखा कि अंग्रेज़ी सेना उस पर धावा नहीं कर सकती थी, परन्तु मरहठे जब कभी उन्हें पहाड़ों के किनारे पाते थे तो अचानक उन पर आक्रमण कर देते थे, जिसे अंग्रेज़ बचा भी नहीं सकते थे। उनकी सेना बारम्बार तितर-बितर कर दी जाती थी और उनकी रसद के पहुंचने में भी हस्त क्षेप किया जाता था। अन्त में जब एजर्टन दर्रे के सिरे पर पहुंच गया तो उनका सम्बन्ध बम्बई से बिल्कुल टूट गया। मरहठों ने जब देखा कि उनका दुश्मन उनकी राजधानी के समीप पहुंच गया है तो वे भी सर धड़ की बाज़ी लगा कर पूर्ण शक्ति से लड़ने लग पड़े । इन लोगों ने यहां तक निश्चय कर लिया कि तेलगांव से पूना तक की सारी भूमि उजाड़ और सुनसान कर दी जाय और यदि आव- श्यकता पड़े तो राजधानी तक को भी फूंक दिया जाय, किन्तु उसे किसी प्रकार शत्रु के हवाले न किया जाय । इस भयानक जातीयता के दृढ़ विचार का अंग्रेज़ों पर भी बड़ा प्रभाव पड़ा । खान्डाला के युद्ध में कर्नल के को मरहठों ने बड़ी बुरी तरह घायल किया और खिर्की की लड़ाई में कैप्टन स्टीवर्ट को मार डाला जिससे अंग्रेज़ बहुत दुःखी हुए । पग-पग पर अंग्रेज़ों की हानि अधिकाधिक होने लगी। लेकिन योग्यतापूर्ण और नियमों के पालन में अद्वितीय अंग्रेज़ आगे बढ़ते ही