भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 160, कुल 254 में से

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० [ १६२ ] गये और अन्त में तेलगांव जा पहुंचे। लेकिन वहां उन्हें महादजी शिन्दे और हरिपन्त पाडके की बड़ी भारी सेना का सामना करना पड़ा। अंग्रेज़ों ने बड़े उत्साह के साथ आक्रमण किया। अन्त में मरहठों की सेना पीछे हटी और भिन्न २ हिस्सों में बंट गई और फैले हुए अंग्रेज़ों पर चारों ओर आक्रमण करती रही, उस पर भी वे बिल्कुल सुरक्षित रहे। न तो शत्रु को खाना मिलता था, न उनके घोड़ों को चारा मिलता था। अंग्रेज़ों के पास किसी प्रकार यह खबर भी पहुंच गई कि ज्यों २ उनकी सेना आगे बढ़ती जायगी, उन्हें और भी सुनसान स्थान मिलेंगे। बहादुर तथा हठी अंग्रेज़ तब भी आगे बढ़ने का प्रयत्न करते रहे। लेकिन चपल मरहठों ने उन्हें अच्छी प्रकार घेर लिया था तथा उन्हें भली-भांति सूचित कर दिया था कि वह अपनी राजधानी को फूंक देंगे, किन्तु अंग्रेज़ों के हाथ न जाने देंगे। अंग्रेज़ सेनापति ने मरहठों के कर्तव्यों को देखकर भलीभांति जान लिया कि पूना की ओर बढ़ना सांसी की ओर बढ़ने के समान आसान नहीं है। उसने अब इस उलझन से निकलने का केवल यही उपाय देखा कि वह बम्बई लौट चले। यद्यपि यह उनके लिये बड़ा अपमानजनक विचार था तथापि इसके अलावा और कोई चारा भी न था। पीछे की ओर लौट जाना भी असम्भव था इसलिये अंग्रेज़- सेनापति ने मरहठों को विस्मित करने के लिये अपनी फ़ौज को मरहठों पर अचानक आक्रमण करने की आज्ञा दी और कहा कि इसके पश्चात् धीरे धीरे पीछे हटो। लेकिन मरहठों को हैरान करने का विचार वैसा ही था, जैसा कि बच्चा अपनी दादी को दूध पिलाना सिखावे। मरहठे यह सब बातें पहले से ही जानते थे। ज्योंही अंग्रेज़ों ने आक्रमण किया, उन्होंने घेरा तंग कर लिया और इशारा पाते ही बड़े वेग से शत्रुओं पर टूट पड़े। अंग्रेज़ बड़ी ही वीरता के साथ लड़े, लेकिन मरहठे तिलमात्र भी न हिले। अन्त में बड़गांव में पूर्णतया पराजित होकर अंग्रेज़ों की ६ हज़ार सेना ने बिना किसी शर्त के मरहठों के सामने अपने हथियार