हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १६३ ] कर दिये। नाना, बापू और शिन्दे ने कहा कि राघोबा को शीघ्र हमारे हवाले करो और उन सारे जिलों को जो तुम्हें पुरंधर के संधिपत्र के अनुसार मिले हैं, हमें वापिस कर दो। इस के अतिरिक्त दो अंग्रेज अधिकारियों को, उस समय तक धरोहर रूप में रोक लिया गया जब तक कि अंग्रेज इस सुलहनामे की शर्तें पूरी नहीं करते। अंग्रेज सेनापति ने लगभग एक महीना तक मरहठों के हाथ में कैदी रह चुकने के पश्चात् सुलहनामे की सब शर्तों को स्वीकार कर लिया ताकि उसकी सेना किसी प्रकार बम्बई लौट जाय। इस बड़ा विजय के समाचार को सुनकर सारे महाराष्ट्र के भीतर प्रसन्नता बिजली की तरह दौड़ गई। विशाल "यूनियन- जैक" (अंग्रेजी झंडा) मरहठों के पीले और सुनहरी झंडे (जरीपताका) के सामने झुक गया। यद्यपि पारिवारिक झगड़े हो रहे थे और मरहठे असंगठित दशा मे थे, पर समय पड़ने पर सारी जाति खड़ी होगई और उनके इस प्रजा-तंत्र ने अपने इतने घोर और बलवान् शत्रु को भली भांति हरा दिया। केवल यही एक बचा हुआ विपक्षी था जिसने इससे पहले मरहठों की प्रधानता के सम्बन्ध में कभी भी किसी प्रकार प्रश्न नहीं उठाया था। ज्योंही उसने ऐसे प्रश्न करने का साहस किया, उसी समय उसे नम्र होकर उनको सर्वश्रेष्ठ शक्ति के रूप में मानना पड़ा। उस समय के पत्रों में लिखा मिलता है—'हमारी जाति ने अंग्रेजों को वह पाठ पढ़ाया जैसा कि दूसरा कोई नहीं पढ़ा सकता था। इससे पहले उन्हें कभी इतना अपमानित नहीं होना पड़ा था"। सब लोग पेशवा के परम भक्त थे। वह ही जनता के उद्देश्यों का केंद्र था। वे अपनी विजय भी उसी राजा-बनने वाले शिशु के महा भाग्य के कारण ही समझते थे। "जन्मकाल ही से हमारे प्यारे शिशु- राजकुमार का जीवन वैसा ही चमत्कारपूर्ण हुआ है जैसा कि महाराज आनन्दकंद श्रीकृष्ण जी का हुआ था। हमारे शत्रु मिट गये और परमात्मा ने हमारी जाति के महान् उद्देश्य और हिन्दू-धर्म के पवित्र युद्ध में हमें आशीर्वाद दी है"।