हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पृष्ठ 162, कुल 254 में से
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१६४ ] १६ अंग्रेज भी झुके ☸ "प्रतापमहिमा थोरजलामधि परि जलचर बुडविला ॥" "नवि मोहिम दरसाल देउनी शाह टीपू तुडविला ॥" एक बड़ी अंग्रेजी सेना के पराजित होकर हथियार रख देने का समाचार ज्योंही कलकत्ता पहुंचा, अंग्रेज क्रोध से भड़क उठे। उन्होंने बड़गाँव की संधि को उस समय प्रमाणित करने से इन्कार कर दिया, जिस पर कि उनके सेनापति ने, अपनी सेना को वापिस आने की आज्ञा पाने पर, हस्ताक्षर कर दिये थे। फिर वे मरहठों के साथ अधिक द्वेष के साथ नई शत्रुता करने के लिये उद्यत हो गये। रघुनाथराव यदि किसी दूसरे राज्य में होता, तो राज-विद्रोही होने के अपराध में मार डाला गया होता, किन्तु सब कुछ होते हुए भी उस के साथ एक राजकुमार जैसा व्यवहार किया जाता था, परन्तु वह अपने नीच स्वभाव के कारण इसका दुरुपयोग करके फिर भाग कर अंग्रेजों से जा मिला। फिर भयंकर युद्ध आरम्भ हो गया। गोडार्ड गुजरात से आया और बसीन की ओर बढ़ा। उस को रामचन्द्र गणेश मरहठे-सेनापति ने रोका और घमसान का युद्ध होने लगा। अन्तिम बार उसने ऐसी वीरता और साहस के साथ आक्रमण किया कि उसके दुश्मन भी उसकी प्रशंसा करने पर विवश हो गये। विजय ध्रुव थी, किन्तु अभाग्यवश एक गोली इस बहादुर सेनापति को लगी, वह घोड़े से गिर पड़ा जिस से गोडार्ड ने सन् १७८० ई० में बसीन पर अधिकार कर लिया। इस विजय से प्रोत्साहित होकर अंग्रेजों ने बड़गाओं के स्थान पर लड़ाई में हथियार डाल देने के अपने कलंक को मिटाने के लिये मरहठों की राजधानी पूना ही को लेने का विचार किया, जिस के लेने में पहली बार वे बुरी तरह असफल हो चुके थे। ☸ यद्यपि टीपू मगरमच्छ के समान पराक्रमी था पर मरहठों ने प्रतिवर्ष आक्र- मण करके उसे मिट्टी में मिला दिया।