भारतकोश
संग्रह पर लौटें

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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१६४ ] १६ अंग्रेज भी झुके ☸ "प्रतापमहिमा थोरजलामधि परि जलचर बुडविला ॥" "नवि मोहिम दरसाल देउनी शाह टीपू तुडविला ॥" एक बड़ी अंग्रेजी सेना के पराजित होकर हथियार रख देने का समाचार ज्योंही कलकत्ता पहुंचा, अंग्रेज क्रोध से भड़क उठे। उन्होंने बड़गाँव की संधि को उस समय प्रमाणित करने से इन्कार कर दिया, जिस पर कि उनके सेनापति ने, अपनी सेना को वापिस आने की आज्ञा पाने पर, हस्ताक्षर कर दिये थे। फिर वे मरहठों के साथ अधिक द्वेष के साथ नई शत्रुता करने के लिये उद्यत हो गये। रघुनाथराव यदि किसी दूसरे राज्य में होता, तो राज-विद्रोही होने के अपराध में मार डाला गया होता, किन्तु सब कुछ होते हुए भी उस के साथ एक राजकुमार जैसा व्यवहार किया जाता था, परन्तु वह अपने नीच स्वभाव के कारण इसका दुरुपयोग करके फिर भाग कर अंग्रेजों से जा मिला। फिर भयंकर युद्ध आरम्भ हो गया। गोडार्ड गुजरात से आया और बसीन की ओर बढ़ा। उस को रामचन्द्र गणेश मरहठे-सेनापति ने रोका और घमसान का युद्ध होने लगा। अन्तिम बार उसने ऐसी वीरता और साहस के साथ आक्रमण किया कि उसके दुश्मन भी उसकी प्रशंसा करने पर विवश हो गये। विजय ध्रुव थी, किन्तु अभाग्यवश एक गोली इस बहादुर सेनापति को लगी, वह घोड़े से गिर पड़ा जिस से गोडार्ड ने सन् १७८० ई० में बसीन पर अधिकार कर लिया। इस विजय से प्रोत्साहित होकर अंग्रेजों ने बड़गाओं के स्थान पर लड़ाई में हथियार डाल देने के अपने कलंक को मिटाने के लिये मरहठों की राजधानी पूना ही को लेने का विचार किया, जिस के लेने में पहली बार वे बुरी तरह असफल हो चुके थे। ☸ यद्यपि टीपू मगरमच्छ के समान पराक्रमी था पर मरहठों ने प्रतिवर्ष आक्र- मण करके उसे मिट्टी में मिला दिया।

[ १६५ ] इसलिये अंग्रेज़ी सेना शीघ्र ही पूना के लिये चल पड़ी ताकि वह नाना तथा उनके साथियों को भयभीत करके उनके हाथ से हथियार रखवाले । लेकिन महाराष्ट्र के उस निपुण राजनीतिज्ञ नाना ने पहिले ही अंग्रेजों को फंसाने के लिये सारे भारतवर्ष में एक भयंकर जाल बुन लिया था । उसने हैदरअली से मद्रास और भोंसले से बंगाल पर आक्रमण करने की प्रतिज्ञा ले ली थी, और अपने हाथ में उसने बम्बई में अंग्रेजों की शक्ति को नष्ट करने का काम लिया । तदनुसार हैदरअली नेफ्रांस गवन- र्मेण्ट की सहायता से मद्रास में सुविख्यात सफलता प्राप्त की । परशराम भाऊ १२ सहस्र सेना के साथ उस अंग्रेज़ी सेना के इर्द गिर्द मंडराता हुआ उनकी बगलों और पीछे वाली सेना पर आक्रमण करता हुआ उनको पूना की ओर प्रगति में बाधायें डालता रहा । नाना, तुकोजी होल्कर और हरिपन्त पाडके ने तीस सहस्र सेना लेकर अंग्रेज़ी सेना का सामना किया । अब जनरल गोडार्ड ने भी अपने आप को जनरल एज- रटन की अवस्था में फंसा हुआ पाया । यदि वह आगे बढ़ता तो उसे भी अपने पूर्ववर्ती जनरल की तरह दुर्भाग्य का शिकार होना पड़ता, तो भी यह इतना आगे बढ़ आया था कि अब पीछे लौट जाना उस के लिये हानिकारक और अपमानजनक था । इस लिये वह उसी जगह पर जम कर अपनी शक्ति बढ़ाने लगा । लेकिन वह इस प्रकार भी देर तक न कर सका । मरठों ने कैप्टन मैके और करनैल ब्राउन को, जो गोडार्ड को सामान पहुंचा रहे थे, आक्रमण करके हैरान कर दिया और ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि अंग्रेज़ी सेना का सम्बन्ध ही बम्बई से टूट गया । अन्त में निराश होकर करनैल गोडार्ड को पूना पर धावा करने का विचार त्याग कर लौट जाने का निश्चय करना पड़ा । ज्यों ही निराश होकर अंग्रेज़ी सेना ने पीछे की ओर मुड़कर चलना आरम्भ किया त्योंही भाऊ और तुकोजी होल्कर अपनी सेना का घेरा तंग करके उन पर टूट पड़े । यद्यपि अंगरेज़ बड़ी शूरता और वीरता के साथ लड़े तथापि मरहठों ने उन्हें बुरी प्रकार हराया । जो सेनापति मरहठों की राजधानी

पर विजय प्राप्त करके बड़ी प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिये आया था वह किसी प्रकार अपने अच्छे ग्रहों के कारण से भाग कर, अपना लगभग सारा बारूद, बन्दूकें, खीमें तथा सामान और हजारों तोपों के गोलों और सहस्रों बैलों को छोड़ कर, बम्बई पहुंचा । यह सारा सामान विजयी मरहठों के हाथ लगा। धृष्टता से दो बार अंग्रेजों ने पूना को जीतने का जी तोड़ कर प्रयत्न किया, किन्तु दोनों ही बार बुरी तरह हार खाई और अन्त में अपमानित और निराश होकर बम्बई लौट गये। इस के पहिले अंग्रेज इतने अपमानित हो कर कभी भी घर नहीं लौटे थे। उत्तर भारत में भी अङ्गरेज ढंग से अच्छी तरह न लड़ सके। प्रारम्भ में गोहाद् के राना की सहायता से अङ्गरेजों ने सींधिया के ग्वालियर के क़िले को घेर लिया; किन्तु महादजी सींधिया के घोर आक्रमण करने पर इसे देर तक अपने हाथ में न रख सके। कर्नल मूर भी अपने मित्र की सहायता के लिये शीघ्र वहां पहुंचा, किन्तु वह भी कुछ न कर सका। दक्खिन में हैदरअली से हारकर और बम्बई में तुकोजी और पटवर्धन से नीचा देखकर और उत्तर में सींधिया से परास्त होकर अङ्गरेजों ने उस मित्रता की जाल को, जिसे नाना ने तैयार किया था, तोड़ने का प्रयत्न किया और महादजी सींधिया से प्रार्थना की कि वह उन लोगों के साथ एक अलग सुलहनामा पर हस्ताक्षर करें। नाना फड़नवीस ने अलग सुलह करने से साफ़ उत्तर दे दिया और कहा कि बिना हैदरअली की राय के वह किसी प्रकार की संधि नहीं कर सकते। मरहठों की जलसेना ने भी अच्छी सफलता प्राप्त की थी। उनके सेनापति आनन्दराव धुलाप ने अङ्गरेज़ों पर एक सुविख्यात विजय पाकर उनके 'रेंजर' नामी बेड़े को पकड़ लिया और इसे युद्ध में लूटा हुआ माल समझ कर अपने साथ लेगया। ठीक इसी समय जबकि संधि की बातचीत हो रही थी, हैदरअली मर गया। इसलिये नाना ने १७८२ ई० में संधि कर ली। इस संधि के अनुसार अङ्गरेजों ने रघुनाथराव को

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मरहठों के हवाले किया और मालमिट को छोड़ कर जो देश वे मरहठों दवा बैठे थे तथा पुरन्धर के सुलहनामे में पाये थे, मरहठों को लौटा दिये उन्होंने यह भी प्रण किया वे किसी भी राजा को मरहठों के विरोध सहायता न देंगे। मरहठों ने भी प्रतिज्ञा की कि वे कोई कार्य ऐसा नह करेंगे जिस से अङ्गरेजों की हानि पहुंचे। सब से महत्वपूर्ण बात इ सुलहनामा में यह हुई कि दिल्ली के राजनैतिक क्षेत्र में हस्ताक्षेप न करने क अङ्गरेजों ने प्रतिज्ञा की और इस पर मरहठों का पूर्ण अधिकार माना क वे जो चाहें सो कर सकते हैं। इस प्रकार मरहठों और अङ्गरेजों की पहली लड़ाई का अ- हुआ। मरहठों ने योरुप की उस शक्ति के साथ, जो अभी तक मरह से नहीं लड़ी थी रण में लड़कर तथा उन्हें पराजित कर के उ को यह पाठ पढ़ा दिया कि यद्यपि वे बङ्गाल और मद्रास में शक्तिशा हैं तथापि यदि वे लोग सह्याद्रि के दुर्ग की ओर कुदृष्टि फेरेंगे औ मरहठों के हिन्दू-साम्राज्य का अहित सोचेंगे तो उनका सिर कुच दिया जायगा। सालबाई के संधि-पत्र के थोड़े ही दिन बाद राघोबा ने भी अप चाल को बदल दिया। उसने अपनी जाति को शत्रुओं के हाथ में फंसा उचित न समझा। इसने अपने नीच विचारों और कर्मों द्वारा मर को उनके उस उच्च आदर्श से गिरा दिया था जिसके लिये उनके पूर्व लड़ते हुए मरे थे; अब वे आपस में ही लड़ने के लिये तत्पर हो ग थे। इसका जीवन महाराष्ट्र के लिये वैसा ही हानिकारक सिद्ध हुआ जै पानीपत की लड़ाई। सालबाई की संधि के थोड़े ही समय बाद रघुनाथ राव मर गया। मरता हुआ भी वह अपनी जाति के लिए अपने भी अधिक एक और कलंक छोड़ गया। मरहठों के अभाग्यव रघुनाथराव के एक पुत्र पैदा हुआ, जिसका नाम उसके पितामह नाम पर बाजी राव द्वितीय रखा गया। यह लड़का उन नीच कर्मों

[ १६८ ] करने में तत्पर हुआ जिनको छोड़ने के लिये इसका पिता विवश किया गया था । यह महाराष्ट्र की स्वाधीनता को एक ठीकरे के मूल्य पर बेचकर महाराष्ट्र-राज्य के नाश का कारण हुआ । लेकिन जब तक नाना फड़नवीस और महादजी जीवित थे, तब तक ऐसा नहीं हो सका था । ———— २०. सर्व-प्रिय पेशवा—सवाई माधोराव ꕤदैन्य दिवस आज सरले सवाई माधवराव प्रतापि कलियुगिं अवतरले ॥धृ०॥ सुन्दररुप रायाचें कुणावर नाहिं रागें भरतों ॥ कलगितुरा शिरपेंच पाचुचीं पडत होति मुखावर किरणें ॥ महोत्साह घरोघर लागले लोक करायाला ॥ परशराम प्रत्यक्ष आले जणुं छत्र धारायाला ॥ नाना और महादजी क्रमशः हिन्दू-धर्म के मस्तिष्क और तलवार थे । वे महाशक्तिशाली राज्य का विशाल भार अपने प्रशांत कंधों पर उठाने के लिये ही उत्पन्न हुये थे । इङ्गलैण्ड, फ्रांस, हालैण्ड और पुर्तगाल ने राज्य-स्थापन के लिये जितने भी राजनीतिज्ञ भेजे उनमें से कोई भी इन दोनों महापुरुषों को बल और बुद्धि में नीचा न दिखा सका । हेस्टिंग्स, वेलजली और कार्नवालिस की उनके सामने एक भी न चली । दोनों ने ही हिन्दू-राज्य के बढ़ते हुये वैभव को देखा था । दोनों ने ही महाराष्ट्र ———————————————————————————————— ꕤ प्रतापवान् सवाई माधोराव कलियुग में पैदा हुये तब, हमारी दरिद्रता के दिन समाप्त हो गये यह परम-सुन्दर और शान्त स्वभाव थे । सिर पर मणि जड़ित कलगी की ज्योति उनके मुख पर पड़ती थी । घर-घर खुशियां मनायी जाने लगीं और लोग यह समझने लगे कि साक्षात् परशुराम राज्य सम्भालने के लिये पैदा हुये हैं ।

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की नीति, उसका, उद्देश्य, और अपने कर्त्तव्य की शिक्षा नानासाहब और सदाशिवराव भाऊ से पाई थी। दोनों ने ही पानीपत का मैदान देखा था और वहां से लौटकर उस रक्त-रञ्जित भूमि पर पड़े हुये वीर पुरुषों के उद्देश्य को पूरा करने का उन्होंने दृढ़ निश्चय किया था। उस पर उन्हें ऐसे राज्य का भार उठाना पड़ा जो उस समय गृह-कलह से जर्जर हो रहा था; जो नाश के तट पर खड़ा था। जिसका राजा भी नाम मात्र का था, और जिसका प्रधान मंत्री था एक निर्बोध बालक; और जिसको नष्ट करने के लिए एक महा-शक्तिशाली यूरोपीय शत्रु अपनी राज्यलिप्सा के लिये समग्र शक्तियों का उपयोग कर रहा था। फिर भी उन्होंने अदम्य उत्साह और विलक्षण बुद्धि से सम्पूर्ण कठिनाइयों का सामना किया; राज्य के सब विद्रोहियों को शान्त किया और अपने विशाल बाहुबल तथा सुदूरदर्शिता से समस्त यूरोपीय और एशियाई शत्रुओं को पराजित करके नीचा दिखाया।

राज्य की दशा सुधारने के लिये उन्हें एक ऐसी क्रांति पैदा करने तथा उसे संयत रखने का कठिन उत्तरदायित्व लेनापड़ा, जिसका परिणाम बिल्कुल अनिश्चित था। किन्तु इस क्रांति ने सारे शत्रुओं और सरकार पर विजय पाई। अतः यह सर्वथा स्वाभाविक और राजनीति के अनुकूल था कि इस विजय को किसी महोत्सव द्वारा संसार को विदित कराया जाता। बालक पेशवा—सवाई माधोराव—का विवहोत्सव इस राष्ट्रीय आनन्द को मानने के लिये अत्यन्त उपयुक्त अवसर था। वह प्रजा का मनोनीत था, उसी के लिये राष्ट्र ने युद्ध भी ठाना था। जिस पेशवा की हत्या के लिये शत्रुओं ने युद्ध ही नहीं किया वरन उसे गुप्त और नीच प्रयत्नों द्वारा विष देकर मार भी डालना चाहा, आज उसे सब संकटों से सुरक्षित पाकर राष्ट्र के आनन्द का क्या ठिकाना ! जिस प्रकार कंस के अत्याचारों से कृष्ण को सुरक्षित पाकर गोकुल वालों ने आनन्द मनाया था, उसी प्रकार सारी प्रजा अपने प्यारे पेशवा को जीवित पाकर आनन्द में मग्न हो गई। इस राजकीय महोत्सव में सम्मिलित होने के

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लिये लोगों के चारों ओर से झुण्ड-के-झुण्ड आने लगे। राजकुमार, सरदार, कवि, प्रसिद्ध ग्रंथ-कर्त्ता, सेनापति तथा कूटनीतिज्ञ तथा राजनीति सब पूना शहर में अपने प्यारे और प्रतापी राजकुमार का दर्शन पाने तथा विवाहोत्सव मनाने के लिये एकत्र हो गये। संसार में महाराष्ट्रमंडल की धाक जमाने के लिये और विदेशियों तथा शत्रुओं की इस दुराशा को, कि महाराष्ट्रमंडल शीघ्र ही गृहकलह से छिन्न-भिन्न होकर नष्ट-भ्रष्ट होने वाला है, दूर करने के लिये नाना ने स्वयं महाराष्ट्र छत्रपति को निमन्त्रित किया, और जब वे प्रधान मंत्री के विवाहोत्सव की शोभा बढ़ाने के लिये पूना के पास पहुंचे तो अत्यन्त राजकीय समारोह के साथ उनका स्वागत किया। भव्य राज-भवन में छत्रपति सिंहासन पर विराजमान थे। उनके चारों ओर वाइसराय, सेनापति, जेनरल, राजनीतिज्ञ और राजकुमारगण बैठे थे। इनमें से कितने तो इतने बड़े प्रान्तों के शासक थे जो दूसरे महाद्वीपों के एक राज्य के बराबर थे। उस सभा में पटवर्धन, रास्ते, और पाडके जाति के लोग वर्तमान थे। वहां पर होल्कर, सीन्धिया, पवार, गायकवाड और भोंसला के प्रतिनिधि उपस्थित थे। वहां पर हरिद्वार से लेकर रामेश्वर तक के विद्वानों का जमघट लगा हुआ था। जयपुर, जोधपुर और उदयपुर के महाराजे सादर निमन्त्रित किये गये थे और उनके प्रतिनिधि राजदूत सभा में उपस्थित थे। निज़ाम, मुग़लराज और भारत की यूरोपीय शक्तियों ने अपने २ राजकुमार और राजदूतों द्वारा भेंट भेजी थी। राजधानी से मीलों दूर तक घोड़ों, तोपों और पैदल सेनाओं का पड़ाव पड़ा था, जिसके देखने से महाराष्ट्र की युद्ध-शक्ति का अच्छा परिचय मिलता था। आंगरे और धुलाप जल-सेना के अधिनायक थे। पेशवा की ओर से आंगरे अतिथियों के स्वागत का प्रबन्ध बड़ी योग्यता से कर रहा था। उस विशाल जनसमुदाय के ऊपर बड़े-बड़े सुनहले गेरुवा झंडे फहराते थे, मानों राष्ट्र को स्वधर्म-राज्य अथवा हिन्दू- पद-पादशाही के महान् कर्त्तव्य की ओर संकेत कर रहे थे।

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एक नियत संकेत पर पैदल, अश्वारोही और तोपों की सेना के बाजे बजने लगे और "प्यारे राजकुमार की जय हो, जय हो" के उच्च निनाद से दिशायें गूँज गईं। इसी समय परम सुन्दर और नव कुमार पेशवा ने राज-कर्मचारियों के साथ अत्यन्त धूमधाम से धीरे २ राजभवन में प्रवेश किया। सारा राज-समाज खड़ा हो गया और सिर झुकाकर पेशवा को राष्ट्र के प्रति अपनी दृढ़ राज-भक्ति का परिचय दिया। किन्तु लोगों के आश्चर्य की सीमा न रही जब उन्होंने बालक पेशवा को जो भारत का वास्तविक शासक था, सितारापति छत्रपति की ओर, जो सभा के मध्य में सिंहासन पर बैठे थे, फूलों की माला से तीन बार लपेटे हाथों को जोड़ कर जाते हुये देखा। यही नियम था कि पेशवा राजा के सामने उपस्थित हो और हाथ जोड़ कर उसकी अधीनता स्वीकार करे। इस दृश्य से बड़े-बड़े वीरों की आँखों से आनन्दाश्रु बहने लगे; यहाँ तक कि शांत तथा विज्ञ मन्त्री के गम्भीर मुख पर भी प्रसन्नता झलकने लगी और उनकी आँखों से आंसूओं की घड़ी २ बूँदें टपकने लगीं।

इस महोत्सव ने फिर से मरहठों में नवीन जीवन फूंक दिया और महाराष्ट्र फिर से एकता के सूत्र मे बंध गया। अन्य भारतीय राजा और यूरोपीय शक्तियाँ, जो मरहठोंकी फूट पर फूली न समाती थीं, आज नाना और अन्य महाराष्ट्र नेताओं की सफलता देख कर निराश हो गयीं। इस उत्सव का महाराष्ट्र के नेताओं पर भी कम प्रभाव न पड़ा। प्रजातन्त्र के गौरव ने मन में एक तरह का अभिमान भर दिया और अकेले २ राज्य- स्थापन की महत्ता इसके आगे कितनी तुच्छ है—इसे उन्होंने अच्छी तरह समझ लिया।

जैसे २ गृहकलह की अग्नि बुझती गई, महाराष्ट्र उन्नति के शिखर पर चढ़ता गया। नाना फड़नवीस और उनके सहायकों न शासन, आय-व्यय और न्याय की ऐसी व्यवस्था की थी कि सारे भारतवर्ष में महाराष्ट्र तथा उसके अन्तर्गत प्रांतों का शासन ही सर्वोत्तम था। भूमि कर नियत करने और

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उसके वसूल करने की विधि, न्यायालयों में छोटे बड़े सबके साथ समान व्यवहार का समुचित प्रबन्ध; और इन सबके उपरान्त लोगों को यह अनुभव कराना कि उस महान कर्त्तव्य की पूर्ति, जिस के लिये उनके पिता-पिता- मह और देवताओं तक ने अपना रक्त बहाया था, कितनी आवश्यक है; और उनका संबन्ध एक ऐसी जाति से है जो हिन्दू-धर्मकी रक्षा और स्वा- धीनता के लिये अपने विशाल कन्धे पर एक महान राष्ट्र का वहन कर रही है—इन सब विचारों को लेकर कोई भी हिन्दू ऐसा न था जो ऐसे शुभ समय में पैदा होने में अपना अहोभाग्य न समझता हो। राष्ट्र का प्रत्येक व्यक्ति एक ऊंची भावना से प्रभावित हो रहा था। नित्य प्रति एक-न-एक विजय अथवा कोई अन्य शुभ समाचार पहुंचता ही रहता था। तुच्छ-से-तुच्छ मनुष्य भी इस देश के लिये यह अत्यन्त गौरव का समय समझता था, और उसके विचार में यह सारी उन्नति बालक पेशवा सवाई माधोराव के शुभ-ग्रह की कृपा का ही परिणाम थी। यह प्रसिद्ध जनश्रुति थी कि स्वयं पहले माधोराव पेशवा ने ही मुस्लिम तथा अन्य विदेशी अत्याचारियों को नष्ट करके आसमुद्र शक्तिशाली हिन्दू-साम्राज्य- स्थापन की इच्छा पूर्ण करने के लिये दूसरे माधोराव के रूप में जन्म ग्रहण किया है। यही कारण था कि जब से बालक पेशवा का जन्म हुआ, राष्ट्रीय झण्डे पर भाग्यदेवी की सदैव कृपा रहती थी। ऐसे प्रच- लित अन्धविश्वास भी कभी २ राष्ट्र की आत्मा के अस्पष्ट उद्गार होते हैं और राष्ट्रीय कार्यों एवं उसकी विजयों पर उनका प्रभाव भी कम नहीं पड़ता। सालबाई के सुलहनामे के पश्चात् ही नाना ने हैदरअली के उत्तरा- धिकारी और महाराष्ट्र के भयानक शत्रु टीपू को ठीक करने के लिये परशुराम भाऊ और पटवर्धन को आज्ञा दी। सन् १७८४ ई० में युद्ध के कारण उपस्थित होने लगे। टीपू ने नारगुन्द के हिन्दू-राज्य पर अत्या- चार करना प्रारम्भ कर दिया और राजा ने मरहठों से सहायता मांगी। पटवर्धन और होल्कर के सेनापतित्व में निज़ाम की सहायता से मरहठों

४. अटक से कटक तक साम्राज्य विस्तार व महादजी शिन्दे

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ने टीपू को हराया और उसे सन्धि करने पर विवश किया, जिसके अनुसार टीपू को चौथ का पिछला सारा बकाया चुकाना पड़ा और उसे नारगुन्द पर अत्याचार न करने की प्रतिज्ञा करनी पड़ी। किन्तु मरहठों के पीठ फेरते ही उसने सारी प्रतिज्ञा पर पानी फेर दिया। नारगुन्द का क़िला ले लिया और अपने पूर्वजों का अनुकरण करते हुए राजा तथा उनके समस्त परिवार को निर्दयतापूर्वक मरवा डाला और राजा की लड़की को अपने अन्तःपुर में ले गया। तत्पश्चात मानो स्वर्ग के समस्त सुखों पर एकाधिपत्य प्राप्त करने और पाक मौलवियों तथा मुसलिम इतिहास-लेखकों से दीनरक्षक, ग़ाज़ी, औरङ्गज़ेब और तिमूर इत्यादि महान् पदवियाँ पाने के लिये उसने कृष्णा और तुङ्गभद्रा के बीच की हिन्दू-जनता पर घोर पाशविक अत्याचार करने आरम्भ कर दिये। इसलाम मज़हब क़बूल कराने के लिये जितने प्रकार के कष्ट देते बन पड़े, टीपू ने एक को भी न छोड़ा; और धर्म-रक्षा में तत्पर मरहठों को मानों धत्ता बताने के लिये ही उसने बलपूर्वक हज़ारों मनुष्यों की सुन्नत करा डाली तथा उन पर हर प्रकार के पाशविक अत्याचारों का प्रयोग किया। हमें इस बात की ओर विशेष ध्यान देना चाहिये कि जो लोग मुसलमानों द्वारा युद्ध में मारे गये, यद्यपि उन्होंने अपने प्राण शिवाजी और श्री स्वामी समर्थ रामदास जी के उपदेशानुसार संगठित होकर लड़ते हुए समर्पण न किये थे तथापि यह तो अवश्य था कि इन लोगों ने अपमानित होने की अपेक्षा मृत्युमुख में जाना अधिक अच्छा समझा, क्योंकि एक दो नहीं बल्कि दो सहस्र से भी अधिक ब्राह्मणों ने, जिन्हें टीपू हठात् मुसलमान बनाना चाहता था, अपने धर्म से च्युत हो घृणा- स्पद बनने की अपेक्षा बलिदान हो जाने में गौरव समझ कर अपने को धर्म पर निछावर कर दिया। मरहठों के आन्दोलन से पहले ही धर्म पर बलिदान होना लोगों की प्रतिदिन की दिनचर्या थी, अर्थात् हिन्दुओं ने मुसलमानी धर्म ग्रहण करने की अपेक्षा शरीर त्याग कर देना उचित समझ रक्खा था। श्री स्वामी रामदास जी ने सह्याद्रि

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पर्वत की चोटी पर खड़े होकर उच्च स्वर से कहा कि ऐसा करना भूल है; क्योंकि यद्यपि यह बात सत्य है कि मुसलमान होने की अपेक्षा मर जाना अधिक श्रेयस्कर है तथापि इससे भी बढ़ कर यह बात श्रेयस्कर है कि हम लोग प्रयत्न करें कि हमें कोई मुसलमान न बना सके और न हम मारे जायं। हमें अत्याचार करने वाली शक्ति को ही नष्ट कर देना चाहिये। मर जाना अच्छा है, पर विधर्मियों को मारते हुए प्राण दे देना इस से भी श्रेष्ठ है। उनके सैकड़ों चेले इस सिद्धान्त को छिपे २ मठों में जा जा कर लोगों को समझाने लगे। घर २ में इसका प्रचार होने लगा और उन्होंने लोगों को समझाया कि केवल कांटों के छत्र की ही इच्छा मत रक्खो, बल्कि असली विजय के ताज के लिये भी उसके साथ ही प्रयत्न करते जाओ। इन सब बातों को जानते हुए भी टीपू सुल्तान ने औरङ्गजेब की भांति जबर्दस्ती हिन्दुओं को मुसलमान बनाने का कार्य आरम्भ कर दिया जबकि महाराज शिवाजी के वंशज अभी तक पूना में राज्य कर रहे थे। सहस्रों ब्राह्मणों तथा आन्ध्र, करनाटक और तामिल प्रान्त के हिन्दुओं का करुण आर्तनाद पूना पहुँचा; उन लोगों ने मुसलमानों के हाथों से मुक्ति दिलाने के लिये मरहठों से प्रार्थना की। क्या ब्राह्मण-राज्य इस बात को सहन कर सकता था ? क्या मरहठों का हिन्दू-राज्य कृष्णा नदी के पार रहने वाले अपने धर्म-सब- न्धियों की इस दुर्दशा को सुनकर कभी चुप बैठा रह सकता था ? नहीं; यह सर्वथा असम्भव था। टीपू का ऐसा करना मरहठों को युद्ध के लिये ललकारना था; जिसे उन्होंने प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार कर लिया, और यद्यपि उनकी सेना उत्तरी भारतवर्ष में लड़ने में व्यस्त थी, तोभी नाना ने अपने सधर्मियों की सहायतार्थ तुरन्त ही कर्णाटक की ओर प्रयाण कर दिया। निज़ाम को भी उसने अपनी ओर इस शर्तपर मिला लिया कि टीपू के राज्य का जो भाग वे जीतेंगे, उसका तीसरा भाग उसको देंगे। इस के बाद उसने मरहठी सेना को अपनी सम्पूर्ण शक्ति से धर्मांध टीपू पर आक्रमण करने की आज्ञा दी, जिसके अनुसार पटवर्धन बेहरे तथा

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अन्य मरहठे सेनापतियों ने एकत्रित होकर अपनी सेना को १० करने तथा भागों में विभाजित कर दिया, तथा शत्रुके बदामी आदि किलों २७ देने अधिकार कर लिया और उन्हें इतना तंग कर दिया कि ये विवश हो गये के तथा उन बेचारों ने भागकर पर्वतों की खोहों में शरण ली; पर हिन्दू सेना ने उस मुसलिम धर्मवीर टीपू को, जिसने हिन्दू-स्त्रियों, बच्चों और शांतिप्रिय साधुओं को सताने तथा उनकी बालिकाओं को धर्मभ्रष्ट करने में भारी ख्याति प्राप्त करली थी, वहां पर भी सुखपूर्वक न रहने दिया। जब टीपू ने देखा कि एक शक्तिशाली हिन्दू राज्य उसका सत्यानास कर के संसार में कहीं भी उसे शान्तिपूर्वक नहीं रहने देता तो उसने सुलह की प्रार्थना की। यद्यपि सहस्रों हिन्दू और उनकी बालिकाओं ने धर्मरक्षा के लिये अपने प्राण निछावर कर दिये तथापि टीपू सुलतान की तलवार की धार मुड़ने की अपेक्षा और तेज होती गई, यहां तक कि विवश होकर उनके (हिन्दुओं के) धर्मरक्षक को उनकी सहायता के लिये सेना भेजनी पड़ी। इस प्रकार हर तरह से विवश होकर टीपू ने नारगुन्द, कित्तूर और बादामी की रियासतों को मरहठों के हवाले किया तथा बकाया लगान का तीस लाख रुपया भी उसी समय दे दिया और उसी वर्ष पन्द्रह लाख रुपया और देने की प्रतिज्ञा की। अगर चाहते तो मरहठे भी अपनी शक्ति के जोर से मुसलमानों को हिन्दू बना कर उन मौलवी-मौलानाओं को, जो टीपू की आज्ञानुसार हिन्दुओं पर भांति-भांति के अन्याय और अत्याचार कर उनकी शिखा कटवा रहे थे, शिखा धारण करने पर विवश करते, परन्तु उन्होंने न तो मस्जिदें गिरवायीं और न बलपूर्वक मुसलमान लड़कियों को उनके घरों से निकाला या अन्य धर्मावलम्बियों को संगीनों के जोर से हिन्दू-धर्म में लाने का प्रयत्न किया। ऐसी सभ्यता और वीरता के काम तो मरहठों की शक्ति से बाहर थे क्योंकि इन लोगों ने तैमूर, टीपू, अल्लाउद्दीन और औरङ्गजेब की तरह कुरान की शिक्षा न पाई थी, इसलिये

[ १७६ ] वे न्यायोचित सत्कार्यों के करने में भी धर्म की हानि समझते थे। धर्मान्धक मुसलमानों को छोड़कर ऐसे निष्ठुरता और अत्याचार के कामों को करने का भला कौन काफ़िर (हिन्दू) साहस कर सकता है ? दक्षिण के हिन्दुओं को दुराग्रही टीपू के क्रोध से मुक्त करने के बाद अपनी सम्पूर्ण सैनिक शक्ति को एकत्रित करके मरहठों ने उत्तर के शत्रुओं को दबाने का अवसर पाया, जिन्हें अकेले महादजी सींधिया ही अबतक रोके हुये थे। सालबाई के सुलहनामे के अनन्तर महादजी उत्तर को चले गए थे। उनके हृदय पर अग्रेज़ सेनापति के मातहत सुशिक्षित फौज का बड़ा प्रभाव था। उन्होंने भी पान पत के वीर सदाशिवराव भाऊ के उपाय को प्रयोग में लाने का निश्चय किया। सदाशिवराव ने ही सर्वप्रथम अपनी सेना को युरोपियनों की तरह बाक़ायद क़वायद और डिसिप्लन की शिक्षा दी थी-महादजी ने डा०बोइन नामक एक फ्रांसीसी जैनरल को रखकर एक विशाल सेना इस भांति सुसज्जित की जो किसी भी यूरोपियन सेना का भलीभांति सामना कर सकती थी इस प्रकार उन्होंने अपने आपको इस योग्य बना लिया कि उत्तर के सारे शत्रुओं को अपनी शर्तों पर संधि करने पर विवश किया। यद्यपि अंगरेज़ों ने यह प्रतिज्ञा की थी कि भारतवर्ष के बादशाह अर्थात् दिल्ली की राजनीति से उनका कोई सम्बन्ध न रहेगा और मरहठे जो चाहें कर सकेंगे, तो भी वे लोग असन्तोष फैलाते रहे और छिपे २ शाह आलम को अपने हाथ में रखने और उसे मरहठों के पास जाने से रोककर महादजी के रास्ते में रोड़े अटकाने से बाज़ न आये। यह सब कुछ होते हुये भी महादजी बादशाही राजनीति की बागडोर बड़ी मज़बूती के साथ अपने हाथों में पकड़े रहे। उन्होंने बादशाह को दिल्ली में लाकर वज़ीर की जगह के लिये मुसलमान प्रतिद्वं- द्वियों को हराया। मुसलमान और अङ्गरेज़ों को यह जानकर बहुत ही अधिक दुःख हुआ कि अन्त में बादशाह को महादजी को ही अपना

[ १७७ ] वजीर घोषित करने और शाही सेना भी उन्हीं के अधिकार में करने तथा दिल्ली और आगरे के दो सूबों का समस्त प्रबन्ध उन्हीं के हाथ में सौंप देने के लिए विवश होना पड़ा। इस प्रकार सिंधिया ने मुसलमानी साम्राज्य के कफ़न में अंतिम कील भी गाड़ दिया। इतना ही नहीं, बल्कि पेशवा को उसने "वजीर-ए-मुतलिक" के पद से विभूषित किया, और मुगल-सम्राट् के नाम पर उसे राज्य करने का अधिकार दिया तथा उसे महाराजाधिराज बना दिया इसके बदले में उसने ( ६५,००० ) पैंसठ हजार रुपये अपने निजी खर्च के लिये मांगे और नाममात्र का बादशाह कहलाने का हक भी मांगा। इस चकित कर देने वाली घटना और राज्य प्रबन्ध के परिवर्त्तन से उस समय कैसी दशा उत्पन्न हो गई थी उसका वर्णन उस समय के एक मरहठा संवाददाता के शब्दों मे किया जाता है-'राज्य हम लोगों का हो गया; मुग़ल सम्राट् प्रसन्नतापूर्वक पेंशनर होकर हमारे हाथ में है, वह अब भी बादशाह कहलाता है और यही उसकी इच्छा है। हम भी कुछ देर के लिये उसे ऐसा ही बनाये रखेंगे।” इसी प्रकार जब अंग्रेजों ने भी यह अधिकार प्राप्त कर लिया था तब वे भी इस प्रकार १८५७ तक ऐसा ही आडम्बर रचे रहे। महादजी ने इस घटना को हिन्दुओं पर किया उच्च आदर्श के रूप में रखने की इच्छा से सारे भारत में यह आज्ञा घोषित करा दी कि कहीं गोवध न हो। यह राजनीतिक परिवर्तन काग़ज़ों तक ही सीमित न रहा। उन्होंने सारे बुरे और हानिकारक नियमों को बन्द करना प्रारम्भ कर दिया और उनके स्थान पर महाराष्ट्र-मण्डल के हिन्दू-साम्राज्य के नियम प्रचलित कर दिये। महादजी ने सब से पहला काम यह किया कि अंग्रेजों को शाही- कर, मरहठों की चौथ और सरदेशमुखी देने के लिये कहा। उसके बाद उसने उन सूबेदारों और ज़मीदारों पर लगान लगाई जो कई वर्षों से स्वतन्त्र राजाओं की भांति कार्य कर रहे थे। महादजी के इस पग उठाने के कारण भारतवर्ष में तूफ़ान सा मच गया। सरदार, अमीर, खां-सब-के सब मरहठों से युद्ध करने के लिये तैयार हो गये, इतना ही नहीं, बल्कि

[ १७८ ] हिन्दू-राजे और राव भी मुसलमानों और अंग्रेजों की सहायता से मरहठों की एकमात्र हिन्दू शक्ति का-जो कि भारत में एक हिन्दू-साम्राज्य स्थापित करने के समर्थ थी-विरोध करने लगे। उनका यह विरोध स्वाभा- विक ही था, पर इसके साथ ही यह बड़े अभाग्य की बात भी थी। जयपुर और जोधपुर के दो बड़े हिन्दू-राज्यों ने मिलकर एक संगठित दल तैयार किया। यह संगठन इतना शक्तिशाली बनाया गया था, जितना बड़ा वे आज तक मुसलमानों अथवा अंग्रेजों के विरुद्ध कभी न बना सके थे। फिर मुसलमानी सेनाओं से मिलकर इन लोगों ने लालसोटे के स्थान पर सोंधिया की फ़ौज से भीषण युद्ध किया। जिस समय घमसान का युद्ध हो रहा था, उसी समय सारी शाही मुसलमानी सेना एक इशारे पर, जो पहिले ही से नियत था, महादजी का साथ छोड़ राजपूतों से जा मिली। इस धोखे और विश्वासघात के कारण मरहठों को घोर पराजय उठानी पड़ी। पर वीर मरहठा सेनापति महादजी इससे तनिक भी विचलित न हुए और निर्भयतापूर्वक फ़ौरन अपनी सेना को एकत्रित करने लगे। मरहठा सेनापति लाखोवा दादा के अधीन आगरे का किला था, मुसलमानों ने उस पर बहुत दबाव डाल रखा था, परन्तु मरहठा सेनापति ने डट कर मुकाबला किया इस प्रकार उसने महादजी के शत्रुओं की बाढ़ को रोके रखा। ठीक इसी समय नजीबखां का पोता गुलामकादिर, जिसे मरहठे अभी तक भूले न थे और जिसे उन्होंने क्षमा नहीं किया था, महादजी के हाथों से दिल्ली की रक्षा करने के लिये, रुहेलों और पठानों की फ़ौज लिये आ पहुंचा। मूर्ख बादशाह के प्रोत्साहन से वह दिल्ली में घुस आया। महादजी उसी समय राजपूत और मुसलमानों की संयुक्त-शक्ति से आगरे में युद्ध कर रहे थे। उन्हों ने पहले से ही इन दुर्घटनाओं की सूचना नाना को लिख भेजी थी और स्पष्टतया बतला दिया था कि इन सब आफ़तों की जड़ केवल अंग्रेज़ ही हैं। अंग्रेज़ सामने होकर मरहठों का सामना करने का साहस न रखते थे। उन्होंने कई बार सामना करने

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का प्रयत्न भी किया, पर सर्वदा असफल रहे थे। अंग्रेज़ इस बात को भलीभांति जानते थे कि यदि मरहठे कुछ समय तक और वज़ीर के पद पर वर्त्तमान रहे, तो अवश्य ही कुछ दिनों में खुलमखुला खुद महा- राजाधिराज के पद पर आरूढ़ हो जायेंगे। पर मरहठे तो प्रायः पहले ही ऐसा कर चुके थे। इन सब कारणों से मुग़लपादशाह के अधिकारों को अपने हाथ में करने के लिये अंग्रेज़ बड़े ही व्यग्र हो रहे थे। अब हम अपने पाठकों का ध्यान मरहठा-सेनापति के उस उत्साह- वर्धक पत्र की ओर आकर्षित करना चाहते हैं जो उन्होंने पूना में नाना के यहां भेजा था। उसमे लिखा था "हम लोग बृहत् साम्राज्य की हित कामना के लिये ही जीवित तथा प्रजातन्त्र राज्य के अधिपति के भक्त हैं। हमें व्यक्तिगत डाह और द्वेष का परित्याग कर देना चाहिये। यदि किसी को मेरे सम्बन्ध में किसी प्रकार का सन्देह हो तो उसे वह अपने दिल से निकाल दे। मैंने इस प्रजातन्त्र राज्य की जो सेवा की है, वह उन निन्दकों को चुप करा देने के लिये काफ़ी है जो हम लोगों के वास्त- विक शत्रु हैं और जो हम में फूट डाल कर लाभ उठाना चाहते हैं। अब हम लोगों को समयानुसार काम करने के लिये उद्यत तथा बाद- शाही झण्डे के चारों ओर एकत्रित हो जाना परमावश्यक है, जिस से हम अपने उस जातीय महान् ध्येय को, जिसे हमारे पूर्वजों ने हमें सौंपा है, सारे भारतवर्ष में सुरक्षित रख सकें और अपने इस महान् साम्राज्य को टुकड़े २ होने और नष्ट होने से बचा सकें"। नाना सेनापति की इस प्रार्थना को उस समय अनसुनी करने वाला मनुष्य न था, जब कि जातीय-कार्य संकट में पड़ा हुआ था। हम लोग ऊपर कह आये हैं कि वह टीपू के साथ युद्ध कर रहा था। किन्तु जब वह टीपू को भलीभांति नीचा दिखा चुका, त्योंही होल्कर और अलीबहादुर को महादजी की सहायता के लिये भेज दिया। अब जबकि उनके पूर्वजों की वांच्छित हिन्दू-पद-पादशाही स्थापित हो चुकी थी और सारा भारतवर्ष उसकी छत्र-छाया में आना ही चाहता था, राजपूतों और मरहठों को उस समय युद्ध के लिये उद्यत और शत्रुओं को सिर उठाने

[ १८० ] का मौका देते देख कर नाना को बड़ा ही दुःख हुआ और उसने राजपूतों और खास कर जयपुर के राजा के साथ पत्र-व्यवहार करना प्रारम्भ किया। उसने पेशवा की तरफ़ से पत्र लिखा, जिसमें महाराजा जयपुर को समझाने का प्रयत्न किया गया था कि मुसलमान हिन्दू-मात्र के शत्रु हैं और मरहठा-राज्य प्रायः स्थापित हो चुका है, अतएव आप लोगों को शत्रुओं के साथ मिलकर हमारे साथ शत्रुता करना उचित नहीं। पूना से भेजी हुई मरहठा-सेना की सहायता से महादजी ने शत्रुओं को भलीभांति पराजित कर दिया। फिर उसने बाता खां, अप्पा खांडे- राव और अन्य मरहठे-सेनापतियों के साथ डी बोइन की अध्यक्षता में दो सुशिक्षित सेनायें नजीव खाँ के पोते गुलामकादिर का सामना करने के लिये भेजीं। मुसलमानों ने भी युद्ध करने की ठान ली। दो बड़ी घमसान की लड़ाइयां हुईं। मुसलमान ऐसी बुरी तरह पराजित हुए जैसे पहले कभी नहीं हुए थे और इधर उधर भाग निकले। इस्माइल वेग और गुलामकादिर दिल्ली की ओर भगे। मरहठों ने उनका बड़ा पीछा किया। बादशाह भय से कांपने लगा। गुलामकादिर ने रुपया मांगा, पर बादशाह न दे सका। इस पर निर्दयी और असभ्य रुहेले सरदारों ने क्रोध से पागल होकर अत्याचार करना आरम्भ कर दिया और लूटमार करनी आरम्भ करदी। गुलामकादिर ने बादशाह को सिंहासन से खींच कर पृथ्वी पर दे मारा और अपने दोनों घुटनों को उसकी छाती पर रख कर, तलवार से उस बूढ़े, बेबस, अकबर और औरंगज़ेब की सन्तान की आंखें निकाल लीं। इतनी ही निर्दयता से उसे संतोष न हुआ, उसने उसकी स्त्रियों और लड़कियों को पकड़वा मंगाया और अपने नौकरों को उन पर अपनी आंखों के सामने बलात्कार करने की आज्ञा दी। गुलामकादिर के क्रोध करने के कारणों में एक कारण यह भी था कि वह अपनी जवानी के समय में शाहआलम की आज्ञा से नपुंसक बनाया गया था। राजधानी में लूट मच गई। मुसलमान मुसलमानों के ऊपर

[ १८३ ] अत्याचार करने लगे, मानो इसलाम के नाम पर अन्य धर्मावलम्बियों पर कर रहे हों। इसी भांति जो पहले बाहर अन्याय करता है कभी न कभी घर पर भी अवश्य करता है। अतः अन्यायी कभी-न-कभी अपना ही नाश करते हैं, इसमें संदेह नहीं। अब अपने ही धर्मावलम्बियों द्वारा किये गये क्रूर तथा राक्षसी कृत्यों और अपमानों से नगर-निवासिनी मुसलिम-कन्याओं की कौन रक्षा करने वाला था काफिरों यानी हिन्दू और मरहठों के अतिरिक्त ऐसी और कोई नहीं कर सकता था। दिल्ली राज्यसिंहासन के अधिपति इन मुगलों और इनके पूर्वजों ने हिन्दुओं के मन्दिरों को धूल में मिला दिया था, उनकी मूर्तियां तोड़ डाली थीं। वे उनकी रानियों और राजकुमारियों को पकड़कर अपने महलों में ले गये थे। उन्होंने हिन्दू कन्याओं के सतीत्व को बलात्कार भ्रष्ट किया था। नवयुवकों को उनके धर्म से वंचित किया था। उन्होंने माता को बच्चे से, बहिन को भाई से जुदा किया था और हिन्दुओं के रक्त से होली खेली थी। यह सब कुछ इस लिये करते थे कि वे ग़ाज़ी की प्रतिष्ठा तथा इस दुनियां में धर्म-रक्षक की पदवी प्राप्त कर सकें तथा दूसरी दुनियां में अपने लिये पुण्य के भागी बन सकें। और अब हिन्दू दिल्ली में आ रहे हैं; लेकिन मसजिदों को तोड़ने के लिए नहीं; उनके खंडों को टुकड़े टुकड़े करने के लिये नहीं; मकबरों को धराशायी करने के लिये नहीं और न ही उन्हें अपवित्र करने के लिये; वे किसी राजकुमारी या दीन से दीन मुसलमान-कन्या पर हाथ लगाने या उसे हिन्दू बनाने के लिये, माता को बच्चे से छीनने अथवा पिता का पुत्र से वियोग कराने के लिये नहीं आ रहे। वे सत्यनासिनी शराब में पागल होकर खून बहाने या अपनी प्रतिष्ठा और गौरव का अंदाज़ा शत्रु के धड़से पृथक् की हुई खोपड़ियों के ढेर लगा कर लगाने नहीं आ रहे। उनका उद्देश्य राजधानी को जला कर राख कर डालने का भी नहीं है। वे ऐसा कर सकते थे; और अगर करते भी तो मुसलमानों

[ १८२ ] को इसके लिये उन्हें दोषी ठहराने का कोई हक़ न था। पर हिन्दू तो इसलिये आ रहे हैं कि बादशाह उसके परिवार और दिल्ली निवासियों की उन्हीं के सहधर्मियों के अन्याय और अत्याचार से रक्षा करें ! समस्त नगरनिवासी मरहठों के आगमन के लिये ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे और उनके पहुंचने पर क्या हिंदू क्या मुसलमान—सबने एक हृदय होकर उन का स्वागत किया। अलीजा बहादुर, अप्पा खांडेराव, रानाखां और डी बोइन ने शहर पर अधिकार कर लिया। लेकिन जब उन्हें मालूम हुआ कि गुलामक़ादिर पहले ही भाग गया है तो वे बड़े दुःखी हुए, क्योंकि वह नजीबखां का पोता और मरहठों का स्वाभाविक शत्रु था, और उसे कुछ दण्ड न मिले उन्हें बिल्कुल नापसन्द था। मरहठों ने औरङ्गजेब की सन्तानों के सुख के लिये मनुष्योचित समस्त उपायों का उपयोग किया, यद्यपि इसी परिवार ने मरहठों के सत्यानाश के लिये, गुलाम- क़ादिर के साथ मिलकर षड्यन्त्र रचा था। गुलामक़ादिर का पीछा करने के लिये एक बड़ी सेना पहले ही भेजी जा चुकी थी। वह भाग कर मेरठ के किले में छिपा हुआ अपनी रक्षा करने का विचार कर रहा था। गुलामक़ादिर ने थोड़ी देर तक इस सेना का मुकाबला किया, पर जब देखा कि अब बचना कठिन है तो एक घोड़े पर चढ़ कर भाग निकला। लेकिन घबरा- हट में घोड़े से गिर पड़ा और बेहोश हो गया। गांव वालों ने उसे पहचान लिया और उसे मरहठों के पास ले आये। उस अधम को दंड देने के लिये मुसलमान-जनता जितनी लालायित थी उतना और कोई भी न था। वह शिन्दे के सामने लाया गया और गुलामक़ादिर को उन सब शत्रुताओं का बदला चुकाना पड़ा जो कि उसकी तीन पीढ़ी और शिन्दे के मध्य थीं। उसकी बड़ी दुर्दशा की गई और चूंकि अब भी वह गालियां देने से बाज न आता था इस लिये उसकी जीभ काट ली गई और आंखें फोड़ दी गईं। इस प्रकार निर्दयतापूर्वक सताये जाने के बाद नजीब का पोता मुगल बादशाह के पास भेज दिया गया, जिसकी इच्छा अपने

[ १८३ ] सताने वाले को भी उसी दशा में देखने या सुनने की थी। यहां उसे मृत्युदंड मिला। इस प्रकार पानीपत के युद्ध-समय में मरहठों का नाश करने की प्रतिज्ञा करने वाले नजीब के परिवार का स्वयं मरहठों के हाथों ऐसा नाश हुआ कि उसके वंश या राज्य का निशान भी अवशेष न रहा। सन् १७८६ ई० में दूसरे मरहठे-सेनापतियों के साथ महादजी ने अपने शत्रुओं पर विजय पाने में सफलता प्राप्त की और मुसलमानों तथा उनके सहायक राजपूतों को हरा कर उनका नाश कर दिया और ऐसी वीरतापूर्वक अङ्गरेज़ों का सामना किया कि वे उसकी बहादुरी का लोहा मानकर दबने लगे। बूढ़ा मुग़ल बादशाह फिर इसके हाथ में आ गया और जब उसने महादजी को 'वकील-ए-मुतलिक' का पद देना चाहा तो उसने एक बार फिर इस पद को अपने स्वामी पेशवा के लिए प्राप्त किया। जिन दिनों मरहठी सेनायें इस प्रकार उत्तर में फँस रही थीं, टीपू के हृदय में फिर गुदगुदी पैदा हुई और उसने एक बार फिर अपनी शक्ति की परीक्षा करने का विचार किया। सन् १७८६ ई० में ही उसने धम- काना शुरू किया, पर वह सीधे मरहठों पर हमला करना नहीं चाहता था। वह किसी प्रकार अपना राज्य बढ़ाना चाहता था। उसने सोचा कि अगर मरहठों के कारण मैं अपना राज्य कृष्णा नदी की ओर नहीं बढ़ा सकता तो अपने पड़ोसी ट्रावनकोर के दुर्बल हिन्दू-राज्य पर आक्रमण कर उसी पर क्यों न अधिकार कर लूँ ? इस लिये नाना ने निज़ाम और अङ्गरेज़ों को साथ मिला कर टीपू से युद्ध ठान लिया और पटवर्धन ने भी टीपू के राज्य पर आक्रमण कर दिया। ध्यान देने की बात है कि मरहठों के पहुँचने पर उस प्रान्त के निवासियों ने अन्यायी टीपू के विपक्ष में उनकी सहायता की, यहां तक कि उन लोगों ने टीपू के सरदारों को वहां से निकाल बाहर किया और मरहठों के बाकी पड़े करों को वसूल करने में सहायता करने लगे। हुबली, घोड़वाड़ और