हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पृष्ठ 168, कुल 254 में से
संदर्भ में पढ़ें[ १७० ]
लिये लोगों के चारों ओर से झुण्ड-के-झुण्ड आने लगे। राजकुमार, सरदार, कवि, प्रसिद्ध ग्रंथ-कर्त्ता, सेनापति तथा कूटनीतिज्ञ तथा राजनीति सब पूना शहर में अपने प्यारे और प्रतापी राजकुमार का दर्शन पाने तथा विवाहोत्सव मनाने के लिये एकत्र हो गये। संसार में महाराष्ट्रमंडल की धाक जमाने के लिये और विदेशियों तथा शत्रुओं की इस दुराशा को, कि महाराष्ट्रमंडल शीघ्र ही गृहकलह से छिन्न-भिन्न होकर नष्ट-भ्रष्ट होने वाला है, दूर करने के लिये नाना ने स्वयं महाराष्ट्र छत्रपति को निमन्त्रित किया, और जब वे प्रधान मंत्री के विवाहोत्सव की शोभा बढ़ाने के लिये पूना के पास पहुंचे तो अत्यन्त राजकीय समारोह के साथ उनका स्वागत किया। भव्य राज-भवन में छत्रपति सिंहासन पर विराजमान थे। उनके चारों ओर वाइसराय, सेनापति, जेनरल, राजनीतिज्ञ और राजकुमारगण बैठे थे। इनमें से कितने तो इतने बड़े प्रान्तों के शासक थे जो दूसरे महाद्वीपों के एक राज्य के बराबर थे। उस सभा में पटवर्धन, रास्ते, और पाडके जाति के लोग वर्तमान थे। वहां पर होल्कर, सीन्धिया, पवार, गायकवाड और भोंसला के प्रतिनिधि उपस्थित थे। वहां पर हरिद्वार से लेकर रामेश्वर तक के विद्वानों का जमघट लगा हुआ था। जयपुर, जोधपुर और उदयपुर के महाराजे सादर निमन्त्रित किये गये थे और उनके प्रतिनिधि राजदूत सभा में उपस्थित थे। निज़ाम, मुग़लराज और भारत की यूरोपीय शक्तियों ने अपने २ राजकुमार और राजदूतों द्वारा भेंट भेजी थी। राजधानी से मीलों दूर तक घोड़ों, तोपों और पैदल सेनाओं का पड़ाव पड़ा था, जिसके देखने से महाराष्ट्र की युद्ध-शक्ति का अच्छा परिचय मिलता था। आंगरे और धुलाप जल-सेना के अधिनायक थे। पेशवा की ओर से आंगरे अतिथियों के स्वागत का प्रबन्ध बड़ी योग्यता से कर रहा था। उस विशाल जनसमुदाय के ऊपर बड़े-बड़े सुनहले गेरुवा झंडे फहराते थे, मानों राष्ट्र को स्वधर्म-राज्य अथवा हिन्दू- पद-पादशाही के महान् कर्त्तव्य की ओर संकेत कर रहे थे।