हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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एक नियत संकेत पर पैदल, अश्वारोही और तोपों की सेना के बाजे बजने लगे और "प्यारे राजकुमार की जय हो, जय हो" के उच्च निनाद से दिशायें गूँज गईं। इसी समय परम सुन्दर और नव कुमार पेशवा ने राज-कर्मचारियों के साथ अत्यन्त धूमधाम से धीरे २ राजभवन में प्रवेश किया। सारा राज-समाज खड़ा हो गया और सिर झुकाकर पेशवा को राष्ट्र के प्रति अपनी दृढ़ राज-भक्ति का परिचय दिया। किन्तु लोगों के आश्चर्य की सीमा न रही जब उन्होंने बालक पेशवा को जो भारत का वास्तविक शासक था, सितारापति छत्रपति की ओर, जो सभा के मध्य में सिंहासन पर बैठे थे, फूलों की माला से तीन बार लपेटे हाथों को जोड़ कर जाते हुये देखा। यही नियम था कि पेशवा राजा के सामने उपस्थित हो और हाथ जोड़ कर उसकी अधीनता स्वीकार करे। इस दृश्य से बड़े-बड़े वीरों की आँखों से आनन्दाश्रु बहने लगे; यहाँ तक कि शांत तथा विज्ञ मन्त्री के गम्भीर मुख पर भी प्रसन्नता झलकने लगी और उनकी आँखों से आंसूओं की घड़ी २ बूँदें टपकने लगीं।
इस महोत्सव ने फिर से मरहठों में नवीन जीवन फूंक दिया और महाराष्ट्र फिर से एकता के सूत्र मे बंध गया। अन्य भारतीय राजा और यूरोपीय शक्तियाँ, जो मरहठोंकी फूट पर फूली न समाती थीं, आज नाना और अन्य महाराष्ट्र नेताओं की सफलता देख कर निराश हो गयीं। इस उत्सव का महाराष्ट्र के नेताओं पर भी कम प्रभाव न पड़ा। प्रजातन्त्र के गौरव ने मन में एक तरह का अभिमान भर दिया और अकेले २ राज्य- स्थापन की महत्ता इसके आगे कितनी तुच्छ है—इसे उन्होंने अच्छी तरह समझ लिया।
जैसे २ गृहकलह की अग्नि बुझती गई, महाराष्ट्र उन्नति के शिखर पर चढ़ता गया। नाना फड़नवीस और उनके सहायकों न शासन, आय-व्यय और न्याय की ऐसी व्यवस्था की थी कि सारे भारतवर्ष में महाराष्ट्र तथा उसके अन्तर्गत प्रांतों का शासन ही सर्वोत्तम था। भूमि कर नियत करने और