भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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मरहठों के हवाले किया और मालमिट को छोड़ कर जो देश वे मरहठों दवा बैठे थे तथा पुरन्धर के सुलहनामे में पाये थे, मरहठों को लौटा दिये उन्होंने यह भी प्रण किया वे किसी भी राजा को मरहठों के विरोध सहायता न देंगे। मरहठों ने भी प्रतिज्ञा की कि वे कोई कार्य ऐसा नह करेंगे जिस से अङ्गरेजों की हानि पहुंचे। सब से महत्वपूर्ण बात इ सुलहनामा में यह हुई कि दिल्ली के राजनैतिक क्षेत्र में हस्ताक्षेप न करने क अङ्गरेजों ने प्रतिज्ञा की और इस पर मरहठों का पूर्ण अधिकार माना क वे जो चाहें सो कर सकते हैं। इस प्रकार मरहठों और अङ्गरेजों की पहली लड़ाई का अ- हुआ। मरहठों ने योरुप की उस शक्ति के साथ, जो अभी तक मरह से नहीं लड़ी थी रण में लड़कर तथा उन्हें पराजित कर के उ को यह पाठ पढ़ा दिया कि यद्यपि वे बङ्गाल और मद्रास में शक्तिशा हैं तथापि यदि वे लोग सह्याद्रि के दुर्ग की ओर कुदृष्टि फेरेंगे औ मरहठों के हिन्दू-साम्राज्य का अहित सोचेंगे तो उनका सिर कुच दिया जायगा। सालबाई के संधि-पत्र के थोड़े ही दिन बाद राघोबा ने भी अप चाल को बदल दिया। उसने अपनी जाति को शत्रुओं के हाथ में फंसा उचित न समझा। इसने अपने नीच विचारों और कर्मों द्वारा मर को उनके उस उच्च आदर्श से गिरा दिया था जिसके लिये उनके पूर्व लड़ते हुए मरे थे; अब वे आपस में ही लड़ने के लिये तत्पर हो ग थे। इसका जीवन महाराष्ट्र के लिये वैसा ही हानिकारक सिद्ध हुआ जै पानीपत की लड़ाई। सालबाई की संधि के थोड़े ही समय बाद रघुनाथ राव मर गया। मरता हुआ भी वह अपनी जाति के लिए अपने भी अधिक एक और कलंक छोड़ गया। मरहठों के अभाग्यव रघुनाथराव के एक पुत्र पैदा हुआ, जिसका नाम उसके पितामह नाम पर बाजी राव द्वितीय रखा गया। यह लड़का उन नीच कर्मों