हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपर विजय प्राप्त करके बड़ी प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिये आया था वह किसी प्रकार अपने अच्छे ग्रहों के कारण से भाग कर, अपना लगभग सारा बारूद, बन्दूकें, खीमें तथा सामान और हजारों तोपों के गोलों और सहस्रों बैलों को छोड़ कर, बम्बई पहुंचा । यह सारा सामान विजयी मरहठों के हाथ लगा। धृष्टता से दो बार अंग्रेजों ने पूना को जीतने का जी तोड़ कर प्रयत्न किया, किन्तु दोनों ही बार बुरी तरह हार खाई और अन्त में अपमानित और निराश होकर बम्बई लौट गये। इस के पहिले अंग्रेज इतने अपमानित हो कर कभी भी घर नहीं लौटे थे। उत्तर भारत में भी अङ्गरेज ढंग से अच्छी तरह न लड़ सके। प्रारम्भ में गोहाद् के राना की सहायता से अङ्गरेजों ने सींधिया के ग्वालियर के क़िले को घेर लिया; किन्तु महादजी सींधिया के घोर आक्रमण करने पर इसे देर तक अपने हाथ में न रख सके। कर्नल मूर भी अपने मित्र की सहायता के लिये शीघ्र वहां पहुंचा, किन्तु वह भी कुछ न कर सका। दक्खिन में हैदरअली से हारकर और बम्बई में तुकोजी और पटवर्धन से नीचा देखकर और उत्तर में सींधिया से परास्त होकर अङ्गरेजों ने उस मित्रता की जाल को, जिसे नाना ने तैयार किया था, तोड़ने का प्रयत्न किया और महादजी सींधिया से प्रार्थना की कि वह उन लोगों के साथ एक अलग सुलहनामा पर हस्ताक्षर करें। नाना फड़नवीस ने अलग सुलह करने से साफ़ उत्तर दे दिया और कहा कि बिना हैदरअली की राय के वह किसी प्रकार की संधि नहीं कर सकते। मरहठों की जलसेना ने भी अच्छी सफलता प्राप्त की थी। उनके सेनापति आनन्दराव धुलाप ने अङ्गरेज़ों पर एक सुविख्यात विजय पाकर उनके 'रेंजर' नामी बेड़े को पकड़ लिया और इसे युद्ध में लूटा हुआ माल समझ कर अपने साथ लेगया। ठीक इसी समय जबकि संधि की बातचीत हो रही थी, हैदरअली मर गया। इसलिये नाना ने १७८२ ई० में संधि कर ली। इस संधि के अनुसार अङ्गरेजों ने रघुनाथराव को