हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पृष्ठ 145, कुल 254 में से
संदर्भ में पढ़ें[ १४५ ] की सारी सेना—सेनापति से लेकर सिपाही तक—शत्रुओं की सेना के सामने लोहे की दीवार की तरह खड़ी रही । जब हैदरअली समीप आया तो मरहठों के अजेय साहस को देखकर हक्का-बक्का हो गया और जिधर से आया था उसी ओर शीघ्र लौट गया । युद्ध जारी रहा । पेठे, पटवर्धन, रास्ते और दूसरे मरहठा-सेनापति हैदरअली का पीछा जगह-जगह पर करते रहे और मोती तालाब पर उसे अपने हाथों में करके उसकी सारी सेना काट डाली और उसका खेमा, उसके हथियार तथा अनेकों युद्ध सामग्री अपने हाथों में कर ली । मरहठों की इस बार प्रबल इच्छा थी कि हैदरअली के नाम को राजनैतिक क्षेत्र से मिटा दें, किन्तु ठीक उसी समय उन्हें पूना से एक पत्र मिला, जिसमें लिखा था कि पेशवा बहुत बीमार पड़ा हुआ है, लड़ाई बन्द करके राजधानी में चले आओ । मरहठा सेना- पति ने इस पत्र के कारण विवश हैदरअली से सुलह कर ली, जिसके अनुसार हैदरअली ने मरहठा-स्वराज प्रान्तों को लौटाया और लड़ाई व्यय के अतिरिक्त ५० हजार रुपये उपहार रूप में और दिये । जिसके सुयोग्य नेतृत्व में मरहठों ने शत्रुओं से पानीपत के अत्याचारों का बदला लिया, जिसने अपने राष्ट्र की प्रतिष्ठा को पहले की भाँति उच्चत्तम शिखर पर चढ़ाया, उस नेताकी बीमारी का समाचार ऐसी शानदार घटनाओं के होने के समय दिल्ली से लेकर मैसूर तक की सारी मरहठा छावनियों में पहुँचा और हर एक व्यक्ति ने इसे परमात्मा की कुदृष्टि समझा । माधोराव की केवल सैनिक वीरता के अपूर्व गुणों ने ही उसे इतना सर्वप्रिय नहीं बनाया था, किन्तु उसका नागरिक-शासन भी न्यायपूर्ण और पक्षपातरहित था, वह राजा से लेकर रंक तक अपनी सम्पूर्ण प्रजा की भलाई विशुद्धात्मा से से करता था और वह इतना गंभीर, सत्यवादी और न्यायप्रिय था कि उसकी नीच-से-नीच प्रजा का भी उनके प्रति भक्ति और प्रेम हो