हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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गया था, शक्तिशाली पुरुषों को उस की सत्यता और न्यायपरायणता का भय बना रहता था। दीन व दुःखी किसानों को उसमें रक्षा का पूर्ण भरोसा था। यद्यपि घरेलू झगड़े और नाशकारी पारिवारिक युद्ध उसके स्वार्थी और मूर्ख चाचा के कारण चल रहा था, तो भी दस वर्ष के भीतर ही भीतर इसने अपनी जाति के ऊपर से पानीपत के कलंक को मिटा दिया और अपने शक्तिशाली भुजबल द्वारा शत्रुओं को, जिन्होंने ने हिन्दू-स्वतंत्रता और हिन्दू-पद-पादशाही के विरोध में हाथ उठाये थे, हराकर कुचल डाला। जब कि वह बिल्कुल जवानी की उमंगों से भरा हुआ था उसी समय वह अपने सौभाग्य और लोकप्रियता के के शिखर पर चढ़ा हुआ था। जाति उस पर यह आशा लगाए बैठी थी कि वह अपने पिता से बढ़कर गौरवशाली कार्य करेगा। केवल २७ वर्ष की अल्पायु में माधवराव क्षय रोग में ग्रस्त हो गए। वह महलों में बीमार पड़ा था, किन्तु फिर भी उसने अपने कुलँगी चाचा को, जो इस समय भी निज़ाम से मिल कर षड्यन्त्र रच रहा था, प्रसन्न करने का बड़ा प्रयत्न किया। उसने रघुनाथ को सब कार्य सौंप दिया और अपने राज्यवैद्य से अनुरोध किया कि मुझे ऐसी दवा दो कि मैं मरते समय भी मूर्च्छित न होऊँ और मुझ में बोलने की शक्ति वर्तमान रहे ताकि मैं प्राण त्यागते समय भी परमात्मा की प्रार्थना कर सकूँ। जब पेशवा की असाध्य बीमारी का समाचार उसके दूर-दूर के राज्यों में पहुँचा तो उसकी प्यारी प्रजा चारों तरफ से पूना में अपने जातीय शूरवीर और जातीय पिता के अन्तिम दर्शन को आने लगी। उसने आज्ञा दी कि राजमहल का फाटक खोल दो और प्रजा में से किसी दीन मनुष्य तक को भी मेरे पास आने से न रोका जाय। सन् १७७० ई० में कार्तिक वदी अष्टमी को उदार राजकुमार ने विद्वान् और सत्पुरुषों को अपने पास बुलाया। उनकी ओर सिर झुका कर, और जो लोग उसे देवत तुल्य समझ कर घेरे हुए पड़े हुए थे, उनकी तरफ मुँह करके उनसे अन्तिम विदा मांगी।