भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 147, कुल 254 में से

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पृष्ठ 147

[ १४७ ] उसने कहा—"अब मैं आप लोगों से पृथक् होता हूँ और अपनी अन्तिम महान् तीर्थ-यात्रा के लिये प्रस्थान करता हूँ और आप लोगों को अन्तिम विदा का नमस्कार करता हूँ"। इस प्रकार राजकुमार ने सबके बीच परमात्मा का नाम लेते हुए योगियों की भांति गजानन-गजानन कहते हुए इस असार संसार को छोड़ा। राजमहल के लोगों में हाहाकार मच गया और सब लोग रोने-पीटने लगे। उसकी युवा स्त्री रमाबाई, जिसके अभी तक कोई संतान न हुई थी, अपने सारे आभूषणों तथा जवाहिरात को साधुओं, ब्राह्मण और दीन दुःखियों को दान कर, अपने सम्बन्धियों के दबाव और प्रार्थना की कुछ परवाह न कर के अपने प्यारे प्रियतम की चिता पर बैठ गई। प्रज्वलित ज्वालाओं में अपनी आहुति डालकर उसने अपनी आत्मा की मशाल को जला लिया और उसके प्रकाश से अमर प्रेम और स्वर्गीय सौंदर्य के रहस्यों का उद्घाटन करके यह भी बता दिया कि वे इस समय भी मनुष्य द्वारा प्राप्त किये जा सकते हैं। अब भी लोग महाराष्ट्र में महाराज माधोराव और सती रमाबाई का वर्णन करके आँसुओं द्वारा उनके प्रति अपना प्रेम और श्रद्धा प्रकट करते हैं। वर्त्तमान समय में भी राष्ट्रीय कवि उन की मृत्यु के सम्बन्ध में कवितायें बना बना कर विलाप करते हैं और कहा करते हैं—कि हमारे जीवन की ज्योति निकल गई और हमारे हृदय का रत्न खो गया"। १८ गृह-कलह और सर्व-प्रिय क्रान्ति "इंग्रजानां खडे चारिले नाहीं लागु दिला थारा भले बुद्धिचे सागर नाना ऐसे नाहिं होणार" ❄ सारी जाति के आशास्वरूप माधोराव का युवावस्था में मर ❄ फिरंगियों को उसने पत्थर खिलाये और अपने मन की बातों को उन पर प्रकट नहीं होने दिया। बुद्धि के सागर नाना फड़नवीस के समान व्यक्ति पैदा होने अब बड़े मुश्किल हैं।