हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पृष्ठ 148, कुल 254 में से
संदर्भ में पढ़ें[ १४८ ] जाना और राघोबा जैसे कलंकित व्यक्ति का उनके पीछे, एक पीढ़ी तक जीवित रहना ऐसी घटनाओं में से हैं जिन्हें देखकर कभी कभी मनुष्य संशय में पड़ जाता है कि वास्तव में परमात्मा सर्वशक्तिमान् है भी या नहीं । माधोराव की अकाल मृत्यु जाति के लिये एक बड़ा दुर्भाग्य था, पर राघोबा का जीवित रहना तो उससे कहीं आपत्तिप्रद था । ज्योंही निःसन्तान माधोराव की जगह पर, उन की और जाति की इच्छानुसार, उनका छोटा भाई नारायणराव गद्दी पर बैठा त्योंही रघुनाथराव उसके और उसके सहायकों के विरुद्ध एक नवीन हत्याकाण्ड का षड्यन्त्र रचने लगा । उसने महल के पहरेदारों को रिश्वत देकर अपने पक्ष में कर लिया और उन्हें आज्ञा दी कि नये पेशवा को घेर कर पकड़ लो । पर इस उपाय को उसकी पिशाचिनी स्त्री आनन्दीबाई ने पलटकर पहरेदारों को उभारा और कहा कि पकड़ने के बजाय मार डालो । ३० अगस्त सन १७७३ में सिपाही विद्रोही हो गए और नारायणराव से वेतन मांगते हुए असभ्यता- पूर्वक शोर मचाने लग गए । इस समय पेशवा के एक सद्य सेवक ने उन बलवाइयों को उनके इस प्रकार के नीच कार्य्य पर धिक्कारा । इस पर उन्हों ने क्रोधित होकर तलवार खींचली और उस स्वामिभक्त को उसी समय मार डाला । डरा हुआ पेशवा अकेला अपनी जान बचाने के लिए एक कमरे से दूसरे कमरे में भागने लगा और हत्यारे उसका पीछा करते रहे । अन्त में वह अपने चाचा राघोबा के कमरे में पहुंचा और व्याकुल होकर चाचा की कमर से लिपट गया और गिड़गिड़ा कर बड़े आर्तस्वर से कहने लगा, “चाचा ! चाचा !! मैं आपका लड़का हूँ । मुझ अनाथ को प्राण-दान देकर कृतार्थ कीजिये । मैं आप ही को पेशवा स्वीकार करता हूँ और जो रोटी का टुकड़ा आप मुझे देंगे उसके अतिरिक्त किसी वस्तु की मांग न करूंगा, उसी पर अपना जीवन-निर्वाह सुखपूर्वक करूंगा ।” पर हत्यारे बलवाई जो उसका पीछा करते आते थे वहां भी पहुँच गये । राघोबा ने नारायणराव को अपने बदन से छुड़ा कर परे कर दिया और