हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पृष्ठ 144, कुल 254 में से
संदर्भ में पढ़ें[Header] [ १४४ ] भयभीत करने के लिये जबकि वह अनावदी के जंगलों में घुस गया स्था- पित की गई । एक रात जब यह सेना मट्टू के पास खेमा डाले पड़ी थी, हैदरअली अपने बीस हज़ार चुने वीरों के साथ जंगल से निकल पड़ा और शेर की भाँति अचानक मरहठा-सेना पर टूट पड़ा। किन्तु सौभाग्य- वश हैदरअली की तोप की पहिले ही गरज पर मरहठा सेनापति गोपालराव जाग उठा । उसने तत्काल ही खतरे को ताड़ लिया । उसने सोचा कि यदि मैं तनिक भी हिचकूंगा तथा दुर्बलता प्रकट करूँगा तो सारी सेना जगनेके पहिले ही मार डाली जायगी । वह अपने घोड़ेपर कूद कर सवार हो गया और अपने झण्डे को लहराते हुए अपनी जगह पर खड़े होकर आज्ञा दी कि खतरे का डंका बजाओ । इस भयानक शब्द को सुनकर सारे सिपाही उठ बैठे और बिछौनों को छोड़ कर रण-क्षेत्र में आ डटे । अब शत्रुओं की भयंकर अग्नि भड़की, घमासान की लड़ाई होने लगी । घुड़सवार सैनिक घायल हो होकर पृथ्वी पर गिरने लगे । हैदर- अली की तोपों की गरज और उसके गोलों की बाढ़ ने मरहटों को पीछे हटा दिया, लेकिन गोपालराव निर्भयता-पूर्वक अपनी जगह पर डटा रहा और ललकारते हुये अपना झण्डा फहराता रहा । लड़ाई के खतरे वाला डंका अब तक बज रहा था । सेनापति का सहायक पास ही खड़ा था । एक तोप का गोला लगा और उसका सिर टुकड़े २ हो गया । लोहू फुहारे की भाँति निकलने लगा जिससे मरहठा सेनापति लोहू से भीग गया । फिर परशुराम भाऊ घोड़े पर सवार हुआ और अपने स्थान पर डट गया । उसके घोड़े के एक गोली लगी और वह मर गया, तब वह दूसरे घोड़े पर चढ़ा । ज्यों ही उस पर गया, त्यों ही वह घोड़ा भी तोप का गोला लगने से मर गया । इस पर सेनापति चंचल हो उठा । वह फिर तीसरे घोड़े पर चढ़ा और मृत्यु के मुँह में खड़ा रहा। यदि वह भय और घबराहट से ज़रा भी पीछे हटता तो शत्रु अचानक आक्रमण कर देते और सारी सेना विजयी शत्रुओं के हाथ में फंस जाती, किन्तु सेना- पति के साहस को देखकर सारी सेना में फिर साहस आ गया । मरहटों