भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 143, कुल 254 में से

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वह पानीपत की लड़ाई के दिन से आज तक की शेष नोचखस करने और नये विजित राज्य को बराबर-बराबर बाँट लेने के लिये सहमत न हुआ। यद्यपि यह कार्य एक बार सन् १७६१ ई० में हो चुका था लेकिन सन् १७७१ ई० में पूर्ण रीति से हो गया। रुहेले और पठानों की इस भयानक हार के पश्चात मुसलमानों का कोई ऐसा राज्य न रह गया जो हिन्दुओं के सारे हिन्दुस्तान के महाराज होने के विरुद्ध आवाज उठाता। मानो उसी साल मुसलमानों की स्वतन्त्रता, शक्ति और सारी इच्छाओं का अन्तिम संहार हो गया। मुग़ल, तुर्क, अफ़गान, पठान, रुहेले, फारसी तथा उत्तरी और दक्षिणी मुसलमानों के सारे सम्प्रदायों ने लड़कर बदला लेने वाले हिन्दुओं के हाथ से मुसलमानी राज्य को छुड़ाने का प्रयत्न किया, लेकिन मरहठों ने उनके सभी प्रयत्नों को निष्फल कर दिया। इस प्रकार उन्होंने भारत साम्राज्य के संरक्षक के शाही अधिकार को ५० वर्ष से अधिक अपने हाथों में रक्खा तथा जो इसके लिये लड़ा, उसे नीचा दिखाया। सन् १७७१ ई० के बाद मुसलमानों की शक्ति भारतवर्ष के राजनैतिक क्षेत्र में न रही। इस प्रकार हिन्दुओं ने उनकी शक्ति का अन्त करके अटक से समुद्र तक फिर अपना स्वतन्त्रता प्राप्त की। अब केवल एक ही दावेदार था, जिसके विरुद्ध उन्हें संघर्ष और लड़ाई करनी थी। यह दावेदार मुसलमान नहीं था, पर वह ऐसा था जिसका कि स्वभाव, ढंग और मानसिक शक्ति मुसलमानों से बिलकुल भिन्न थी, वह था अंग्रेज़।

यदि मरहठों की दो सेनाओं के महाराष्ट्र से उत्तर में चले जाने के पश्चात शूरवीर हैदरअली अपने भाग्य को पुनः आजमाने के लिये न उठा होता और मरहठों के प्रभुत्व को दक्खिन में अस्वीकार न करता तो यह एक बड़ी अद्भुत बात हुई होती। माधोराव तुंगभद्रा नदी को पार करता हुआ एक शक्तिशाली सेना के साथ दुर्ग के पीछे दुर्ग जीतता और शत्रुओं को हर जगह हराता हुआ बढ़ता गया। एक दूसरी सेना हैदरअली को

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