हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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जैसा पाशविक अत्याचार निर्दयी रुहेलों द्वारा मरहठे स्त्रियों और बच्चों पर पानीपत के मैदान में किया गया था, यदि उसी प्रकार की निर्दयता और अत्याचार मरठे नजीबखां और जबेथखां के परिवार के साथ करते तो अन्याय नहीं कहा जा सकता था; किन्तु शान्ति-प्रिय हिन्दुओं के परम्परागत नियम के अनुसार मरहठे न तो किसी के धर्म को छुड़ाते थे और न उनको अपने खेमे में लाकर क़त्ल ही करते थे। हिन्दू-वीरों ने यद्यपि इस राक्षसी कार्य पर कभी हाथ नहीं उठाया, फिर भी उनका डर सारे रुहेलों और पठानों के दिलमें ऐसा बैठगया था कि मरहठा अश्वारोही को देखते ही सारा गांव-का-गांव ही घर छोड़ कर भागना प्रारम्भ कर देता था। रुहेलों के जो सेनापति जीवित रहे, तराई के घने जंगलों में भाग गये। वर्षाकाल प्रारम्भ हो जाने के कारण ही वे प्रतिहिंसा-ज्वाला से बच रहे अन्यथा उन्हें भी मृत्यु का आस्वादन करा दिया जाता। इस प्रकार मरहठों ने पानीपत की हार का ब्याज-सहित शत्रुओं से बदला लिया। धर्म-ध्वजा को तराई के वनों की सीमा तक पहुँचा कर तथा अपने शत्रुओं को भयभीत करके मरहठे पीछे लौटे। सन् १७७१ ई० में मरहठों की सेना दिल्ली को वापिस लौट पड़ी। वहां पर महाराष्ट्र के राजनैतिक पुरुष अपने अपने सेनापतियों की विजय का लाभ पहिले ही से उठा रहे थे और शाह आलम को, जोकि मुग़ल साम्राज्य का उत्तराधिकारी था-अपने हाथ में लेकर भारत में सर्वश्रेष्ठ शक्ति प्राप्त करने के जो-जो उपाय अंग्रेजों और शुजा ने मिलकर सोचे थे, उन्हें निष्फल कर दिया। उन्होंने शाह आलम को विवश किया कि वह हिन्दुस्थान के राज्य चलाने तथा रक्षा करने के अधिकार तथा उत्तर- दायित्व का सारा भार मरहठों के हवाले कर दे। इसके बदले में उन्होंने उसे हिन्दुस्तान का नाम-मात्र का सम्राट् मानना स्वीकार कर लिया। उसे नाम-मात्रका सम्राट् मानने के लियेभी मरहठे तबतक तैयार न हुये जबतक