भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 228, कुल 254 में से

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पृष्ठ 228

[ ३० ] हिंदू का यह कर्तव्य है कि जिन लोगों ने उस साम्राज्य की स्थापना के 'लिये अपने प्राणों को निछावर किया, उनका स्मरण आने पर उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करें । ४. मरहठों की नवीन युद्ध कला "आपणांस राखून गनीम घ्यावा. स्थलास गनिमाचा वेढा पडला तो रोज झुंजून स्थल जतन करावें. निदान येऊन पडलें तरी परिच्छिन्न वार होऊन लोकीं मरावें. पण सल्ला देऊन, स्थल देऊन, जीव वांचविला असें न सर्वथा न घडावें --राजाज्ञा ऐसे अवघेंची उठतां । परदलाची काय ती चिंता । हरिणें पळती उठतां चित्ता । चहूकडे"--रामदास हम पुस्तक के आरंभ में ही लिख आये हैं कि शिवाजी और उनके पूज्यपाद गुरु सद्ज्ञानी रामदास जी द्वारा हमारी जाति के सामने आध्यात्मिक तथा जातीय उच्च आदर्शों को युक्तिपूर्वक रखने तथा नवीन युद्ध कला तथा और नये २ अस्त्र शस्त्रों के आविष्कार के कारण महाराज शिवाजी के जन्म के साथ हिन्दू जाति के वर्तमान इतिहास में एक बड़े ॐ यदि शत्रु हमारे देश पर आक्रमण करें तो प्रतिदिवस अपने आप को सुरक्षित करके उनसे लड़ना चाहिये । यदि विपत्ति सर पर आपड़े तो पीछे नहीं हटना चाहिये, वरन् लड़ते २ मर जाना चाहिये ताकि पीछे संसार यह न कहे कि हमने अपने देश का बलिदान करके अपनी जान बचाई है । --राजाज्ञा इसी प्रकार सारा संसार हमारे विरुद्ध खड़ा भी हो जाय तो भी कोई चिंता नहीं । शत्रु-सेना से भय मत खाओ । शत्रु की सेना को इधर उधर भागते हुए हिरणों के समान समझो ।-- रामदास