हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४५ ] मालवा-निवासी मिलकर मरहठों को बुलायें ताकि वे इनको स्वतन्त्र करा सकें और हिन्दू राज्य की स्थापना कर सकें। क्योंकि इस समय सिवाय मरहठों के हिन्दूधर्म का रक्षक दूसरा कोई दिखाई नहीं दिया तब उसके सामने दो परिस्थितियां उपस्थित हुईं, या तो वह मरहठों से सहा- यता मांग कर उनके अधीन होकर रहता या वह विदेशी यवनों के अधीन होकर फलता फूलता। उस समय उस विचारशील राजकुमार ने भली भांति समझ लिया था कि इस समय भारतवर्ष में जितने हिन्दू-शासक हैं, उनमें से केवल महाराष्ट्र-मंडल ही एक ऐसी सुसंगठित शक्ति है, जो मुसलमानों का उचित रूप से सामना करके रणक्षेत्र में उन्हे नीचा दिखा सकती है और हिन्दुओं को एकत्रित करके एक सूत्र में बांध सकती है। उसने सोचा कि यदि मैं अग्रसर होकर अपने बाहुबल से इस पीड़ित हिन्दू-जाति को मुसलमानों के अन्याय से मुक्त नहीं करा सकता, तो मेरा अपनी जाति के प्रति अवश्य यह कर्त्तव्य होना चाहिये कि अपनी सारी इच्छा, आशा और तृष्णा को त्याग कर, अपने सर्व नीच विचारों को तथा पारस्परिक वैर-भाव को तिलांजलि देकर उन महापुरुषों का सहायक बनूं जो हिन्दू- जाति को स्वतन्त्र बना सकते हैं और बनायेंगे। प्रभावशाली ठाकुर नंदलाल मांडवी ने उक्त राजकुमार के विचारों का सादर अनुमोदन किया और बड़े हर्ष-पूर्वक मालवा निवासी हिन्दुओं की ओर से अपनी जाति एवं धर्म की मान रक्षा के लिए तथा म्लेच्छों को मार भगाने के लिए मरहठों को पत्र द्वारा आमन्त्रित किया। मरहठों ने, जिनका जीवन ही धर्म की रक्षा के लिये हुआ है, मालवा निवासी अपने सहधर्मियों के निमंत्रण-पत्र को पाकर बड़ी प्रसन्नता के साथ शीघ्र ही चिम्माजी (बाजीराव के भाई) की अध्यक्षता में सारे प्रांत पर चारों ओर से आक्रमण कर दिया। उधर मुग़ल वायसराय ने यह समाचार पाकर एक बड़ी संख्या में अपनी सेना एकत्रित की, लेकिन मरहठे लड़ाई के समय उनकी तनिक भी परवाह न करके तिल भर भी रण-क्षेत्र से न हटे