भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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पृष्ठ 46

[ ४६ ] प्रत्युत् सुअवसर पाते ही मुसलमानी सेना पर अचानक टूट पड़े और देवास की लड़ाई में वायसराय का काम तमाम कर दिया । किन्तु मुग़ल सम्राट मालवा जैसे धनशाली प्रान्त को, इस प्रकार सहज ही अपने हाथ से खो देने के लिये कदापि तैयार न था, इसलिये उसने मरहठों का सामना करने के लिए एक नया वायसराय मालवा भेजा । उधर महरठों से सहानुभूति रखने वाले सभी मालवा निवासी मरहठा फ़ौज में शामिल हो गये । नये मुग़ल अधिनायक ने अपनी विशाल सेना के साथ एक भयंकर उपाय सोचकर मरहठों का मांडव घाट के दरों तथा अन्य दूसरी घाटियों में नाश करने का विचार किया। लेकिन मरहठों ने मालवा निवासी हिन्दुओं की सहायता से चिम्माजी अप्पा तथा पिलाजी की संरक्षता में, मुग़ल सेना को तिराल नामक स्थान पर, एक घमासान लड़ाई करके पूर्णरूप से पराजित किया और उनके नये वायसराय को भी मार डाला तथा मुगलों को मालवा से बिलकुल निराश कर दिया । इस प्रकार दूसरी बार विजय के समाचारः को सुनकर मालवा के हिन्दुओं की प्रसन्नता की सीमा न रही । वे आनन्दसागर में निमग्न हो गये । आज उनके लिये एक महान् गौरव का दिन सामने आया। सैंकड़ों वर्ष की हार और पराजय के पश्चात् अब फिर उन्होंने विजय के साथ हिन्दू-ध्वजा को स्वतन्त्र फहराते हुए देखा । उस ध्वजा की छाया से उन की नसों में जीवन रक्त का संचार होने लगा । उनका हृदय देशभक्ति, जातीय प्रेम तथा धार्मिक भावों से भर गया । उनके मुक्ति-दाता मरहठे जिस ओर जाते थे, बड़ी धूम-धाम से उनका स्वागत करके उनके प्रति अपनी कृतज्ञता जताते थे । स्वयं जयसिंह ने भी एक मानपूर्वक पत्रद्वारा सारे मरहठे सेना- पतियों को, जिन्होंने लड़ाई में अपूर्व साहस तथा वीरता का परिचय दिया था, इस अद्भुत सफलता पर बहुत २ बधाई देते हुए तथा उनका