भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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सहस्रवार धन्यवाद करते हुए लिखा कि आप की विजय अति शोभापूर्ण है। आपने मुसलमान शत्रुओं को मालवा प्रान्त से निकाल कर, मालवा निवासी हिन्दुओं को यवनों की दास्ता की बेड़ी से मुक्त करा के हिन्दू- धर्म के साथ जो उपकार किया है, उसके लिये हम लोग आजन्म आपके ऋणी हैं और जो कुछ आपके प्रति कहा जाय, सब कुछ थोडा है। केवल सहस्रों धन्यवाद देकर ही मैं अपने आपको कृतकृत्य समझता हूं। मरहठे सरदारों ने शीघ्र ही देश मे शान्ति स्थापित कर दी और मुगल-प्रतिनिधियों को मालवा से निकाल कर उस पर महाराष्ट्र के एक सूबे की भांति, शासन करने लगे। इतने पर भी, दिल्ली का बादशाह पूर्ण निराशा में भी आशा की किरण ढूंढने का प्रयत्न करने लगा। उसने पुनः एक नये वायसराय को भेजा जिस का नाम मुहम्मदखां बंगश था। वह एक बहादुर शेरदिल रुहेला पठान था। उसने लड़ाइयों में अपनी वीरता से मुसलमानी सेना के अन्दर बड़ा नाम पैदा किया हुआ था। उसे मुगल बादशाह की तरफ से पुरस्कार में 'रणसिंह' की उपाधि मिली हुई थी। दिल्ली-दरबार की ओर से उसे सब मे पहिले बुन्देला-सरदार छत्रसाल की बढ़ती हुई शक्ति का नाश करने और तत्पश्चात् मालवा से मरहठों का नामोनिशान मिटा देने का भार सौंपा गया। बुन्देला-सरदार छत्रसाल, कुछ दिनों से मुसलमानों की गुलामी की बेड़ी को अपने परिश्रम से तोड़ कर, स्वतन्त्र राजनैतिक जीवन व्यतीत कर रहा था। छत्रसाल शिवाजी का एक अनन्य भक्त था, शिवाजी की आदर्शपूर्ण शिक्षा ने उसके हृदय मे स्वतन्त्रता की नींव रखी थी। उसने यौवन काल से ही शिवाजी को अपना गुरु तथा पथ- दर्शक स्वीकार किया हुआ था। तब से ही वह शिवाजी की सम्मति अनुसार बुन्देलखण्ड के हिन्दुओं की स्वतन्त्रता के लिये प्रयत्नशील रहा और अंत में बड़ी सफलतापूर्वक उसने अपने देश और धर्म को स्वतन्त्र