हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंही बाजीराओ, मल्हरराओ, चिम्माजी अप्पा तथा अन्य मरहठे सरदारों ने जितनी शीघ्रता हो सकी, उतनी शीघ्रता से सत्तर हज़ार सेनाओ के साथ कूच कर दिया और महाराज छत्रसाल से धामोराह के स्थान पर जा मिले । छत्रसाल भी अपनी बची बचाई बुन्देला-सेना एकत्रित कर, उनके साथ रवाना हो गये । यद्यपि उस समय मूसलाधार वृष्टि हो रही थी तथापि रणमद में मत्त मरहठों ने इसकी कुछ भी परवह न की । मुहम्मदखां अपनी असंख्य सेना के साथ, एक छोटे से हिन्दू- राज्य पर विजय प्राप्त करके तथा राजा छत्रमाल को उसकी राजधानी से निकाल कर, अपनी वीरता पर बहुत गर्वित हो रहा था । उसने वर्षा- काल में आराम करने का विचार किया । जिस समय मुग़ल-अधिपति इस प्रकार मूर्खों के स्वर्ग में विचर रहा था उसी समय भयानक वर्षाकाल की तनिक भी परवाह न करते हुए धर्मवीर हिन्दू सेनाओं ने मरहठों की छत्र-छाया में अपनी जान हथेली पर रख कर, सघन वनों, दुर्जय पर्वतों तथा विकट मार्गों को पार करके अचानक मुहम्मदखां बंगश पर चढ़ाई कर दी और सन् १७२६ ईसवी में जैतपुर की लड़ाई में उसे भली भांति परास्त कर दिया । उससे जीते हुए राज्य को पुनः छीन लिया । सुख-स्वप्न देखने वाले 'रणसिंह' ने अब अपने आप को शत्रुओं से घिरा हुआ पाया । जान जाने के भय से वह बड़ी नीचता पूर्वक रणक्षेत्र से पीठ दिखा कर भागा और दिल्लीराज से मिली हुई 'लड़ाई के शेर' की उपाधि को अक्षरशः सत्य बनाकर मुसल- मानों का मुख उज्ज्वल किया ! इस प्रकार सारा मालवा व बुन्देल- खण्ड पुनः हिन्दुओं के हाथ आ गया । वृद्ध बुन्देले-सरदार छत्रमाल ने पुनः बड़ी धूमधाम से अपनी राजधानी में प्रवेश किया । नगरनिवासी अपने बिछुड़े हुए सरदार के शुभागमन से कृतकृत्य हुए और उन्होंने आन्तरिक हृदय से उन का स्वागत किया । सारा नगर मरहठों की तोपों की ध्वनि से गूंज उठा ।