भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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पृष्ठ 50

[ ५० ] वृद्ध छत्रसाल मरहठों के इतने कृतज्ञ हुए कि उन्होंने बाजीराव को अपना तृतीय पुत्र बना लिया। उनकी मृत्यु के पश्चात् उनके राज्य का तीसरा भाग बाजीराव के हवाले कर दिया गया। बुन्देलों का यह अनु- पम कार्य, इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि मरहठों के सिद्धान्त और आदर्श, जिन पर कि उनका निस्वार्थ कार्य निर्भर था, बहुत उच्च थे। इसी कारण से बाजीराव के वंशजों में प्रान्तीय तथा व्यक्तिगत भेद-भाव लेशमात्र भी न बचा, और सभी लोग अपने आपको एक खून, एक जाति तथा एक ही धर्म-सूत्र में बंधा हुआ समझने लग गये। इन ही उच्च आदर्शों ने सबके हृदयों को हिन्दू स्वतन्त्रता प्राप्त करने और एक सुविशाल हिन्दुसाम्राज्य स्थापित करने के पवित्र भावों से भर दिया। तीसरे मुसलमान वायसराय मुहम्मदखां बंगश के मालवा और बुन्देलखण्ड से भाग जाने पर मरहठे सारे देश के स्वामी बन गये। वह स्थान उनके लिये बड़ा ही उपयुक्त सिद्ध हुआ। यहीं से उन्होंने हिन्दू- स्वतन्त्रता की लड़ाई मुगल राज्य के ठीक केंद्र में आरम्भ करने की ठान ली। जिस समय मालवा और बुन्देलखण्ड में ये लड़ाइयां हो रही थीं उसी समय मरहठे गुजरात प्रान्त में अच्छी सफलता प्राप्त कर रहे थे। सेनापति पिलाजी गायकवाड़, कन्थाजी वान्दे और अन्त में स्वयं चिम्मा जी अप्पा ने क्रमशः गुजरात-प्रान्त में मुसलमानी सेनाओं को ऐसा नीचा दिखाया कि विवश होकर मुगल वाइसराय ने "चौथ" और "सरदेश- मुखी" देने की शर्त पर सन्धि कर ली। परन्तु मुगल-बादशाह, मरहठों की ऐसी गर्वपूर्ण विजय पर अत्यन्त क्रोधित हुआ और उसने सेनापति अभयसिंह को मरहठों को गुजरात से शीघ्र बाहर करने का भार सौंप कर भेजा। अभयसिंह, जयसिंह से बिल्कुल प्रतिकूल प्रकृति का पुरुष था। उसकी आत्म-प्रतिष्ठा और आत्मिक स्वार्थ ने उसे ऐसा अन्धा