हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ५१ ] बना दिया था कि वह किसी प्रकार भी हिन्दू स्वतन्त्रता की लड़ाई मे जान निछावर करने वाले हिन्दुओं का पक्ष ग्रहण करने के लिए तय्यार न था। यहां तक कि हिन्दू-आन्दोलन में भाग न लेने वाले हिन्दू भी उसमें हज़ार अंशों में अच्छे गिने जाते थे। इस समय केवल महाराष्ट्र-मंडल ही हिंदुओं की एक अपूर्व संगठित शक्ति थी जो इस महान् कार्य्य को सफल बनाने के योग्य थी। जाति और धर्म का शत्रु, मुगलों का गुलाम, स्वार्थी, नीच, कुल- घातक अभयसिंह मरहठों से लड़ने के लिये गुजरात गया। वहां वह मरहठों की अपूर्व शक्ति तथा वीरता को देखकर चकित होगया और लड़ाई से डर कर सुलह करने के बहाने मरहठा सरदार पिलाजी गायकवाड को डाकोर नामक पवित्र स्थान पर बुलाया। डाकोर हिन्दुओं का धर्म स्थान है। इसलिए तीर्थ की पवित्रता तथा क्षत्रियों के वचन पर विश्वास करके शुद्ध चित्त पिला जी ने वहां जाने में कोई आपत्ति न की। पर जैसा पिला का अनुमान था वैसा न हुआ। उस नीच, कुल-कलंकी, स्वार्थ-परायण, मुग़ल-गुलाम अभयसिंह ने धोखा दिया और पिलाजी को मरवा अपनी नीचता का पूर्ण परिचय दिया। लेकिन शीघ्र ही उसे ज्ञात हो गया कि वह केवल एक खून करने का ही अपराधी ही नहीं है, वरन् उससे एक बड़ी भारी भूल भी हो गई है। मरहठे ऐसे कायर न थे जो अपने एक सरदार की मृत्यु से हताश होकर अपने उद्देश्य को अधूरा छोड़ देते या डर कर लड़ाई बन्द कर देते। युद्ध और मृत्यु उनके बचपन के साथी थे। उनका तो पालन पोषण ही इन्हीं परिस्थितियों में हुआ था। ऐसे मरहठों के किसी एक नेता या सेनापति को यदि कोई धोके से मार कर उनकी जाति पर अपना प्रभाव जमाना चाहे या उनको अपने वश में करना चाहे तो यह उसकी निरी मूर्खता ही समझनी चाहिये। यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि जिस प्रकार मालवा व बुन्देल-