हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ५२ ] खण्ड-वासियों ने महाराष्ट्र-मंडल को प्रार्थना पत्र भेज कर अपनी सहायता के लिये बुलाया और उनके आने पर उनका साथ दिया एवं उनके आन्दोलन के हृदय से पक्षपाती बने, उसी प्रकार गुजरात वासियों ने भी मरहठों को बुलाया और उनके साथ मिल गये। तथा उनके साथ सर्वदा सहानुभूति रक्खी और उनके पक्ष में लड़ते भी रहे। पिला जी की अन्याय-पूर्ण हत्या का समाचार सुन कर गुजरात के कोल, भील, बाघड़ी और अन्यान्य सैनिक जातियां अत्यन्त क्रोधित हुईं। मुगलों से इस हत्या का बदला लेने का भाव, उनके हृदय में भर आया। इसलिये मरहठे हर तरफ से टूट पड़े और गोलाबारी करके १७३२ ईस्वी में वड़ौदा राज्य को लेकर उसे ऐसा सुगठित बना लिया कि वह आज तक मरहठों की एक प्रसिद्ध राजधानी बना हुआ है। लड़ाई में अभयसिंह के पैर बिल्कुल उखड़ गये, वह अपने पाप और नीचता के कारण पवित्र, धर्मिष्ठ मरहठों का तनिक भी सामना न कर सका। उधर दामाजी गायकवाड़ ने अभयसिंह की राजधानी जोधपुर पर चढ़ाई कर दी। यह सुन अभयसिंह के होश-हवास उड़ गये, अन्त में विवश होकर लड़ाई से मुंह मोड़ वह अपनी पैतृक राजधानी जोधपुर की रक्षा के लिये शीघ्र लौटने पर विवश हो गया। इधर धामाजी भी उसके लौटने का समाचार सुनकर मुड़ा और अहमदाबाद पर चढ़ाई करके उसको ले लिया और मुग़ल सेना व उसके प्रतिनिधि को चक्कर में डाल दिया और उसकी ऐसी परिस्थिति बना दी कि उसके अहमदाबाद को मरहठों से लौटा लेने की बात तो दूर रही उनका पुनः गुजरात में आना ही असम्भव बना दिया गया। इस प्रकार १७३५ ईस्वी में, मुग़ल राज्य का यह सारा सूबा उनके हाथ से निकल गया और उनकी लहलहाती हुई आशा लता का सत्यानास हो गया।