भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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पृष्ठ 55

[ ५५ ] सौदागरों ने उनके इस अधिकार का पूर्ण विरोध किया। इसके फलस्वरूप कान्हों जी ने विवश होकर उन्हें दण्ड देने के लिये उनके जहाज़ों को, नौकरों तथा सामान-सहित उस समय तक रोके रक्खा जब तक कि वे "चौथ" अदा न करें। सन् १७१५ ईस्वी में चार्ल्स बून जब बम्बई का गवर्नर नियुक्त हो कर आया तो उसने आंगरे के सामुद्रिक किले को विध्वंस कर देने का दृढ़ निश्चय किया। उसे अपनी वीरता पर पूर्ण अभिमान था और वह सर्वदा अपनी वीरता की डींगें मारा करता था। उसने दुर्ग के विजय करने के लिये एक बड़ी सेना का निर्माण किया, और विजय दुर्ग की बन्दरगाह पर आक्रमण कर दिया। अंग्रेज़ क्रोध से लाल हो रहे थे। उन्हों ने अपने जंगी जहाज़ों के नाम क्रमशः "हन्टर" अर्थात् शिकारी, "हॉक" अर्थात् बाज़, "रिवेंज" अर्थात् बदला लेने वाला और "विक्ट्री" अर्थात् विजय रक्खे। इन लोगों का एक संगठित पैदल दल भी था जिस में सहस्रों ही चुने हुए अंग्रेज़ योद्धा थे। यह दल मरठ्ठों के सामुद्रिक किले के नाश करने वाली सेना की सहायता के लिए तैयार किया गया था। इस प्रकार चार्ल्स बून ने अपनी जाति के महान् गौरव को दिखाने के लिये एक शक्तिशाली सेना के साथ मरहठों के सुदृढ़ किले पर एक ओर से धावा कर दिया और शीघ्र ही दूसरी ओर से उपर्युक्त विशेष नामधारी पैदल दल ने स्थल की ओर से धावा बोला। १७ अप्रैल सन् १७१७ ई० को क्रोधित अङ्गरेज़ी सेना ने मरहठों के विजय दुर्ग पर गोलाबारी प्रारम्भ कर दी। लेकिन उनकी लहलहाती आशा लता पर शीघ्र ही तुषार पड़ गया। उन्हें विदित हो गया कि यह किला मोम का बना हुआ नहीं है, जो उन के गोलों की गरमी से शीघ्र ही पिघल जाता, बल्कि यह विशाल किला दृढ़ तथा सब प्रकार से सुरक्षित बनाया गया है, जिस के चारों ओर तोपखाना लगा हुआ है। इस पर भी वीर अङ्गरेज़