हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ५४ ] सागर की स्वतन्त्रता के लिये एक अलग सेना की नींव डाली और इस की सहायता के लिये एक नया सुसज्जित दृढ़ सामुद्रिक दुर्गों का बेड़ा भी बनवाया। इस के द्वारा, लगभग सौ वर्ष तक, हिन्द-महासागर स्वतन्त्र तथा सुरक्षित रहा। राजाराम के समय में, जब औरङ्गज़ेब ने सारे दक्षिण प्रान्त पर विजय प्राप्त कर ली और मरहठे संगठित होकर उनका मुक़ाबला करने के योग्य न रहे, तब उन्हें जहां कहीं भी उनका शत्रुओं से सामना हुआ, वहीं वे अलग अलग बड़ी शूरता के साथ लड़ते रहे। परन्तु मुग़ल सेना को, समुद्रतट से भगाने का भार प्रधान-सेनापति कान्होजी आंगरे, गुजरास तथा अन्य मरहठे नौ-सैनिकों के सिर पड़ा। व अपने कर्त्तव्य को इस योग्यता से निबाहते रहे कि अंग्रेज़, पुर्तगेज़, डच, सिद्दी और मुग़लों में, किसी का भी व्यक्तिगत अथवा संगठित रूप में साहस न हुआ कि मरहठों की उन्नतिशील सामुद्रिक शक्ति को दबा सके। अंग्रेज़ों को विशेष हानि उठानी पड़ी क्योंकि खाण्डेरी द्वीप, बम्बई की बन्दरगाह से केवल १६ मील की दूरी पर था। वह द्वीप प्रसिद्ध नौ-सेना- नायक कान्होजी आंगरे के आधिपत्य में था। वे समझते थे कि यदि जंजीरा के सिद्दी की मुसलमानी शक्ति से मरहटे-जनरल स्वतन्त्र रहे तो वे अवश्य हमारा शक्ति का नाश कर देंगे और साथ-ही-साथ पश्चिमी किनारे के पूरे शक्तिशाली पुर्तगेज़ी सौदागरों का भी नाश कर देंगे। अपनी शक्ति को शत्रुओं से सुरक्षित रखने के लिये कान्होजी आंगरे को एक बड़ी सेना रखने के लिये बाध्य होना पड़ा, जिस के खर्च की पूर्ति के लिये, अरब सागर के व्यापारियों के जहाज़ों पर “चौथ” लगा दी गई। मरहठों का, हिन्द-महासागर पर आधिपत्य स्थापित करने तथा उन पर चलने वाले विदेशियों के जहाज़ों पर “चौथ” लगाने का अधिकार उचित ही नहीं, बल्कि यथार्थ भी था। लेकिन अंग्रेज़ तथा अन्य विदेशी