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हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

[ ५४ ] सागर की स्वतन्त्रता के लिये एक अलग सेना की नींव डाली और इस की सहायता के लिये एक नया सुसज्जित दृढ़ सामुद्रिक दुर्गों का बेड़ा भी बनवाया। इस के द्वारा, लगभग सौ वर्ष तक, हिन्द-महासागर स्वतन्त्र तथा सुरक्षित रहा। राजाराम के समय में, जब औरङ्गज़ेब ने सारे दक्षिण प्रान्त पर विजय प्राप्त कर ली और मरहठे संगठित होकर उनका मुक़ाबला करने के योग्य न रहे, तब उन्हें जहां कहीं भी उनका शत्रुओं से सामना हुआ, वहीं वे अलग अलग बड़ी शूरता के साथ लड़ते रहे। परन्तु मुग़ल सेना को, समुद्रतट से भगाने का भार प्रधान-सेनापति कान्होजी आंगरे, गुजरास तथा अन्य मरहठे नौ-सैनिकों के सिर पड़ा। व अपने कर्त्तव्य को इस योग्यता से निबाहते रहे कि अंग्रेज़, पुर्तगेज़, डच, सिद्दी और मुग़लों में, किसी का भी व्यक्तिगत अथवा संगठित रूप में साहस न हुआ कि मरहठों की उन्नतिशील सामुद्रिक शक्ति को दबा सके। अंग्रेज़ों को विशेष हानि उठानी पड़ी क्योंकि खाण्डेरी द्वीप, बम्बई की बन्दरगाह से केवल १६ मील की दूरी पर था। वह द्वीप प्रसिद्ध नौ-सेना- नायक कान्होजी आंगरे के आधिपत्य में था। वे समझते थे कि यदि जंजीरा के सिद्दी की मुसलमानी शक्ति से मरहटे-जनरल स्वतन्त्र रहे तो वे अवश्य हमारा शक्ति का नाश कर देंगे और साथ-ही-साथ पश्चिमी किनारे के पूरे शक्तिशाली पुर्तगेज़ी सौदागरों का भी नाश कर देंगे। अपनी शक्ति को शत्रुओं से सुरक्षित रखने के लिये कान्होजी आंगरे को एक बड़ी सेना रखने के लिये बाध्य होना पड़ा, जिस के खर्च की पूर्ति के लिये, अरब सागर के व्यापारियों के जहाज़ों पर “चौथ” लगा दी गई। मरहठों का, हिन्द-महासागर पर आधिपत्य स्थापित करने तथा उन पर चलने वाले विदेशियों के जहाज़ों पर “चौथ” लगाने का अधिकार उचित ही नहीं, बल्कि यथार्थ भी था। लेकिन अंग्रेज़ तथा अन्य विदेशी

[ ५५ ] सौदागरों ने उनके इस अधिकार का पूर्ण विरोध किया। इसके फलस्वरूप कान्हों जी ने विवश होकर उन्हें दण्ड देने के लिये उनके जहाज़ों को, नौकरों तथा सामान-सहित उस समय तक रोके रक्खा जब तक कि वे "चौथ" अदा न करें। सन् १७१५ ईस्वी में चार्ल्स बून जब बम्बई का गवर्नर नियुक्त हो कर आया तो उसने आंगरे के सामुद्रिक किले को विध्वंस कर देने का दृढ़ निश्चय किया। उसे अपनी वीरता पर पूर्ण अभिमान था और वह सर्वदा अपनी वीरता की डींगें मारा करता था। उसने दुर्ग के विजय करने के लिये एक बड़ी सेना का निर्माण किया, और विजय दुर्ग की बन्दरगाह पर आक्रमण कर दिया। अंग्रेज़ क्रोध से लाल हो रहे थे। उन्हों ने अपने जंगी जहाज़ों के नाम क्रमशः "हन्टर" अर्थात् शिकारी, "हॉक" अर्थात् बाज़, "रिवेंज" अर्थात् बदला लेने वाला और "विक्ट्री" अर्थात् विजय रक्खे। इन लोगों का एक संगठित पैदल दल भी था जिस में सहस्रों ही चुने हुए अंग्रेज़ योद्धा थे। यह दल मरठ्ठों के सामुद्रिक किले के नाश करने वाली सेना की सहायता के लिए तैयार किया गया था। इस प्रकार चार्ल्स बून ने अपनी जाति के महान् गौरव को दिखाने के लिये एक शक्तिशाली सेना के साथ मरहठों के सुदृढ़ किले पर एक ओर से धावा कर दिया और शीघ्र ही दूसरी ओर से उपर्युक्त विशेष नामधारी पैदल दल ने स्थल की ओर से धावा बोला। १७ अप्रैल सन् १७१७ ई० को क्रोधित अङ्गरेज़ी सेना ने मरहठों के विजय दुर्ग पर गोलाबारी प्रारम्भ कर दी। लेकिन उनकी लहलहाती आशा लता पर शीघ्र ही तुषार पड़ गया। उन्हें विदित हो गया कि यह किला मोम का बना हुआ नहीं है, जो उन के गोलों की गरमी से शीघ्र ही पिघल जाता, बल्कि यह विशाल किला दृढ़ तथा सब प्रकार से सुरक्षित बनाया गया है, जिस के चारों ओर तोपखाना लगा हुआ है। इस पर भी वीर अङ्गरेज़

[ ५६ ] सैनिकों ने किले की दीवार को पार करने के लिये अनेकों प्रयत्न किये, पर दीवार से लगी हुई तोपों ने उनके सारे प्रयत्नों को निष्फल कर दिया। इस प्रकार अपनी हार होते देखकर गोरे बहादुर अत्यन्त क्रोधित होउठे और जी खोल कर लड़े। पर वाह रे मरहठे बीरो ! तुम ने उनकी सारी आशाओं को धूल में मिला कर उन्हें पीछे हटा दिया । जब अंगरेज़ों के पांव रणक्षेत्र से उखड़ गए, तब मरहठे अपनी सारी शक्तियों को लगा कर अन्धाधुन्ध गोले बरसाने लगे, इस से अङ्गरेज़ सिपाहियों ने जितनी शीघ्रता से किले पर आक्रमण किया था उन से भी अधिक शीघ्रता भागने में दिखाई। दूसरे साल, गवर्नर बून ने पुनः पूरी तैयारी के साथ खाण्डेरी द्वीप पर आक्रमण किया, पर फिर भी उसे मरहठों से पराजित होकर भागना पड़ा। इस प्रकार मरहठों की वीरता ने उन्हें ऐसा नीचा दिखाया कि उनके हृदय में उन का डर बैठ गया, इस पर गवर्नर ने इङ्गलैण्ड के राजा का पत्र द्वारा एक पूर्ण जहाज़ी बेड़ा तैयार करने के लिये विवश किया। बून के कथनानुसार इङ्गलैण्ड के राजा ने प्रसिद्ध सेनापति कोमोडोर मैथ्यू की अध्यक्षता में एक बड़ा भारी जंगी बेड़ा, जिस के साथ चार अन्य जंगी जहाज़ थे, रवाना किया और साथ ही साथ मरहठों पर विजय पाने के लिये पुर्तगीज़ों को भी युद्ध के लिये निमन्त्रित किया। इस सुअवसर को पाकर पुर्तगेज़ भी बड़ी प्रसन्नता के साथ मरहठों के विरुद्ध लड़ाई करने के लिये चल पड़े। सन् १७२१ ईस्वी में मरहठों को इस युरोप की मिश्रित शक्तियों ने सामना करने के लिये उठना पड़ा और वे ऐसी बुद्धिमानी और वीरता

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के साथ लड़े कि युरोपीय शक्तियों को मरहठों के किले की दीवार तक पहुँचना असम्भव हो गया । यह देख सेनापति कोमोडोर मैथ्यू क्रोध से आगबगोला हो गया और अपनी सेना को उत्साहित करता हुआ, स्वयं सब से आगे बढ़ कर किले पर आक्रमण करने के लिये दौड़ा । उसी समय एक मरहठे सिपाही ने दौड़ कर अपनी सङ्गीन उसकी जांघ में घुसेड़ दी, पर वीर कोमोडोर इस आघात से तनिक भी भयभीत न हुआ, वरन उसने बड़ी शीघ्रता से उस सिपाही का पीछा किया और उस पर पिस्तौल के दो फ़ायर किये, लेकिन क्रोध और शीघ्रता में वह पिस्तौल भरना भूल गया था इसी कारण दोनों फ़ायर निरर्थक गये । इस मित्र सेना की भी वही दशा हुई जो उनके सेनापति की हुई थी । जब मित्र सेना जान हथेली पर रख, जी तोड़ कोशिश करके जैसे तैसे किले के पास पहुँच गई, इसी समय मरहठों ने बड़ी बुद्धिमानी और उत्साह से इसका सामना किया और मित्र सेना चीखती हुई भाग निकली । ठीक उसी समय मरहठों की एक दूसरी संगठित रिज़र्व सेना, अचानक ही पीछे से आकर पुर्तगीज़ों की बाहरी सेना पर टूट पड़ी, इससे भयभीत हो सेना अपनी जान लेकर भागने लगी और तत्काल अङ्गरेजी सेना ने भी उनका साथ दिया—अर्थात् दोनों तितर-बितर होकर भाग गई । उनका बहुत-सा लड़ाई का सामान मरहठों के हाथ लगा । विजय का डङ्का बजने लगा और मरहठे इस सफलता से अत्यन्त आनन्दित हुये । उधर मित्र-सेनाओं के हृदय में जो कुछ लड़ाई की इच्छा शेष रह गई थी, उसकी पूर्णाहुति के लिये आपस में दोनों वाग्-युद्ध करने लग गई अर्थात् तात्कालिक लड़ाई की हार तथा भारी हानि का उत्तरदायित्व एक दूसरे के मत्थे मढ़ने लगीं । इस प्रकार द्वन्द्व युद्ध करती हुई अपना- सा मुँह लेकर दोनों ने अपनी अपनी राह ली । पुर्तगीज़ों ने चाऊल का

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रास्ता लिया और अङ्गरेजों ने बम्बई के लिये अपने जहाज तय्यार किये। इस लड़ाई के पश्चात् बहुत दिनों तक अङ्गरेज सौदागर अपने सौदागरी के जहाजों के साथ एक जंगी जहाज भी लेकर आते रहे, क्योंकि उन्हें इस बात का भय रहता था कि कदाचित् मरहठे उन्हें "चौथ" के लिये न पकड़ लें। अन्त में ऐसा ही हो गया अर्थात् कुछ दिनों के बाद अङ्गरेजों के 'विक्टरी' (विजय) और 'रिवेञ्ज' (बदला लेने वाले) नामी जहाजों को मरहठों ने पकड़ कर रोक लिया। सन् १७२४ ईस्वी में डचों को भी जाना पड़ा। उन्होंने पूरी तैयारी के साथ अर्थात् सात जंगी जहाजों, दो बम मारने वाले जहाजों और एक अच्छी सेना लेकर मरहठों के विजय-दुर्ग पर आक्रमण कर दिया। परन्तु इतनी तैयारी करने पर भी मरहठों के साहस तथा वीरता पर किसी प्रकार का धब्बा लगाने में असफल हुये। अब मरहठा जल सेनापति हिन्द-महासागर में स्वच्छन्द घूमने लगे। इस बड़ी भारी सफलता प्राप्त करने के साथ साथ मरहठे कोंकण में मुसलिम सिद्दी से हैदराबाद में निज़ाम से, गुजरात, मालवा और बुन्देलखण्ड में मुग़लों के साथ भी लड़ते रहे। कान्होजी आंगरे का सन् १७२६ ई० में देहान्त हो गया, ठीक उसी समय एक दूसरे ऐतिहासिक व्यक्ति ने राजनैतिक रंग स्थल में प्रवेश किया। उसने शीघ्र ही महाराष्ट्र-मण्डल के नेताओं के हृदयों पर अपनी वीरता की धाक बिठा दी। निस्सन्देह वह एक बड़ा तेजस्वी वीर था। उसने मरहठा जाति को उसके महान् उद्देश्य से किसी प्रकार से भी च्युत नहीं होने दिया। इस महान् व्यक्ति का नाम था ब्रह्मेन्द्र स्वामी। वे शाहूजी, बाजीराव, चिम्माजी, आंगरे आदि अन्य सहस्रों वीरों के गुरू थे। उनका जीवन देशभक्ति की महान् और श्रेष्ठ भावनाओं तथा आदर्शों से प्रोत्साहित था। वे सदा अपनी जाति के सम्मुख सरल रीति से आध्यात्मिक तथा धार्मिक पहलु तथा 'स्वधर्म' और 'स्वराज्य' के महान्

[ ५६ ] उद्देश्य को उपस्थित करने में कभी नहीं चूकते थे। स्वामी जी ने अपने यौवनकाल में घोर तपस्या की थी और कई योग की सिद्धियां भी प्राप्त करली थी। उदाहरणतः वे साल में पूरा एक महीना पृथ्वी के नीचे दब कर समाधि लगाया करते थे। बाजीरावो की तरह उन्होंने भी भारत के सारे तीर्थों का भ्रमण किया था जिसके परिणामस्वरूप वे हिन्दुओं की पराधीनता और राजनैतिक गुलामी को अनुभव करके बड़े दुखी हुये। यद्यपि उनमें देशभक्ति की अग्नि प्रज्वलित थी तो भी उसको प्रचण्डरूप में प्रज्वलित करने के लिये एक और चिनगारी की आवश्यकता थी। जंजीरा के मुसलमान शासकों ने उनकी इस देशभक्ति को प्रचण्ड करने के लिये यह चिनगारी फेंकी। सिद्दी महाराष्ट्र राज्य के कट्टर शत्रु थे। उन्हें पता था कि यदि मरहठे इसी प्रकार प्रतिदिन सशक्त होते गये तो उनका कोंकण पर से अधिकार छिन जायेगा। इसी कारण वे मरहठों के विरुद्ध अग्रेजों, डचों तथा पुर्तगेजों की सहायता किया करतेथे और प्रायः वे मरहठों के प्रदेशों पर आक्रमण भी करते रहते थे। वे इतने पर ही सन्तोष न करते थे किन्तु बड़ी निर्दयता के साथ — जोकि धर्मांध मुसलमानों की एक विशेषता है— सैकड़ों ही बालकों और बालिकाओं को उठा कर ले जाया करते थे और उन्हें ज़बर्दस्ती मुसलमान बना लेते थे। हिन्दुओं के मन्दिरों को मिट्टी में मिला देते थे और इसी प्रकार से हिन्दुओं पर असह्य अत्याचार करते रहते थे। परशुराम का तीर्थ भी इन कट्टर-धर्मियों के हाथों से सुरक्षित न रह सका। यह स्थान स्वामी जी को बड़ा प्रिय था। इस पवित्र भूमि पर स्वामी जी योग और तपस्या किया करते थे। सिद्दी ने इस मन्दिर को गिरा दिया। इसकी सारी सम्पत्ति लूट ली और ब्राह्मणों को अत्यन्त कष्ट दिये। इस क्रूरतापूर्ण घटना ने स्वामी जी के मन में कभी भी न बुझने वाली क्रोधाग्नि प्रज्वलित कर दी। इस प्रकार उनके जीवन से अच्छे-बुरे सबके प्रति समदृष्टि का भाव — जोकि प्रत्येक हिन्दु साधु की सम्पत्ति है और

[ ६० ] जिस पर सब को आरूढ़ रहना होता है—एकदम लुप्त हो गई। परिणामतः उन्होंने अपना सारा जीवन हिन्दुओं की स्वतन्त्रता के युद्ध के उद्देश्य तथा उसकी वृद्धि के लिये अर्पण करने का दृढ़ निश्चय कर लिया। स्वामी जी का इतना अधिक प्रभाव था कि सिद्दी उनको अपना पक्का दुश्मन बनाने का साहस न रखता है अतः उनसे प्रार्थना की कि आप अब भी तीर्थ में रह सकते हैं, आपको अब किसी प्रकार की पीड़ा नहीं पहुँचाई जायगी। परन्तु स्वामी जी ने इसका यों कड़ा उत्तर दिया—"तुमने हिन्दू देवताओं और ब्राह्मणों पर अत्याचार किये हैं। अब वह भी उसी प्रकार से बदला लेकर तुम्हारा नाश करेंगे"। आंगरे ने भी उन्हें सान्त्वना देनी चाही और उन्हें कोंकण में ही रहने के लिये प्रार्थना की—पर उन्होंने उत्तर दिया—'नहीं' मैं उस स्थान का एक जल-बिन्दु भी ग्रहण न करूंगा जिस पर बेईमान मुसलमानों का राज्य है। मैं कोंकण में अवश्य प्रवेश करूंगा— पर उस समय जब कि मेरे पीछे बदला लेने वाली हिन्दुओं की सेना होगी।" ऐसा कह कर स्वामी जी सितारा को चले गये। तब से वे उन अधर्मी शत्रुओं के विरुद्ध—विशेषकर जंजीरा के सिद्दी और गोआ के पुर्तगेज़ों के विरुद्ध—धार्मिक युद्ध के लिये निरन्तर प्रचार करते रहे। उनका पत्र-व्यवहार आज उपलब्ध है जिसे पढ़ कर साधारण पाठक भी अनुमान कर सकता है कि उन्होंने किस प्रकार पूर्ण उत्साह से मरहठों के हिन्दू-धर्म, और कश्मीर से ले कर रामकुमारी तक हिन्दुओं की राजनैतिक स्वतन्त्रता प्राप्त करने के दृढ़ निश्चय का परिशोषण किया था। स्वामी जी के शिष्यों—शाहू जी और बाजीरावों दोनों का ने शीघ्र ही सिद्दी के अत्याचारों का बदला लेने को दृढ़ निश्चय कर लिया। मरहटा प्रतिनिधियों ने षड्यन्त्र करने आरम्भ कर दिये और वे कोंकण में सिद्दी और साथ ही पुर्तगेज़ों के साथ एक बड़ा युद्ध करने के लिये भूमि तैयार करने में जुट गए। दिल्ली से अरकाट तक उन्हें एक साथ ही कई शक्तियों के साथ संघर्ष करना पड़ रहा था इसलिये वे

[ ६१ ] उचित अवसर की प्रतीक्षा और निरीक्षण करने लगे । उसी समय वहां सिद्दियों में आंतरिक युद्ध छिड़ गया । जिसके फलस्वरूप गद्दी के एक दावेदार ने मराठा सेना से सहायता मांगी । मराठा सेनाधिपति ने झट उसका हाथ पकड़ लिया और शाहू जी को लिख भेजा कि मरहटों की कूटनीति सफल हो गई है । इस अभिलषित समाचार को पा कर शाहू जी को रोमहर्ष हो आया और उन्होंने बाजीराव को लिख भेजा । 'इस पत्र को मत पढ़ो, पहले घोड़े पर सवार हो जाओ, फिर इस पत्र को पढ़ना' । सन् १७३३ में युद्ध आरम्भ हो गया । सह्याद्री से उतर कर मराठा सेनाओं ने तला-घोसला के किले को छीन लिया और मुस- लमानों को पराजित करते हुए सिद्दी के प्रदेशों को भी जीत लिया । तत्पश्चात बाजीराव ने रायगढ़ के किले में आक्रमण करके पुनः उसे अपने आधीन कर लिया । इसी प्रसिद्ध किले पर शिवाजी का सिंहासन था । यहीं पर उनका राज्यतिलक हुआ था । स्वतन्त्रता का युद्ध आरंभ होने के समय से इस पर मुसलमानों का अधिकार रहा था । जब महा- राष्ट्रियों ने अपने राजा की राजधानी के पुनर्लाभ का समाचार सुना तो वे प्रसन्नता से फूले न समाये । इसके साथ साथ मराठों ने समुद्र में भी बहुत सी सफलताएं प्राप्त कीं । मानाजी आंगरे ने सिद्दी के जंगी बेड़े को जंजीरा के समीप बुरी तरह से हरा कर भगा दिया । इस घटना से अंग्रेज भी घबरा उठे और उन्होंने पहले तो सिद्दी को गुप्त रूप से हथियारों और गोला बारूद से सहायता देनी आरम्भ की फिर खुल्लमखुल्ला सहायता देनी आरम्भ कर दी, तथा मरहटों के साथ लड़ने के लिये कप्तान हाल्डेन के नेतृत्व में एक सेना भेजी । परन्तु खांडोजी नरहर, खारडे, मोरे, मोहिते तथा माथुरबाई जैसी देवियों ने उनके विरुद्ध युद्ध आरम्भ कर दिया । अन्ततः सन् १७३६ में चिम्मा जी अप्पा ने रणस्थल में प्रवेश

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किया और रेवास के समीप एवेसीनियों की सेना पर शानदार विजय प्राप्त की और उनके नेता का, जो कि कोंकण के हिन्दुओं का पक्का वैरी था और जिसने परशु राम के मन्दिर को मिट्टी में मिला दिया था, वध किया गया। इस प्रकार उसे अपने अपराधों का दण्ड अपना जीवन देकर पूरा करना पड़ा। उसी दिन उसके साथ ही उन्देरी का मुस्लिम सेनापति और ११००० सैनिक भी लड़ते हुए मारे गए। सारे कोंकण निवासियों तथा महाराष्ट्रीयों ने अपने वीर विजेता को, जिसने कि हिन्दू धर्म के दुश्मनों से बदला लेकर उनको नष्ट भ्रष्ट कर दिया था और हिन्दू जाति के मान की रक्षा की थी, हार्दिक आशी- र्वाद दी। स्वयं राजा भी बहुत प्रसन्न हुआ और उसने उसे लिख भेजा—"सत-सिद्दी रावण के समान ही एक भयंकर राक्षस था। उस का वध करके तुमने सिद्दियों को समूल नष्ट कर दिया है। आप की सब जगह ख्याति हुई है।" शाहू जी ने उस नवयुवक सेनापति को अपने दरबार में बुला कर उसका बहुमूल्य उपहारों तथा वस्त्रों से सम्मान किया। और ब्रह्मेन्द्र स्वामी, जो कि इस मरहटों के युद्ध के मुख्य प्रोत्साहक थे, जिन्होंने मरहटों को कभी हतोत्साहित नहीं होने दिया था, और जो जब कभी वे परस्पर की कलह अथवा स्पर्धा के कारण अपने कर्तव्य से ढील दिखलाने लगते तभी वे उन्हें हिन्दुओं की स्व- तन्त्रता के युद्ध के आध्यात्मिक तथा धार्मिक पहलू पर जोर देकर, उन्हें अपने देश और धर्म के प्रति कर्तव्य का स्मरण कराते रहते थे—उनको अपनी भावनाओं के अनुसार परमात्मा अथवा अपने प्रिय शिष्य का धन्यवाद करने के लिये कोई उपयुक्त शब्द ही नहीं मिलते थे। इस प्रकार अन्ततः स्वामी जी ने परशुराम के पवित्र स्थान को स्वतन्त्र कराने तथा धर्म की रक्षा करने में सफलता प्राप्त कर ही ली। शामलांची क्षिति केलो, कोकणांत धर्म राखिला। ॐ

[ ६३ ] इस प्रकार सिद्दी को परास्त किया गया और वह हिन्दू के अधीन एक छोटी सी रियासत के रूप में दिन काटने लगा। पुर्तगेजों को मरहठों के साथ अकेले ही लड़ना पड़ा। जब से न०। की शक्ति का विकास हुआ था तब से उनको भारत में विजयों और खम्बयात से लेकर लंका तक सारे पश्चिमी भाग छाये हुए प्रभाव का धीरे २ ह्रास हो रहा था। उनके द्वारा धर्म किये हुए उनके अत्याचार मुसलमानों की अपेक्षा किसी तरह से भी कम भयंकर न थे। पुर्तगेजी कोंकण के पीड़ित हिन्दुओं ने जब देखा कि सिद्दियों के अधीन रहने वाले कोंकण निवासियों ने अपनी दासता की जंजीरें काट दी हैं तो उन्होंने भी मरहठा सेना से सहायता पाने की आशा प्रकट की। वहां के सारे हिन्दुओं में देश भक्ति की लहर दौड़ गई, और उन्होंने विधर्मियों के हिन्दुत्व को नष्ट कर देने के पागलपन का मुक़ाबला बड़ी दृढ़ता से करना आरम्भ कर दिया। जब मराठी सेना उनकी सीमा पर पहुँच गई तो पुर्तगेज भय के कारण पागल से हो गए और उन्होंने हिन्दुओं के आन्दोलन को दबाने के लिए घोर अत्याचार करने आरम्भ कर दिये। पुराने लिखित प्रमाणों से पता लगता है कि उन्होंने बड़ी अधिक मात्रा में हिन्दू ज़मींदारों की सम्पत्तियां जब्त कर लीं। सारे ग्रामों को घेर कर उन्हें तलवार के जोर से ईसाई बना लिया। वे हिन्दू बच्चों को उठा कर ले गये। जिन व्यक्तियों ने अपने धर्म को न छोड़ा उन्हें या तो पकड़ कर क़त्ल कर दिया या उन्हें दास बना लिया। ब्राह्मण विशेष कर उनके रोष के शिकार हुए। उन्हें घरों में ही क़ैद कर दिया गया। सारी हिन्दू जाति को अपने उत्सव मनाने की भी मनाही कर दी गई। यदि कोई हिन्दू अपने उत्सव मनाने का साहस भी करता तो उसका घर घेर लिया जाता था। और उसके घर से सारे प्राणियों को धार्मिक न्यायालयों के सम्मुख पेश किया जाता। वहां उन्हें या तो ज़बरदस्ती से ईसाई बना लिया जाता था या उन्हें दास बना कर बेच दिया जाता था अथवा

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उनका वध कर दिया जाता था। परन्तु इन निर्दयतापूर्ण यातनाओं के सम्मुख भी हिन्दू-नेता पुर्तगेज़ी शाशन की इन राक्षसी आज्ञाओं का अवरोध करने पर ज़ोर देते रहे। सहस्रों व्यक्ति पुर्तगेज़ियों के रोष का शिकार बने। अंत में हिन्दू-जनता के नेताओं—बासी ( वसीन ) और दूसरे प्रदेशों के देश मुखों और डसाइयों ने बाजीराव और शाहूजी जी के साथ गुप्त रूप से पत्र-व्यवहार करना आरम्भ कर दिया। उन्हों ने उन लोगों को अपनी स्वतन्त्रता तथा हिन्दू धर्म और देश की मान रक्षा के लिये पुर्तगेज़ों पर आक्रमण करने पर वाधित किया। वीर, साहसी, सर्व प्रिय और हिन्दुओं के हिन्दू—मलाद के सरदेसाई अंताजी रघुनाथ ने पुर्तगेज़ी आज्ञा का खुले रूप से उल्लंघन किया। और साथ ही उसने अपनी जागीर के लोगों को भी इस आज्ञा को भंग करने के लिये प्रोत्साहित किया। उसने अपने धार्मिक त्योहारों को खूब मनाया। परिणाम स्वरूप वह पुर्तगेज़ियों के अत्याचारों का शिकार बन गया। उसे बंदी बनाया गया और गोआ के धार्मिक न्यायालय के कठोर परीक्षण के लिये भेजा गया। हिन्दुओं का सौभाग्य समझिये कि वह किसी प्रकार वहां से भाग निकला और सकुशल पूना पहुँच गया। उसने एक गुप्त आयोजना की व्यवस्था की। उसने बाजीराव से प्रतिज्ञा की जब मरहठी सेना पुर्तगेज़ी प्रदेश में प्रवेश करेगा तब वे उनकी सब प्रकार से सहायता करेंगे और उनका हर प्रकार से पथ-प्रदर्शन करेंगे। साथ ही उसने बाजीराव को विश्वास दिलाया कि पुर्तगेज़ी कोंकण के सब हिन्दू आप को अवतार समझते हैं। उनका यह पूर्ण विश्वास है कि आप का जन्म हिन्दुओं के अधर्मी बैरियों को दण्ड देने के लिए ही हुआ है। सारी प्रजा बड़ी उत्सुकता के साथ, दैवी मुक्तिदाता के रूप में आपकी प्रतीक्षा कर रही है। यद्यपि मरहठे उस समय उत्तर में कई लड़ाइयां लड़ रहे थे और उन्हें सारे भारत में युद्ध करने के कारण बहुत खर्च करना पड़ रहा था तो भी बाजीराव ने कोंकण निवासी अपने सहधर्मियों और देशवासियों

[६५]

की करुणापूर्ण पुकार को अनसुना नहीं किया। बड़ी तीव्र गति, नीति तथा परिश्रम से बाजीराव्रो ने देवी पार्वती के उपलक्ष्त मे एक बड़े तथा अपूर्व महोत्सव के बहाने पूना में एक बड़ी भारी सेना एकत्रित कर ली। सबको काम सम्हाल कर भविष्य में होने वाले युद्ध की बहिरेषा तैयार की गई। चिम्णाजी अप्पा को सेनापति बनाया गया। रामचन्द्र जोशी, अताजी और रामचन्द्र रघुनाथ तथा अन्य सरदारों और नायकों को भिन्न २ मोर्चों पर भेजा गया। सन् १७३७ में मरहठी सेनाओं ने पुर्तगेज़ों के 'थाना' के किले पर आक्रमण कर दिया, पुर्तगेज़ों ने अंत समय तक मुकाबला किया पर अन्त में उन्हें किला मरहठों के हवाले करना ही पड़ा। इस विजय की प्रसन्नता मे उन्होंने सलसट्टी पर भी धावा बोल दिया। शंकरजी केशव ने अरनाला के क़िले पर अधिकार जमा लिया और जोशी ने धारवी और पारसिक पर विजय प्राप्त कर ली। गोआ के वायसराय को इन आपत्तियों के कारण बड़ा दुःख पहुँचा। परिणामतः उसने एक बड़े शूरवीर योद्धा एटानियां को इस युद्ध को जारी रखने के लिये भेजा। योरूप से और भी फौज मंगवा भेजी। इस प्रकार सेनाओं को एकत्रित करके ऐटोनियो ने एक बड़ा भीषण आक्रमण किया। पैडरोमेलो की अध्यक्षता में ४५०० सिपाहियों ने थाना के किले को दोबारा अपने अधीन करने के लिए आक्रमण कर दिया। उधर 'थाना' का किला मल्हारराव के अधीन था। यह भी कोई कम वीर सिपाही न था। बड़ी घमसान लड़ाई हुई क्योंकि दोनों पक्ष एक समान थे, परन्तु मरहठों के तोपखाने ने उनकी शक्ति को क्षीण कर दिया। यह देख कर वीर पेडरोमेलो ने और सेनाओं को संगठित करना आरम्भ किया पर एक गोले से उसका काम तमाम हो गया। उसकी मृत्यु होते ही पुर्तगेजी सेना जहाज़ों में बैठ कर दौड़ भागी। एक घोर युद्ध के पश्चात मरहठों ने 'माहिम' पर भी अधिकार कर लिया। उधर वेनकटराव घोरपाडे बढ़ता २ गोआ के समीप 'राखोल' तक पहुंच गया। अब ऐसे प्रतीत होने लग पड़ा था कि पुर्तगेज़ियों की

शक्ति पूर्णतया नष्ट हो जायगी। उसी समय नादिरशाह के आक्रमण का समाचार पहुँचा। यह भारत के लिए सबसे बड़ा भारी खतरा था। मरहठे ही हिन्दुओं की एकमात्र शक्ति थी जो उसका मुकाबला कर सकती थी। अतः अब उनके सामने यह एक और आपत्ति आ पड़ी। इस आक्रमण ने पुर्तगेज़ों के जीवन की अवधि कुछ और बढ़ा दी। बाजीराओ इस परिस्थिति को ताड़ गए और उन्होंने लिख भेजा—"पुर्तगेज़ों के साथ युद्ध तो शून्य के समान ही है। भारत में अब हमारा एक ही दुश्मन है। इसलिए सारे भारत को संगठित हो जाना चाहिये। मैं अपनी मरहठा सेना को नर्मदा से लेकर चम्बल तक फैला दूंगा और फिर देखूँगा कि किस तरह नादिरशाह दक्षिण की ओर बढ़ने का साहस करता है।" अतः उसने दिल्ली, जयपुर और अन्य उत्तरी राज्यों के दर्बारों में स्थित मरहठा प्रतिनिधियों को आज्ञा दी कि आप लोग केवल मरहठों का ही नहीं अपितु राजपूतों, बुंदेलों और मरहठों सब का एक सम्मिलित संगठन करो। आजकल उस समय के मरहठा नीतिज्ञ का एक छपा हुआ पत्र मिलता है जिसे पढ़कर यह पता लगता है कि किस प्रकार हिन्दुओं ने मुगल सम्राट् को गद्दी से उतार कर उसके स्थान पर उदय- पुर के महाराणा को भारत के शासन पर बिठा देने की आयोजना की थी। मराठा नेता, बाजीराओ का उत्सुक हृदय हिन्दुओं की विस्तृत विजयों की विस्तृत आयोजनाएं कर रहा था। उसके पास इतने द्रव्य-साधन थे कि वह जहां एक ओर वसीन को घेरने और पुर्तगेज़ों के साथ लड़ने के लिए फौज भेज सकता था वहां दूसरी ओर उसके पास नादिरशाह को मार भगाने के लिए भी असंख्य सेना थी। अतः पुर्तगेज़ों को शीघ्र ही पता लग गया कि नादिर शाह के आक्रमण के कारण भी उनके घेरे में कोई दुर्बलता नहीं आ सकी।

[ ६७ ] गोआ के वायसराय को एक के बाद दूसरे पुर्तगेज़ो-किलों के छिन जाने के समाचार पहुँचने लगे। सिरिगाओं, तारापुर, तथा दहानु के किलों को मरहठों ने अल्प समय में ही अपने अधीन कर लिया और उनकी सेनाओं को यमपुरी पहुँचा दिया । आक्रमणकारियों तथा अभिरक्षकों की धीरतापूर्ण कथा यह सुप्रसिद्ध है । उसे इस छोटी सी पुस्तक में विस्तारपूर्वक वर्णन करने की कोई आवश्यकता दिखाई नहीं देती। मरहठे इस सारे ही युद्ध काल में बड़ी भयंकरता से लड़ते रहे। उसका वर्णन हम एक प्रत्यक्ष साक्षी के मुख से कराते हैं। उसका कथन है—"यहां तक कि बड़े २ अधिकारी भी इस युद्ध में अपने स्थानों पर खड़े होकर लड़ने लग पड़े। अपने प्यारे नेता बाजीराव की धिक्कारों से बचने के लिये वे अपनी जानें हथेली में लेकर रण क्षेत्र में कूद पड़े। उधर पुर्त- गेज़ों की ओर भी एक सेनापति के पीछे दूसरा सेनापति हाथ में तलवार लेकर युद्ध अग्नि में कूदने से न झिझकता था। मरहठे आक्रमण करते पर बड़ी हानि उठाकर उन्हें पीछे हटना पड़ता। वे बार २ हमले करते पर हर समय पीछे धकेल दिये जाते। दोनों ओर का भयंकर नुकसान होने लगा। कई बार तो मरहठों की अपनी सुरंगें ही फट जातीं जिसके कारण उनके सहस्रों सिपाही मारे जाते। पर बदला लेने वाली उस दृढ़-प्रतिज्ञ मरहठा सेना ने हार नहीं मानीं। उन्होंने १८ बार आक्रमण किया। पुर्तगेज़ों ने भी १८ बार ही उन्हें पीछे धकेल दिया। पर हर बार मरहठों का उत्साह बढ़ता ही गया, घटा नहीं। इस प्रकार घेरा पड़ा ही रहा। नादिर शाह आया भी और वापिस भी चला गया पर वह घेरा यों का त्यों ही पड़ा रहा। बसीन पर फिर भी अधिकार न किया जा सका। अंत में चिम्मा जीअप्पा निराश हो गया और क्रुद्ध होकर अपने योद्धाओं को गर्ज कर कहने लगा—"देखो ! मैं अवश्य बसीन के किले में प्रवेश करूंगा। यदि आप मुझे आज जीवित अवस्था में वहां नहीं ले जा सकते तो कल तुम मेरे सिर को अपनी तोपों द्वारा उस किले की दीवार तक फेंक देना ताकि मैं अपने मृत्यु

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के पश्चात् तो किले में प्रविष्ट हो जाऊँ।” ऐसी अदम्य वीरता भरे शब्दों ने उन योद्धाओं में जोश भर दिया। वे सिर धड़ की बाज़ी लगा कर रणक्षेत्र में कूद पड़े। मानाजी आंगरे, मल्हगराओ होलकर, राणोजी शिंदेगाव एक दूसरे से पहले किले की दीवारों तक पहुँचने की कोशिश करने लगे। इस समय एक और खंदक भक से उड़ गई। मरहठे अदम्य साहस के साथ आगे बढ़े और खण्डहरों में जाकर डट गए। पूर्तगेज़ों की अपूर्व वीरता उन्हें अपने मोर्चों से पीछे न हटा सकी। पुर्तगेज़ अब अधिक समय तक मरहठों के सामने न ठहर सके और उन्होंने हथियार डाल दिये। मरहठों का गेरुवा झंडा हिन्दू धर्म और हिन्दू जाति के उत्पीड़िकों के ऊपर फहराने लगा। उसे बसीन के ऊपर गाड़ दिया गया। आकाश हिन्दू-धर्म के जयकारों से गूंज उठा।” अब सारा ही कोंकण प्रदेश स्वतंत्र हो चुका था। इस के पश्चात् कभी पुर्तगेज़ सिर न उठा सके। परन्तु वे गोवा में उपद्रव खड़े करते रहे। उनका वहां भी नाश कर दिया जाता पर मरहठों को इससे और अधिक महत्वपूर्ण कार्य करने थे इसलिए उन्होंने इस ओर विशेष ध्यान नहीं दिया। मरहठों ने समुद्र तथा पृथ्वी द्वारा आक्रमण कर के पुर्तगेज़ों की शक्ति को, जो कभी एशिया के समुद्रों में गुडहोप अंतरीप से लेकर पीले-समुद्र तक अकंटक राज्य भोगती थी—नष्ट भ्रष्ट कर दिया। इसके पश्चात् उन्हें कभी हिन्दुओं के विरुद्ध हाथ उठाने का साहस नहीं हुआ। अब अनुमान कीजिये कि उन हिन्दुओं के मन में कितनी प्रस- न्नता भर गई होगी। इन विदेशियों से छुटकारा पाकर उन्होंने कितनी शान्ति का अनुभव किया होगा। जो कभी विदेशियों द्वारा शासित किये जाते थे, जिनका यह दृढ़ विश्वास हो गया था कि वे सदा शासित किये जाने के लिए ही उत्पन्न हुए हैं अब जब कि उन महाराष्ट्र वीरों ने उनके दुश्मनों को मार २ कर भगा दिया तो वे राष्ट्रीय गौरव और विजय गर्व से फूले न समाते थे। कई शताब्दियों से पुर्तगेजी-

[ ६६ ] कोंकण के हिन्दुओं ने हिन्दू ध्वजा को वहां फहराते नहीं देखा था, अब उन्होंने विदेशियों की खोपड़ी को तोड़ दिया और अपनी जाति तथा धर्म के प्रति किये गये अत्याचारों का जी भर कर बदला लिया। ब्रह्मेंद्र स्वामी के संवाददाता ने इस विजय के समाचार को इन शब्दों में लिख कर भेजा—"यह वीरता, शक्ति, और विजय—ये सारे कार्य उस प्राचीन समय के दिखाई पड़ते हैं जब कि देवता भारत में अवतीर्ण हुआ करते थे। वे लोग वास्तव में धन्य हैं जो इस विजय के दिनों को देखने के लिए जीवित बच रहे हैं, और इन व्यक्तियों से भी वे लोग अधिक भाग्यशाली हैं जो इस विजय को संभव बनाने के लिए अपने प्राणों की आहुतियां दे चुके हैं।" १० नादिरशाह और बाजीराव बघूं नादिरशाह कसा पुढे येतो तो ! ॐ —बाजीराव । जिस प्रकार मरहठों की सेना कोंकण में शानदार सफलताएं प्राप्त कर रही थी, वैसे ही अन्य स्थानों में भी वह बड़ी शान से फैल रही थी। बाजीराव ने मालवा, गुजरात और बुन्देलखण्ड़ को विजय कर के हिन्दू- राज्य की सीमा चम्बल तक पहुंचा दी। किन्तु इतने पर ही वह सदा के लिये सन्तुष्ट न हो गया था, क्योंकि उसे तो एक महान् हिन्दू-राज्य स्था- पित करना था, जिसके अन्दर सारा भारतवर्ष सम्मिलित हो सके और हिन्दुओं के सारे तीर्थ स्वतन्त्र हो जांय; ताकि वे हिन्दू-धर्म के शत्रुओं और नास्तिकों के स्पर्श से अपवित्र न हों। इसलिये उसका यह कर्त्तव्य कोंकण से परशुराम के पवित्र मंदिर के स्वतन्त्र करने तक ही सीमित न रहा, क्योंकि काशी, गया, मथुरा अब भी इन विधर्मियों के शासन से

  • देखें नादिरशाह कैसे आगे बढ़ता है !

पीड़ित थे। इस प्रकार हमें बाजीराव और दूसरे मरहठे सरदार उन पवित्र स्थानों को, पुरन्धर और नासिक की भांति, स्वतंत्र कराने के लिए अविश्रान्त प्रयत्न करते हुए दिखाई पड़ते हैं। कोंकण में जल और स्थल की लड़ाई लड़ते हुए मरहटों को किसी भयंकर आपत्ति की सम्भावना भयभीत नहीं कर सकी थी। अतएव बाजीराव ने मुगल-सम्राट् को धमकी दी कि यदि मुझे अन्य मांगों के साथ-ही-साथ काशी, गया, मथुरा और अन्य पुण्यक्षेत्र न मिले, तो मैं दिल्ली पर चढ़ाई कर दूंगा। इस भय ने दिल्ली के यवन नेताओं को अपनी सारी शक्तियां एकत्रित करने पर विवश कर दिया, और बाईस सेनाध्यक्ष इन हिन्दू-वीरों का सामना करने को भेजे गये। परन्तु जब किसी प्रकार भी वे मरहटों पर सफ- लता प्राप्त न कर सके तो अपने आप को रिझाने के लिये उन्होंने एक बनावटी विजय-समाचार बढ़ाचढ़ा कर मुगल-बादशाह को लिख भेजा कि बाजीराव एक महान युद्ध में-जिसका कि वास्तव में कोई अस्तित्व ही नहीं था—पूर्णतया नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया है और मरहठे ऐसी बुरी तरह खदेड़े गए हैं कि अब वे उत्तर भारत में कभी न दीख पड़ेंगे। इस समाचार को सुन कर मुगल-बादशाह खुशी से फूला न समाया। और उस ने असभ्यता के साथ मरहठा-राजदूत को दिल्ली से निकलवा दिया। साथ ही इस बड़ी विजय के उपलक्ष में शानदार उत्सव मनाने की आज्ञा दी। दिल्ली के इन बनावटी कृत्यों का समाचार पाते ही बाजीराव ने एक विकट हंसी हंसी। उसने अपने मनमें कहा "अच्छा मैं अपनी सेना को दिल्ली के किले की दीवार तक ले जाऊंगा और मुगल-सम्राट् को उसकी राजधानी के शोलों के शोकयुक्त प्रकाश में अपनी शक्ति का परिचय दूंगा।" उसने अपना प्रण पूरा किया। संताजी यादव, तुकोजी होल्कर और शिवाजी तथा यशवन्तराव पवार को साथ लेकर उसने शीघ्र ही दिल्ली के फाटक को जा खटखटाया। मुगल-बादशाह अपनी शाही फौज से एक के बाद एक सेना भेजने लगा, लेकिन प्रत्येक को पराजित

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होना पड़ा। अब तो उसे अपनी जान की पड़ गई और बनावटी स्वप्न देखने की मूर्खता का फल भोगना पड़ा। यह पहला ही मौका था जब मराठा-शक्ति ने मुअम्मुल्ला दिल्ली के दरवाजे पर धक्का देकर उसे हिला दिया। निज़ाम को मरहठों की उत्तर भारत की यह 'बेशाल उन्नति असह्य हो गई, अतः वह ३४००० सिपाही और उस काल के सर्वोत्तम भारतीय तोपखाने के साथ सिरोंज के लिये रवाना हुआ। राजपूतों ने भी मरहठों के विरुद्ध निज़ाम के साथ मिलजाना उचित समझा। परन्तु शीघ्र ही बाजीराव उन्हें रौंदता हुआ आ पहुंचा और मरहठा सेनापति की प्रवीणता, युद्ध-कुशलता और वीरता ने निज़ाम को फौरन अनुभव करा दिया कि वह पुनः एक बार मरहठों का शिकार बन गया है। मरहठों की लगातार चढ़ाई और पीछा करने से विवश होकर उसने भूपाल के क़िले में छिप कर अपनी जान बचाई और वहीं से अपनी तितर-बितर हुई सेना को एकत्रित करके फिर आक्रमण करने का प्रयत्न करने लगा। लेकिन मरहठी सेना मुसलमानी और राजपूती फ़ौज़ों की अपेक्षा अधिक सुसज्जित थी। उन्होंने निज़ामी सेना को घेर लिया और वह भूखों मरने लगी। नामी-गरामी मुसलमान जनरल से कुछ करते न बन पड़ा। आखिरकार बाजीराव की शर्तों के अनुसार उसे सन्धि करनी ही पड़ी। ठीक इसी समय मुसलमानों का एक दूसरा षडयन्त्र फलीभूत हुआ। नादिरशाह. सिंधु-नदी पार करके आ पहुंचा। इससे मुसलमानों के हृदय में अपने मरते हुए बादशाह को फिर से ज़िन्दा करने की आशा बलवती हो गई। औरङ्गज़ेब की परम्परा में पले और शिक्षित हुए निज़ाम तथा अन्य मुसलमान सरदारों ने नादिरशाह के साथ इस आशा पर भाई-चारे का नाता जोड़ लिया कि कम-से-कम वह उस कार्य को पूरा करेगा जिसे भीरु मुगल न कर सके थे, और महाराष्ट्र-मण्डल के हिन्दुओं की बढ़ती हुई शक्ति को नष्ट करके मुसलमानी साम्राज्य को एक बार फिर पूर्ण गौरव और शक्ति की चोटी पर पहुंचा देगा। यदि

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बाजीराव हिन्दू-सेना लेकर इस भयानक विदेशी को रोकने के लिये निर्भयतापूर्वक कटिबद्ध न हुआ होता, तो ऐसा होने में कुछ सन्देह भी न था। दबने या भयभीत होने के स्थान पर बाजीराव की कल्पना शक्ति जाति के इस बड़े संकटपूर्ण समय पर और भी ऊंची उड़ने लगी। नादिरशाह के आने पर उसे एक बहुत उत्तम अवसर दिखाई देने लगा। वह सोचने लगा कि जो हिन्दू-इतिहास सौ वर्ष में पूरा होता, वह अब केवल एक वर्ष में ही संपूर्ण जायगा। उसके योग्य राजदूत उत्तर भारत के भिन्न भिन्न राजदरबारों में बड़ी चतुरता और उत्साह के साथ कार्य कर रहे थे और सेनापति रणक्षेत्रों में ख्याति प्राप्त कर रहे थे। जिस प्रकार पोवार, शिण्डे, गूजर, ऐङ्गरे और दूसरे मरहठों-जनरलों ने युद्धविद्या में नाम और सफलता प्राप्त की थी, वैसे ही व्यांकोजी राव, विश्वासराव, दादा जी, गोविन्दनारायण, सदाशिव, बालाजी, बाबूराव, मल्हार और महादेव भट्ट हिजने राजनैतिक विषयों के पण्डित समझे जाते थे और उन लोगों ने उतनी ही सफलता भी प्रप्त की थी। वास्तव में इन महाराष्ट्र-राजनीति विशारद पुरुषों ने ही इस हिन्दू- आन्दोलन के उच्च आदर्श और राजनीतिक सिद्धान्त को उचित रीति से स्थिर रक्खा। वे बड़ी योग्यता से ऐसी परिस्थिति उत्पन्न करते रहे जिस से मरहटे सैनिक सफलतापूर्वक कार्य करने में अग्रसर रहें। इन राज- नीतिज्ञ पुरुषों के पत्र-व्यवहार अब छपे हुए मिलते हैं, जिन्हें पढ़कर पाठक मरहटा राजनीतिज्ञों, कूटनीतिज्ञों, योद्धाओं तथा मल्लाहों की आयो- जनाओं, आशाओं और आश्चर्यजनक प्रयत्नों के महत्व से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। उनके ये प्रयत्न केवल एक, और एक ही आशा तथा उद्देश्य लिये थे वह यह कि एक ऐसा दृढ़ हिन्दू-राज्य स्थापित हो, जो हिन्दू-जाति की राजनैतिक स्वतन्त्रता का रक्षक और पोषक हो। मरहठों की इसी आयोजना को नष्ट करने के लिये, औरङ्गजेबी शिक्षा प्राप्त मुसलमान-राजनीतिज्ञों ने नादिरशाह को बुलाया, क्योंकि वे मरहठों

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के उत्कर्प˙ को नहीं देख सकते थे। वे प्रत्यक्ष तथा गुप्त दोनों रीतियों से उसे सहायता भी देते रहे जिससे वह मरहठों के कुचलने में समर्थ हो सकें। लेकिन नादिरशाह को फौरन ही मालूम हो गया कि उसे मई सन् १७३६ ई० मे ऐसी हिन्दू-शक्ति का सामना करना है, जो इससे बिलकुल ही भिन्न है, जिसका सामना सन् ११२०—११२४ के बीच मुहम्मद गजनवी को करना पड़ा था। कूटनीति, राजनीति, देशभक्ति, उत्साह, सैनिक और संगठन शक्ति के साथ-साथ मरहठों में आत्म- बलिदान का सर्वोच्च भाव भी मौजूद था। पर आत्म-बलिदान तथा इसी प्रकार की अन्य चतुराईयां केवल उस अवस्था में ही की जाती थीं जब उन्हें यह विश्वास हो जाता था कि ऐसे बलिदान से मरहठों की अपेक्षा शत्रुओं को ही अधिक हानि होगी। महाराष्ट्र के हिन्दू जब से अपनी मातृ-भूमि, अपने धर्म और जाति के नाम पर उठे थे तब से हर प्रकार से मुसलमानों से श्रेष्ठ सिद्ध हुए थे। उनका दृढ़ विश्वास था कि इन लड़ाइयों से हम भगवान् राम और कृष्ण की इच्छाओं को पूर्ण कर रहे हैं। वे नादिरशाह से नहीं डरते थे। मरहठा राजदूतों और कूटनीतिज्ञों ने बाजीराव को बड़े जोरदार शब्दों में लिखा— “नादिरशाह कोई ईश्वर नहीं है। वह सारी सृष्टि का नाश नहीं कर सकता। वह किसी को अपने से अधिक शक्ति-शाली जान लेने पर अवश्य सन्धि कर लेगा; बल की परीक्षा हो जाने पर ही मित्रता की बात आरम्भ हो सकती है। शान्ति सर्वदा युद्ध के पश्चात् ही होती है। इसलिये मरहठा-सेना को आगे बढ़ने दो। यदि केवल राजपूत और दूसरे हिन्दू आप (बाजीराव) के नेतृत्व में साहस के साथ सामना करें तो बड़े २ कार्य सम्पादन हो सकते हैं। निजाम की सहायता पा लेने पर नादिरशाह लौट जाने वाला पुरुष नहीं है, बल्कि वह सीधे हिन्दू राज्यों पर चढ़ाई कर देगा। सारे हिन्दू राजों महाराजों तथा सवाई जयसिंह बड़ी उत्सुकता से आप (बाजी-