हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पृष्ठ 71, कुल 254 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ७१ ]
होना पड़ा। अब तो उसे अपनी जान की पड़ गई और बनावटी स्वप्न देखने की मूर्खता का फल भोगना पड़ा। यह पहला ही मौका था जब मराठा-शक्ति ने मुअम्मुल्ला दिल्ली के दरवाजे पर धक्का देकर उसे हिला दिया। निज़ाम को मरहठों की उत्तर भारत की यह 'बेशाल उन्नति असह्य हो गई, अतः वह ३४००० सिपाही और उस काल के सर्वोत्तम भारतीय तोपखाने के साथ सिरोंज के लिये रवाना हुआ। राजपूतों ने भी मरहठों के विरुद्ध निज़ाम के साथ मिलजाना उचित समझा। परन्तु शीघ्र ही बाजीराव उन्हें रौंदता हुआ आ पहुंचा और मरहठा सेनापति की प्रवीणता, युद्ध-कुशलता और वीरता ने निज़ाम को फौरन अनुभव करा दिया कि वह पुनः एक बार मरहठों का शिकार बन गया है। मरहठों की लगातार चढ़ाई और पीछा करने से विवश होकर उसने भूपाल के क़िले में छिप कर अपनी जान बचाई और वहीं से अपनी तितर-बितर हुई सेना को एकत्रित करके फिर आक्रमण करने का प्रयत्न करने लगा। लेकिन मरहठी सेना मुसलमानी और राजपूती फ़ौज़ों की अपेक्षा अधिक सुसज्जित थी। उन्होंने निज़ामी सेना को घेर लिया और वह भूखों मरने लगी। नामी-गरामी मुसलमान जनरल से कुछ करते न बन पड़ा। आखिरकार बाजीराव की शर्तों के अनुसार उसे सन्धि करनी ही पड़ी। ठीक इसी समय मुसलमानों का एक दूसरा षडयन्त्र फलीभूत हुआ। नादिरशाह. सिंधु-नदी पार करके आ पहुंचा। इससे मुसलमानों के हृदय में अपने मरते हुए बादशाह को फिर से ज़िन्दा करने की आशा बलवती हो गई। औरङ्गज़ेब की परम्परा में पले और शिक्षित हुए निज़ाम तथा अन्य मुसलमान सरदारों ने नादिरशाह के साथ इस आशा पर भाई-चारे का नाता जोड़ लिया कि कम-से-कम वह उस कार्य को पूरा करेगा जिसे भीरु मुगल न कर सके थे, और महाराष्ट्र-मण्डल के हिन्दुओं की बढ़ती हुई शक्ति को नष्ट करके मुसलमानी साम्राज्य को एक बार फिर पूर्ण गौरव और शक्ति की चोटी पर पहुंचा देगा। यदि