हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपीड़ित थे। इस प्रकार हमें बाजीराव और दूसरे मरहठे सरदार उन पवित्र स्थानों को, पुरन्धर और नासिक की भांति, स्वतंत्र कराने के लिए अविश्रान्त प्रयत्न करते हुए दिखाई पड़ते हैं। कोंकण में जल और स्थल की लड़ाई लड़ते हुए मरहटों को किसी भयंकर आपत्ति की सम्भावना भयभीत नहीं कर सकी थी। अतएव बाजीराव ने मुगल-सम्राट् को धमकी दी कि यदि मुझे अन्य मांगों के साथ-ही-साथ काशी, गया, मथुरा और अन्य पुण्यक्षेत्र न मिले, तो मैं दिल्ली पर चढ़ाई कर दूंगा। इस भय ने दिल्ली के यवन नेताओं को अपनी सारी शक्तियां एकत्रित करने पर विवश कर दिया, और बाईस सेनाध्यक्ष इन हिन्दू-वीरों का सामना करने को भेजे गये। परन्तु जब किसी प्रकार भी वे मरहटों पर सफ- लता प्राप्त न कर सके तो अपने आप को रिझाने के लिये उन्होंने एक बनावटी विजय-समाचार बढ़ाचढ़ा कर मुगल-बादशाह को लिख भेजा कि बाजीराव एक महान युद्ध में-जिसका कि वास्तव में कोई अस्तित्व ही नहीं था—पूर्णतया नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया है और मरहठे ऐसी बुरी तरह खदेड़े गए हैं कि अब वे उत्तर भारत में कभी न दीख पड़ेंगे। इस समाचार को सुन कर मुगल-बादशाह खुशी से फूला न समाया। और उस ने असभ्यता के साथ मरहठा-राजदूत को दिल्ली से निकलवा दिया। साथ ही इस बड़ी विजय के उपलक्ष में शानदार उत्सव मनाने की आज्ञा दी। दिल्ली के इन बनावटी कृत्यों का समाचार पाते ही बाजीराव ने एक विकट हंसी हंसी। उसने अपने मनमें कहा "अच्छा मैं अपनी सेना को दिल्ली के किले की दीवार तक ले जाऊंगा और मुगल-सम्राट् को उसकी राजधानी के शोलों के शोकयुक्त प्रकाश में अपनी शक्ति का परिचय दूंगा।" उसने अपना प्रण पूरा किया। संताजी यादव, तुकोजी होल्कर और शिवाजी तथा यशवन्तराव पवार को साथ लेकर उसने शीघ्र ही दिल्ली के फाटक को जा खटखटाया। मुगल-बादशाह अपनी शाही फौज से एक के बाद एक सेना भेजने लगा, लेकिन प्रत्येक को पराजित