हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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के साथ लड़े कि युरोपीय शक्तियों को मरहठों के किले की दीवार तक पहुँचना असम्भव हो गया । यह देख सेनापति कोमोडोर मैथ्यू क्रोध से आगबगोला हो गया और अपनी सेना को उत्साहित करता हुआ, स्वयं सब से आगे बढ़ कर किले पर आक्रमण करने के लिये दौड़ा । उसी समय एक मरहठे सिपाही ने दौड़ कर अपनी सङ्गीन उसकी जांघ में घुसेड़ दी, पर वीर कोमोडोर इस आघात से तनिक भी भयभीत न हुआ, वरन उसने बड़ी शीघ्रता से उस सिपाही का पीछा किया और उस पर पिस्तौल के दो फ़ायर किये, लेकिन क्रोध और शीघ्रता में वह पिस्तौल भरना भूल गया था इसी कारण दोनों फ़ायर निरर्थक गये । इस मित्र सेना की भी वही दशा हुई जो उनके सेनापति की हुई थी । जब मित्र सेना जान हथेली पर रख, जी तोड़ कोशिश करके जैसे तैसे किले के पास पहुँच गई, इसी समय मरहठों ने बड़ी बुद्धिमानी और उत्साह से इसका सामना किया और मित्र सेना चीखती हुई भाग निकली । ठीक उसी समय मरहठों की एक दूसरी संगठित रिज़र्व सेना, अचानक ही पीछे से आकर पुर्तगीज़ों की बाहरी सेना पर टूट पड़ी, इससे भयभीत हो सेना अपनी जान लेकर भागने लगी और तत्काल अङ्गरेजी सेना ने भी उनका साथ दिया—अर्थात् दोनों तितर-बितर होकर भाग गई । उनका बहुत-सा लड़ाई का सामान मरहठों के हाथ लगा । विजय का डङ्का बजने लगा और मरहठे इस सफलता से अत्यन्त आनन्दित हुये । उधर मित्र-सेनाओं के हृदय में जो कुछ लड़ाई की इच्छा शेष रह गई थी, उसकी पूर्णाहुति के लिये आपस में दोनों वाग्-युद्ध करने लग गई अर्थात् तात्कालिक लड़ाई की हार तथा भारी हानि का उत्तरदायित्व एक दूसरे के मत्थे मढ़ने लगीं । इस प्रकार द्वन्द्व युद्ध करती हुई अपना- सा मुँह लेकर दोनों ने अपनी अपनी राह ली । पुर्तगीज़ों ने चाऊल का