भारतकोश
हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

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रास्ता लिया और अङ्गरेजों ने बम्बई के लिये अपने जहाज तय्यार किये। इस लड़ाई के पश्चात् बहुत दिनों तक अङ्गरेज सौदागर अपने सौदागरी के जहाजों के साथ एक जंगी जहाज भी लेकर आते रहे, क्योंकि उन्हें इस बात का भय रहता था कि कदाचित् मरहठे उन्हें "चौथ" के लिये न पकड़ लें। अन्त में ऐसा ही हो गया अर्थात् कुछ दिनों के बाद अङ्गरेजों के 'विक्टरी' (विजय) और 'रिवेञ्ज' (बदला लेने वाले) नामी जहाजों को मरहठों ने पकड़ कर रोक लिया। सन् १७२४ ईस्वी में डचों को भी जाना पड़ा। उन्होंने पूरी तैयारी के साथ अर्थात् सात जंगी जहाजों, दो बम मारने वाले जहाजों और एक अच्छी सेना लेकर मरहठों के विजय-दुर्ग पर आक्रमण कर दिया। परन्तु इतनी तैयारी करने पर भी मरहठों के साहस तथा वीरता पर किसी प्रकार का धब्बा लगाने में असफल हुये। अब मरहठा जल सेनापति हिन्द-महासागर में स्वच्छन्द घूमने लगे। इस बड़ी भारी सफलता प्राप्त करने के साथ साथ मरहठे कोंकण में मुसलिम सिद्दी से हैदराबाद में निज़ाम से, गुजरात, मालवा और बुन्देलखण्ड में मुग़लों के साथ भी लड़ते रहे। कान्होजी आंगरे का सन् १७२६ ई० में देहान्त हो गया, ठीक उसी समय एक दूसरे ऐतिहासिक व्यक्ति ने राजनैतिक रंग स्थल में प्रवेश किया। उसने शीघ्र ही महाराष्ट्र-मण्डल के नेताओं के हृदयों पर अपनी वीरता की धाक बिठा दी। निस्सन्देह वह एक बड़ा तेजस्वी वीर था। उसने मरहठा जाति को उसके महान् उद्देश्य से किसी प्रकार से भी च्युत नहीं होने दिया। इस महान् व्यक्ति का नाम था ब्रह्मेन्द्र स्वामी। वे शाहूजी, बाजीराव, चिम्माजी, आंगरे आदि अन्य सहस्रों वीरों के गुरू थे। उनका जीवन देशभक्ति की महान् और श्रेष्ठ भावनाओं तथा आदर्शों से प्रोत्साहित था। वे सदा अपनी जाति के सम्मुख सरल रीति से आध्यात्मिक तथा धार्मिक पहलु तथा 'स्वधर्म' और 'स्वराज्य' के महान्